'सिर्फ़ पेरिस के पीड़ितोें के लिए ही प्रार्थना क्यों'

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- Author, प्रभात पांडेय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
जहां सोशल मीडिया पर पेरिस हमले में मारे गए लोगों को श्रद्धांजलि देने के लिए #PrayForParis हैशटैग ट्रेंड कर रहा है वहीं सोशल मीडिया पर कुछ लोग सवाल उठा रहे हैं कि सिर्फ़ यूरोप या अमरीका में हुए चरमपंथी हमले पर ही क्यों इतना शोर-शराबा होता है.
शुक्रवार को फ़्रांस की राजधानी पेरिस में हुए आत्मघाती हमलों और बम धमाकों में 129 लोग मारे गए और 350 लोग घायल हुए थे. चरमपंथी संगठन आईएस ने इसकी जिम्मेदारी ली है.
लोग सोशल मीडिया पर लिख रहे हैं कि पेरिस में मारे गए लोगों के लिए प्रार्थना करना बिलकुल जायज़ है, 'दुख की इस घड़ी में हम सब पेरिस वासियों के साथ हैं,' लेकिन इसके साथ ही बेरुत, बगदाद और सीरिया को मत भूलो. वहां पर रह रहे लोगों की पीड़ा भी समझो.

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फ़ेसबुक यूज़र एलन डनवाइड लिखते हैं, "पेरिस हमले में मारे गए लोगों की याद में लोग अपनी फ़ेसबुक पिक्चर पर फ्रांस का झंडा लगा रहे हैं. ये ठीक है. लेकिन जब दुनिया के दूसरे हिस्सों में ऐसा होता है तब आप लोग ऐसा क्यों नहीं करते. आप लोगों का ये रवैया आपका दोहरा चरित्र दिखाता है."
सारा अहमद लिखती हैं, "मैं इराक़ से हूं. मैं पेरिसवासियों के साथ हूं. यक़ीन जानिए हम इराक़ में भी इसी तरह पल-पल मौत के साये में जीते हैं. इसलिए हम समझ सकते हैं कि आप लोगों पर क्या बीती."
नानको दोई ने लिखा, "मैं बेरुत से हूं और पेरिसवासियों के लिए दुआ करता हूं. पूरी दुनिया में जो हो रहा है वो शर्मनाक है. मैं बेरुत, लीबिया, सीरिया समेत पूरी दुनिया की शांति के लिए प्रार्थना करता हूं. सिर्फ़ यूरोप के लिए नहीं."

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वाहिद अल ने लिखा, "मैं इराक़ से हूं और जब मैं सुबह अपने दफ़्तर के लिए निकलता हूं तो पता नहीं होता कि शाम को घर लौटूंगा या नहीं. पेरिस में जो हुआ उस ख़तरे से तो हम रोज़ जूझते हैं."
आतिफ़ सईद ने बयां किया, "हममें से कितनों ने फलस्तीनीयों, सीरिया निवासियों या लीबिया के निर्दोष लोगों के मारे जाने पर अपनी फ़ेसबुक प्रोफ़ाइल फ़ोटो बदली है. यहां के लोगों को भी हमारी प्रार्थना की उतनी ही ज़रूरत है जितनी पेरिस वासियों को."
सर्गियो मोरांडी के मुताबिक़, "पश्चिमी देश और वहां का मीडिया गैर पश्चिमी मुल्कों के लोगों को दोयम दर्जे के नागरिक मानते हैं. उनके लिए हमारी जान की क़ीमत कुछ भी नहीं."
वहीं कुछ लोग इस तरह के सवाल उठाने को ग़लत मानते हैं.

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डॉन वॉल्श ने लिखा, "इस वक़्त ऐसे सवाल उठाना असंवेदनशील है. सीरिया, इराक़ और लेबनान में भी जब निर्दोष नागरिक मारे जाते हैं तो यूरोप में तमाम विरोध प्रदर्शन होते हैं. हमें वहां की भी परवाह है."
मोहसिन ने लिखा, "ये कोई दोहरी मानसिकता नहीं है. फ्रांस में निर्दोष नागरिक मारे गए. फ़ेसबुक पर अपनी प्रोफ़ाइल तस्वीर बदलना और पेरिस में मारे गए लोगों की याद में प्रार्थना करना लोगों का संवेदना व्यक्त करने का तरीका है. इस पर सवाल उठाना बिलकुल ग़लत है."
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