और वो सड़क पर नमाज़ पढ़ने बैठ गया...
- Author, ब्रजेश उपाध्याय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, वाशिंगटन
पिछले रविवार को मैं लंदन के ऑक्सफ़र्ड स्ट्रीट पर था.
पेरिस में हुए हमले को चौबीस घंटे भी नहीं हुए थे, हर अख़बार और टीवी न्यूज़ चैनल की हेडलाइन में इस्लामिक स्टेट की बात हो रही थी.
इस्लाम पर तीखी बहस हो रही थी, हल्की बारिश और आसमान पर छाए हुए स्लेटी रंग के बादल माहौल को और मनहूसियत दे रहे थे.
लेकिन ऑक्सफ़र्ड स्ट्रीट हमेशा की तरह अपने रंग में था.
दोपहर का वक्त था. एक कोने में छोटा सा रॉक शो चल रहा था. काले, गोरे, भूरे, बच्चे, बूढ़े, जवान, हिंदू, इसाई, मुसलमान सब भीड़ में शामिल थे.
कोई थोड़ी देर के लिए रुकता, कोई गाने के साथ सुर मिलाता, एक ने अपना शॉपिंग बैग ज़मीन पर रख दिया और अपनी माशूका के कमर में हाथ डालकर बेफ़िक्र होकर नाचने लगा, यहां कोई किसी से सवाल नहीं कर रहा था, ये एक आज़ाद पश्चिमी लोकतंत्र का चेहरा था.

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मैं थो़ड़ा आगे चला और अचानक ही थोब, (वो लिबास जो आमतौर पर मध्यपूर्व में नज़र आता है), पहने एक नौजवान सड़क के ठीक किनारे नमाज़ पढ़ने बैठ गया. कुछ लोगों के चेहरे से साफ़ ज़ाहिर था कि उन्हें ये बात पसंद नहीं आ रही थी लेकिन वो बिना रुके आगे चलते गए.
मैने अपने फ़ोन से वीडियो लेना शुरू किया, एक दूसरा मुसलमान नौजवान थोड़ी सी नाराज़गी जताते हुए मुझसे बोला, "आप तस्वीर क्यों ले रहे हैं?"
मैने कहा: "आज़ाद लोकतंत्र का ये भी एक चेहरा है जिसे कैमरे में क़ैद कर रहा हूं. ख़ूबसूरत है न?"
मेरा जवाब शायद उसके ग़ुस्से को ठंडा कर गया और उसने मुस्करा कर कहा--"ऐब्सॉल्यूटली, ब्रदर!
वहां से मैं चला तो मन में एक सवाल था. इस्लामिक स्टेट को आज़ाद लोकतंत्र के किस चेहरे से नाराज़गी है? उस चेहरे से जो बेफ़िक्र होकर अपनी माशूका के कमर में हाथ डालकर थिरक सकता है या फिर उस चेहरे से जो बेफ़िक्र होकर सड़क के बीचोबीच नमाज़ पढ़ सकता है या फिर दोनों से?

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लंदन से वाशिंगटन के लिए रवाना हुआ, वाशिंगटन एयरपोर्ट पर इमिग्रेशन अधिकारी ने पूछा आप ब्रिटेन से आ रहे हैं, पिछले एक हफ़्ते में पेरिस तो नहीं गए थे?
ज़ाहिर है दुनिया के सबसे पुराने आज़ाद लोकतंत्र में भी आतंकवाद पर बहस तीखी हो चुकी थी.
राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी की रेस में शामिल एक साहब अमरीका में सभी मस्जिदों को बंद करने की मांग कर रहे हैं, इस्लाम को ग़ैरक़ानूनी करार दिए जाने की बात कर रहे हैं, सीरिया से शरणार्थियों के आनेपर रोक लगाने के लिए क़ानून लाने की पुरज़ोर कोशिश हो रही है.
वहीं एक दूसरी उम्मीदवार चीख-चीख कर कह रही हैं: "इस्लाम को दुश्मन समझना बंद करो, मुसलमान अमनपसंद लोग हैं उनका आतंकवाद से कुछ भी नहीं लेना-देना है."

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एक मुसलमान मां आईसिस से गुहार लगा रही है-ख़ुदा के लिए हमारे बच्चों को बरगलाना छोड़ दो.
एक महिला ने अपनी देशभक्ति दिखाने के लिए अमरीकी झंडे को हिजाब की तरह पहना है, तो कुछ हैं जो हर मुसलमान से उम्मीद कर रहे हैं कि वो आगे आए और दाएश को गालियां दे.
ब्रिटेन से एक मुसलमान नौजवान ने ट्विट किया है: ग़ैर-मुसलमानों को ये क्यों लगता है कि ब्रितानी मुसलमान आईसिस पर रोक लगा सकते हैं. यार, मैं जिस लड़की को चाहता हूं उससे मैं अपने टेक्स्ट का जवाब भी नहीं ले पा रहा और आप मुझसे उम्मीद कर रहे हैं कि मैं एक आतंकवादी संगठन को रोक दूं?
टीवी पर बहस जारी है.
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