फ़ॉक्सवैगन कार स्कैंडल की पांच बातें

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- Author, रसल हॉटन
- पदनाम, बीबीसी बिजनेस रिपोर्टर
जर्मन कार कंपनी फॉक्सवैगन उत्सर्जन मानकों में धोखाधड़ी का मामला सामने आने के बाद बड़े पैमाने पर अपनी कारों को वापस मंगा रही है.
अमरीका की पर्यावरण संरक्षण एजेंसी (ईपीए) के मुताबिक़ इन कारों में एक ख़ास तरह का सॉफ्टवेयर लगा है जो जांच के दौरान प्रदूषण स्तर को कम कर देता है.
अमरीका के 'क्लीन एयर एक्ट' के तहत कंपनी को 2009 से 2014 तक बनी जेटा, बीटल, ऑडी ए3, गोल्फ़ और 2014 से 2015 के बीच बनी पसाट को वापस लेना होगा.
स्कैंडल के सामने आने के बाद फ़ोक्सवैगन के सीईओ मार्टिन विंटरकॉर्न ने इस्तीफ़ा दे दिया है.
आइए जानते हैं, इस स्कैंडल से जुड़ी पांच बातें.

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1- फ़ोक्सवैगन पर क्या हैं आरोप?
जानी मानी कार कंपनी फ़ोक्सवैगन ने उत्सर्जन मानकों में धोखाधड़ी की बात मानी है.
अमरीका की पर्यावरण संरक्षण एजेंसी के मुताबिक़, अमरीका में बेची जाने वाली डीज़ल कारों में कंपनी ने ऐसे सॉफ्टवेयर लगाए थे जो बेहतर परिणाम दिखाते थे.
अमरीका में कंपनी ने अपनी कारों की मार्केटिंग सबसे कम उत्सर्जन करने वाली डीज़ल कार के रूप में करके अपनी बिक्री को बढ़ाने की कोशिश की थी.
हालांकि जांच में कंपनी की चार लाख बयालीस हज़ार कारों को ही शामिल किया गया लेकिन कंपनी ने स्वीकार किया कि दुनिया भर में बेची जाने वाली एक करोड़ दस लाख कारों में ये उपकरण लगाए गए थे.

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2- कैसा है यह सॉफ्टवेयर?
ईपीए के मुताबिक़, कंपनी के इंजन में ऐसे कम्प्यूटर सॉफ़्टवेयर लगे हैं जो परीक्षण के दौरान रफ़्तार, इंजन की गतिविधि, हवा का दबाव और यहां तक स्टीयरिंग व्हील की स्थिति को भांप जाते हैं.
कार को प्रयोगशाला में नियंत्रित स्थितियों में चलाया जाता है. परीक्षण में कार को एक रैंप पर खड़ा किया जाता है तो यह उपकरण गाड़ी को सेफ़्टी मोड में डाल देता है. जब गाड़ी सड़क पर आती है तो किट नॉर्मल मोड में आ जाती है.
नतीजतन सड़क पर इंजन से नाइट्रोजन ऑक्साइड का प्रदूषण अमरीकी मानकों से 40 प्रतिशत अधिक निकलता है.

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3 - कंपनी को कितना होगा आर्थिक नुक़सान?
फ़ॉक्सवैगन, अमरीका के मुख्य अधिकारी माइकल हॉर्न ने कहा कि ‘हमें बिल्कुल अंधेरे में रखा गया’ जबकि ग्रुप के सीईओ मार्टिन विंटरकॉर्न ने कहा था कि ‘उनकी कंपनी ने ग्राहकों और जनता के विश्वास को तोड़ दिया.’
कंपनी ने आंतरिक जांच शुरू कर दी है.
कंपनी अकेले अमरीका में अपनी पांच लाख कारों को वापस मंगा रही है और इस पर आने वाले खर्च के लिए कंपनी ने 6.6 अरब यूरो (481 अरब रुपए) की राशि तय की है.
लेकिन कंपनी की आर्थिक मुश्किलें यहीं ख़त्म नहीं होतीं. ईपीए के पास अधिकार है कि वो मानक को धता बताने वाली हर गाड़ी के लिए कंपनी पर 24.8 लाख रुपए का जुर्माना करे, यानी अधिकतम जुर्माना 1,190 अरब रुपए बैठेगा.
इसके अलावा ग्राहक और शेयरहोल्डर भी क़ानूनी कार्रवाई कर सकते हैं और अमरीकी न्याय विभाग के आपराधिक जांच शुरू करने की भी सुगबुगाहट है.

