मोदीजी के लिए कैमरा, मियां साहब को निहारी

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- Author, ब्रजेश उपाध्याय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, वाशिंगटन
सिलिकॉन वैली में किसी कंपनी के लिए कामयाबी का राज़ ये है कि पहले एक बड़ी सी प्रॉब्लेम ढूंढो, फिर देखो कि कितने लोग इसके हल का इस्तेमाल करेंगे और फिर लग जाओ एक ऐप बनाने में. जितने ज़्यादा लोगों का फ़ायदा उतना ही कामयाब ऐप और उतनी ही गर्म उस कंपनी की जेब.
तो मेरे प्यारे गूगल, फ़ेसबुक, ट्विटर, माइक्रोसॉफ़्ट और बाक़ी सभी छोटी-बड़ी कंपनियों, हम भारत-पाकिस्तान वालों की एक आपस की बड़ी सी प्रॉब्लम है और अगर आप इसके हल के लिए एक ऐप बनाते हैं तो डेढ़ अरब डाउनलोड तो कहीं नहीं गए.
ये प्रॉब्लम तभी से है जब से हम पैदा हुए यानि तक़रीबन सत्तर साल होने को आ गए. मुश्किल से अंगूठा चूसना शुरू ही किया था कि एक दूसरे को आंखें दिखाने की लत लग गई और वो जा नहीं रही.
हम जंगें लड़ते हैं, हर नई नस्ल को अपने हिसाब से इतिहास पढ़ाते हैं, भले ही हम ख़ुद भूखे रहें लेकिन पूरी दुनिया की हथियार बनाने वाली कंपनियों की जेब हमेशा गर्म रखते हैं और हर साल न्यूयॉर्क में बैठे सैम चाचा के पास आते हैं, मत्था टेकते हैं और फिर एक-दूसरे की शिकायतें करते हैं.
धांसू सा ऐप

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लेकिन आप ज़्यादा परेशान भी न हों, इस समस्या को हम आपके ऊपर पूरी तरह से नहीं लाद रहे क्योंकि हम ये भी जानते हैं कि आप कितने बड़े भी तीसमार खां क्यों न हों इसको जड़ से खत्म करने का हल नहीं निकाल सकते. बड़े-बड़े आए और चले गए.
आपको तो बस एक धांसू सा ऐप बनाना है जिससे पाकिस्तान में बैठे लोगों को लगे कि भारत की हर जगह किरकिरी हो रही है, हालत बद से बदतर होनेवाली है, अमरीका उसे फूटी आंख नहीं देखना चाहता और उसकी क्रिकेट टीम हर जगह पिट रही है.
भारत में जब ये ऐप देखा जाए तो वहां लगे कि पाकिस्तान को चीन और अमरीका दोनों की डांट पड़ रही है, हाफ़िज़ सईद जेल में चक्की पीस रहे हैं, दाऊद इब्राहिम पर ब्लासफ़ेमी का इल्ज़ाम लग गया है और पाकिस्तानी क्रिकेट टीम में अब इमरान, अकरम और वकार युनूस जैसे तेज़ गेंदबाज़ों को कभी नहीं शामिल किया जाएगा.
मोदीजी और मियां की नौकरी?

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आप बोलेंगे कि आपने कश्मीर का ज़िक्र तो किया ही नहीं. भाई साहब जितना कहा उतना करो - कश्मीर का हल आपने निकाल दिया तो मोदीजी और मिंया साहब की नौकरी का क्या होगा.
संयुक्त राष्ट्र हर साल इतना बड़ा जो जलसा करता है और जिसे बस भारत और पाकिस्तान के लोग देखते हैं उसका क्या होगा, मीडिया की टीआरपी का क्या होगा?
आप तो बस जैसा हमने कहा ऐप बनाने की तैयारी करो. और हां डिज़ाइन बनाते वक्त ये ध्यान रखना कि उसमें हरा और केसरिया रंग कहीं से न हो.
अगर हरा ज़्यादा हुआ तो पाकिस्तान के एजेंट कहलाओगे, केसरिया ज़्यादा हुआ तो भारत के. हमारे लोग तो नहीं, लेकिन हमारी मीडिया इन सब बातों पर पैनी नज़र रखती है.
पहले किसने हाथ हिलाया?

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आपको यकीन नहीं हो रहा हो तो बता दूं कि हाल ही में न्यूयॉर्क में जब मियां साहब और मोदी जी ने एक दूसरे की तरफ़ हाथ हिलाया तो मीडिया के हमारे सजग पहरेदारों ने टीवी को स्लोमोशन पर चला कर देखा कि पहले किसने हाथ हिलाया. और आपको लग रहा होगा कि गूगल अर्थ और न जाने क्या-क्या बनाकर आप ही दुनिया पर नज़र रखते हैं.
तो ख़ैर मोदी जी से तो आपका परिचय हो ही चुका है, सिलिकॉन वैली का शायद ही कोई कोना हो जहां आपने उनकी तस्वीरें न ली हों.

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इसी बात की तो हम आपकी कद्र करते हैं कि आपका बैकग्राउंड रिसर्च इतना सॉलिड होता है न कि क्या कहने हैं! मोदीजी की कमज़ोरी को आपने ख़ूब पहचाना, हर जगह कैमरे का इंतज़ाम किया और उनका दिल ऐसा जीता कि उनके आंसू बाहर निकल आए.
अब अक्तूबर में मियां साहब आ रहे हैं वाशिंगटन. उन्हें भी सिलिकॉन वैली बुला डालिए और हां उनका दिल जीतना हो तो कैमरा नहीं, निहारी और पाया का इंतज़ाम हर जगह रखिएगा.
बाकी तो आप ख़ुद ही समझदार हैं.
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