कपास चुनती महिलाओं की तार-तार होती ज़िंदगी

- Author, शुमैला जाफ़री
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
मक़सूदा माई पौ फटने से एक घंटा पहले ही उठ जाती हैं ताकि काम पर जाने से पहले अपने जानवरों को चारा दे दें और घर को साफ़ कर दें.
सूर्योदय होते ही मक़सूदा एक बड़ा कपड़ा लेकर उसे अपनी कमर में बांधती हैं और कपास चुनने के लिए खेतों की ओर दौड़ पड़ती हैं.
मक़सूदा पिछले 50 साल से कपास चुनने का काम कर रही हैं. पाकिस्तान दुनिया का चौथा सबसे बड़ा कपास उत्पादक है और उनका घर पंजाब प्रांत के कपास उत्पादक क्षेत्र में पड़ता है.
पाकिस्तान की 5,00,000 कपास चुनने वाली महिलाओं में से ज़्यादातर की तरह मक़सूदा ने भी बचपन में ही यह काम शुरू कर दिया था.
सूर्य की रोशनी में झुलसी उनकी त्वचा, ख़रोचों भरे हाथ और तार-तार कपड़े उनकी घोर गरीबी और अथक परिश्रम की कहानी बयां करते हैं.

वह कहती हैं, "मेरे पति अब बहुत बूढ़े हो गए हैं, मेरे बेटे पढ़े-लिखे नहीं हैं और काम उन्हें मुश्किल से ही मिलता है. चाहे कितनी ही कम क्यों न हो, मेरी कमाई महत्वपूर्ण है. अगर मैं काम करना बंद कर दूं, तो हम खाएंगे क्या?"
जब हम बात कर रहे थे तब मक़सूदा के हाथ तेजी से पौधों के इर्द-गिर्द चल रहे थे और वह कपास के छोटे गुच्छे निकाल रही थीं.
जितना ज़्यादा कपास होगा उतना ही अधिक पैसा, इसलिए वह एक क्षण भी बर्बाद नहीं करना चाहतीं.
पाकिस्तान में कपास को अब भी हाथों से ही निकाला जाता है और पारंपरिक रूप से यह महिलाओं का काम है.
गर्मी के झुलसाने वाले दिनों में जब तापमान 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है, ग्रामीण इलाक़ों में हज़ारों महिलाएं एक दिन में सात घंटे या इससे भी अधिक समय तक खेतों में काम करती हैं.

जो कपास वह चुनती हैं, उससे नए कपड़े बनाए जाएंगे. हालांकि नए कपड़े ख़रीदना उनकी हैसियत से बाहर है.
पाकिस्तान के लिए यह कमाई का बड़ा ज़रिया है क्योंकि देश का कपड़ा उद्योग उसके निर्यात का 57 प्रतिशत तक है.
जनवरी, 2014 से पाकिस्तान को यूरोपीय संघ के बाज़ारों में बगैर चुंगी दिए प्रवेश का फ़ायदा भी मिल रहा है.
लेकिन इससे ज़मीन पर फ़र्क मुश्किल ही नज़र आता है जहां कपास चुनने वाले मज़दूर 200 रुपये प्रतिदिन से कम ही कमा पाते हैं, भले ही फ़सल अच्छी हो और इस साल तो फ़सल कमज़ोर रही है.
मक़सूदा कहती हैं कि पिछले साल वह एक दिन में 30-35 किलो कपास चुन लेती थीं लेकिन इस साल वह 20 किलो ही चुन पा रही हैं.
दक्षिणी पंजाब के बलोचनवाला गांव में जिस खेत पर मक़सूदा और एक दर्जन अन्य महिलाएं काम करती हैं उसके मालिक मोहम्मद सनाउल्लाह हैं.

वह कहते हैं, "मक़सूदा सुबह 6 बजे कपास चुनना शुरू करती हैं और 2 बजे से पहले ख़त्म कर देती हैं. इसके दाम प्रति किलोग्राम की दर से तय हैं. हम चुने हुए कपास का वज़न करते हैं और उसके अनुसार भुगतान कर देते हैं."
कपास चुनने वालों को भुगतान बाज़ार दर पर निर्भर करता है जिसे हर साल सरकार तय करती है. इस साल यह दर करीब 4.66 रुपये प्रति किलोग्राम है.
सनाउल्लाह मानते हैं कि इस काम में लगने वाली कड़ी मेहनत को देखते हुए यह राशि बहुत कम है लेकिन इस कम मज़दूरी के लिए भी उनके पास तर्क हैं.
उनका कहना है, "किसान अधिक देना चाहते हैं लेकिन उन्हें फ़सल से बमुश्किल ही कुछ बचता है."
लेकिन कम पैसा ही एकमात्र समस्या नहीं है. काम के मुश्किल हालात भी महिलाओं की सेहत को नुक़सान पहुंचाते हैं.

मक़सूदा कहती हैं, "कुछ मिनट के काम के बाद मुझे बैठना पड़ता है, पानी पीना पड़ता है और फिर काम शुरू करना पड़ता है. मेरे हाथ छिल गए हैं, शरीर दुखता है और सिर हमेशा दर्द करता रहता है."
उन्होंने इस थकान से निपटने का अपना तरीका विकसित कर लिया है, वे कहती हैं, "शाम को मैं चाय के साथ एक उबला अंडा लेती हूं, फिर ये ठीक हो जाता है."
कीटनाशकों के भारी प्रयोग, बहुत तेज गर्मी और पर्याप्त सुरक्षात्मक कपड़ों की कमी से कपास चुनने वाली कई महिलाएं बहुत सी गंभीर बीमारियों की शिकार हो जाती हैं जैसे कि त्वचा, फेफड़ों और योनि का कैंसर.
लेकिन युवा पीढ़ी को उम्मीद है कि वह इस दुर्भाग्य से बच सकती है.
जब मक़सूदा और कपास चुनने वाली अन्य महिलाएं खेतों में अपना काम ख़त्म करती हैं तब 18 वर्षीय राबिया मुश्ताक़ काम शुरू करती हैं.
गांव की अन्य महिलाओं की तरह राबिया की मां और बहनें भी कपास चुनती हैं और वह बचपन से ही उनकी मदद कर रही हैं.
लेकिन राबिया जानती हैं कि गरीबी से बाहर निकलने का एकमात्र रास्ता पढ़ाई ही है इसलिए उन्होंने इस कमरतोड़ काम के साथ पढ़ने का ज़रिया भी निकाल लिया है.

वह कहती हैं, "मुझे कपास चुनना पसंद नहीं लेकिन मेरे पास और कोई विकल्प नहीं. मैं यह काम इसलिए कर रही हूं ताकि अपनी शिक्षा के लिए पैसा जुटा सकूं. मेरे अभिभावक मेरी फ़ीस नहीं दे सकते."
वह बताती हैं, "मैं अंग्रेज़ी में स्नातकोत्तर करना चाहती हूं ताकि मैं अच्छी नौकरी कर सकूं और मेरी मां घर पर रह सके."
मक़सूदा शायद अपनी ज़िंदगी में गरीबी के दुष्चक्र को न तोड़ पाएं लेकिन चूंकि राबिया अभी युवा हैं, इसलिए उन्हें उम्मीद है कि एक दिन उनके सपने हक़ीक़त बनेंगे.
<bold>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए <link type="page"><caption> आप यहां क्लिक</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link> कर सकते हैं. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)</bold>












