कितना जायज़ है अस्पताल पर हमला करना

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अंतरराष्ट्रीय चैरिटी संस्था मेडिसीं सां फ़ोतिएं (एमएसएफ़) ने उत्तरी अफ़ग़ानिस्तान के कुंदूज़ में उसके एक अस्पताल में बम गिराने की स्वतंत्र जाँच कराने की मांग की है.
शनिवार की सुबह हुए इस हमले में एमएसएफ़ के कर्मचारियों समेत कम से कम 22 लोग मारे गए थे. एमएसएफ़ का कहना है कि हमले में बड़ी संख्या में लोग घायल भी हुए हैं. संस्था के अनुसार तक़रीबन एक घंटे तक हुई इस बमबारी में अस्पताल को भारी नुक़सान पहुँचा है.
चैरिटी संस्था ने हमले के लिए अमरीकी नेतृत्व वाली नेटो गठबंधन सेना को ज़िम्मेदार ठहराया है, लेकिन अफ़ग़ान सरकार के अधिकारियों का आरोप है कि चरमपंथी संगठन तालिबान इस अस्पताल का इस्तेमाल सैन्य उद्देश्यों के लिए कर रहा था.
अमरीका इस मामले की जाँच कर रहा है.
कौन क्या कह रहा है?

अफ़ग़ानिस्तान के रक्षा मंत्रालय का कहना है कि सशस्त्र चरमपंथी इस अस्पताल का इस्तेमाल अफ़ग़ान सेना और आम नागरिकों को निशाना बनाने के लिए कर रहे थे.
लेकिन एमएसएफ़ का कहना है कि जंग में शामिल सभी पक्षों को अस्पताल की जानकारी थी. काबुल और वॉशिंगटन स्थित अफ़ग़ान और अमरीकी अधिकारियों को कई कॉल करने के बावजूद एक घंटे तक बमबारी होती रही.
एमएसएफ़ ने उन ख़बरों से भी इनकार किया है कि हमले के दौरान अस्पताल में कोई आतंकवादी था. संस्था ने इसे युद्ध अपराध क़रार दिया है.
सोमवार को अमरीका ने अपना पक्ष बदलते हुए कहा कि हवाई हमले अफ़ग़ान सेना के आग्रह पर किए गए थे.
अफ़ग़ानिस्तान में अमरीकी कमांडर जनरल जॉन कैंपबेल ने कहा कि हमले के वक़्त अमरीकी सैनिकों को निशाना नहीं बनाया गया था. उन्होंने ये भी स्वीकार किया कि आम नागरिक दुर्घटनावश निशाना बने.
इससे पहले, अमरीका ने कहा था कि चरमपंथी अमरीकी सैनिकों पर गोलियां चला रहे थे.
अस्पताल पर हमला कितना जायज़?

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अंतरराष्ट्रीय मानव अधिकार क़ानून के तहत मरीज़ों और स्वास्थ्यकर्मियों के साथ-साथ स्वास्थ्य सुविधाओं पर हमला प्रतिबंधित है. युद्ध के नियमों के तहत इसका पालन होना चाहिए.
यहाँ तक कि तालिबान जैसे लड़ाके भी अगर अस्पतालों में शरण लेते हैं तो उन पर हमला नहीं किया जाना चाहिए.
मानवाधिकार संस्था ह्यूमन राइट्स वॉच के मुताबिक़, “युद्ध के नियमों के अनुसार अगर सेना को पता भी हो कि चरमपंथी अस्पतालों का उपयोग हथियार या लड़ने के ठिकाने के रूप में कर रहे हैं तो उन्हें इस दुरुपयोग को रोकने के लिए पहले चेतावनी जारी करनी चाहिए और पर्याप्त समय देने के बाद ही हमला बोलना चाहिए.”
क्या पहले भी हुई ऐसी घटना?
फ़रवरी 2009 में उत्तर-पूर्व श्रीलंका में एक अस्पताल पर हुई गोलाबारी में नौ लोग मारे गए थे.

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पुथुक्कुदियुरुप्पु नगर के अस्पताल पर 24 घंटे के अंतराल पर तीन बार गोले दाग़े गए थे.
श्रीलंकाई सेना ने गोलाबारी में अपना हाथ होने से इनकार किया था और आरोप लगाया था कि तमिल टाइगर विद्रोही आम नागरिकों को अपने कवच के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं.
पिछले साल, ग़ज़ा में एक अस्पताल में इसराइली सेना के हमले में पाँच लोगों की मौत हुई थी और 70 लोग घायल हुए थे.
विशेषज्ञों का मानना है कि अफ़ग़ानिस्तान में ये पहली घटना नहीं है, जब अंतरराष्ट्रीय मानवीय क़ानूनों का उल्लंघन हुआ है.
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