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4-पूरी दुनिया के पैमाने पर यह कितनी बड़ी समस्या है?
अमरीका के बाद ब्रिटेन, इटली, फ़्रांस, दक्षिण कोरिया, कनाडा और जर्मनी में भी जांच शुरू हो गई है.
फ़्रांस के वित्त मंत्री मीशेल सपां ने कहा है कि जनता को भरोसा दिलाने के लिए पूरे यूरोप में जांच कराए जाने की ज़रूरत है.
इस समय अमरीका में ईपीए के बताए गए ब्रांडों को ही वापस किया जा रहा है इसलिए बाकी जगहों के ग्राहकों को चिंतित होने की ज़रूरत नहीं है.
हालांकि पूरी दुनिया में 1.1 करोड़ फ़ॉक्सवैगन कारें प्रभावित हो सकती हैं, जिनमें 28 लाख कारें तो सिर्फ जर्मनी में ही हैं.
यूरोप कंपनी का एक बड़ा बाज़ार है और इसकी डीज़ल कारों की आधी बिक्री यहीं होती है.
इस स्कैंडल ने अन्य कार निर्माता कंपनियों पर भी सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं. कैलिफ़ोर्निया का एयर रिसोर्सेज़ बोर्ड अन्य कंपनियों के परीक्षण परिणामों पर भी नज़र रख रहा है.

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5- डीज़ल कार बाज़ार के लिए एक झटका?
पिछले एक दशक से कार निर्माताओं ने डीज़ल गाड़ियां बनाने में बहुत पैसा निवेश किया और ये मानते हुए कि ये पर्यावरण के लिए नुकसानदायक नहीं हैं, इसमें कई सरकारों ने भी मदद की.
लेकिन वैज्ञानिक तथ्य इससे उलट हैं और कुछ शहरों में तो डीज़ल गाड़ियों पर पाबंदी के क़दम भी उठाए गए.
डीज़ल कारों की बिक्री पहले से ही मंद पड़ रही है, उस पर फ़ॉक्सवैगन का स्कैंडल भी बुरे समय में सामने आया.
वेनडिज़िटल में कंसल्टैंट और गाड़ियों के विशेषज्ञ रिचर्ड केन के अनुसार, “इस स्कैंडल के बाद डीज़ल कारों की बिक्री में तेज़ी से गिरावट आएगी.”
केन कहते हैं, “अमरीका में कुल नई कार बिक्री में एक प्रतिशत डीज़ल कारें होती हैं लेकिन यूरोप इससे सबसे अधिक प्रभावित होगा.”
पर्यावरण कार्यकर्ताओं का लंबे समय से तर्क रहा है कि उत्सर्जन नियमों का उल्लंघन हो रहा है.
यातायात एवं पर्यावरण नामक एक समूह से जुड़े जोस डिंग्स कहते हैं, “यूरोप में डीज़ल कारों में अमरीका से भी घटिया तकनीक का इस्तेमाल होता है.”
“हमारी रिपोर्ट दिखाती है कि लगभग 90 फ़ीसद गाड़ियां सड़क पर उत्सर्जन मानकों पर खरी नहीं हैं.”
वित्तीय रिसर्च फ़र्म बर्नस्टीन के विश्लेषक भी मानते हैं कि यूरोपीय मानक अमरीका जैसे कड़े नहीं हैं.
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