इटली का 'मिनी पंजाब' नोवेलारा

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- Author, डैनी मिट्ज़मैन
- पदनाम, बोलोग्ना
भारत के पंजाब और इटली के पो वैली में क्या समानता है?
असल में भारत के पंजाब प्रांत से अप्रवासी के रूप में आने वाले सिख, इटली के मशहूर चीज़ उद्योग की रीढ़ बन गए हैं.
इटली के प्रांत रेजो एमिलिया में पो वैली के समतल मैदान में स्थित नोवेलारा क़स्बा पार्मा शहर से बहुत दूर नहीं है.
दुनिया के सबसे मशहूर चीज़ ब्रांड <link type="page"><caption> पार्मिजियानो रेजियानों</caption><url href="http://www.parmesan.com/history/history-of-parmesan-cheese/" platform="highweb"/></link> (अंग्रेज़ी में पार्मेसन) का नाम इसी क़स्बे के नाम पर रखा गया है.
यूरोपीय संघ के क़ानूनों के मुताबिक़, इसे ख़ासकर सीधे दूध से बनाया जाता है और फिर चीज़ में बदला जाता है.
नोवेलारा की मेयर एलिना कार्लेटी के अनुसार, यहां बड़ी संख्या में बसने वाले सिख इस इलाक़े के मशहूर उत्पाद से नहीं खिंचे चले आए, बल्कि इस इलाक़े का मौसम उनके लिए मुफ़ीद है.
एलिना कहती हैं, “वो कहते हैं कि हम यहां रहते हुए महसूस करते हैं जैसे पंजाब में ही हों क्योंकि यहां पूरा मैदान है और कोई पहाड़ नहीं है. मौसम गर्म है और इसमें नमी है. इसके अलावा खेती भी कमोबेश वैसी ही है.”
पशुपालन ने दिलाई बढ़त

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मेयर के अनुसार, सिखों को यह घर से दूर दूसरे घर जैसा लगता है.
पांच साल की उम्र में अपने मां बाप के साथ अमृतपाल सिंह इटली चले आए थे.
वो कहते हैं, “घर पर खेत और गायें हैं और ज़मीन और इन जानवरों से हमारा एक खास रिश्ता है. इसलिए जब हम यहां आए तो यहां की भाषा न जानते हुए भी, यह हमारे लिए सकारात्मक साबित हुआ.”
1980 के दशक में अप्रवासियों का एक लहर चली. कुछ सर्कस में, तो कुछ फ़ैक्टरियों में काम करने चले गए और अधिकांश ने डेयरी फ़ार्मिंग को चुना.
अमृतपाल के अनुसार, चूंकि दूध और गायों का ख्याल रखने में इतालवी भाषा को बाधा नहीं थी और मेहनत करने में हिचक भी नहीं थी इसलिए यह धंधा उनके लिए आसान साबित हुआ.
दिन में काम अमूमन दो पारियों में होता है. पहली पारी सुबह चार बजे से आठ बजे तक और दूसरी पारी शाम को ढाई बजे से साढ़े छह बजे तक होती है.
चूंकि दूध रोज़ निकालना पड़ता है और गायों की देखभाल रोज़ करनी पड़ती है इसलिए सातों दिन काम करना आम है.
इटली में स्वागत

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भारतीय जिस हुनर के साथ अपने पशुओं की देखभाल करते थे, उससे स्थानीय किसान बहुत प्रभावित थे.
जबकि ये अप्रवासी श्रमिक अच्छी खासी तनख्वाह और मुफ़्त रिहाइश से प्रभावित थे.
उस समय इटली की अर्थव्यवस्था भी तेज़ी से बढ़ रही थी.
डेयरी फ़ार्मर मारिजीयो नोवेली कहते हैं, “अगर आप यहां किसी भी डेयरी फ़ार्म में जाएं तो आपको वहां काम करते हुए सिख मिलेंगे.”
हालांकि नोवेली इस बात पर जोर देते हैं कि वो असल में चीज़ नहीं बनाते.
नोवेली के दादा और पिता भी इसे धंधे में थे. पिछले 15 सालों से एक सिख दंपति उनके लिए काम करता है और वो हाल ही में अपने रिश्तेदार को भी ले आए हैं.
मेयर एलिना का कहना है, “भारत से आए लोगों के बिना इस उद्योग के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता.”
नोवेलारा के सिख समुदाय की कहानी चीज़ उत्पादन के अलावा कुछ और भी है.
वो यहां हैं तो इसका बड़ा कारण स्थानीय लोगों की ओर से उनका स्वागत किया जाना भी है.
गुरुद्वारा

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अप्रवासी समुदाय की समस्याओं को ध्यान में रखते हुए इटली का यह पहला नगर निगम था जिसने गुरुद्वारा बनवाने की इजाज़त दी और एक व्यावसायिक प्लॉट को धार्मिक इस्तेमाल के लिए दिया.
इस गुरुद्वारे की शुरुआत 2000 में इटली के पूर्व प्रधानमंत्री और यूरोपीय आयोग के अध्यक्ष रोमानो प्रोदी ने की. इसे यूरोप का सबसे महत्वपूर्ण सिख धर्मस्थल माना जाता है.
साल 2012 में जब इस इलाके में भूकंप आया था तो उस दौरान सिख समुदाय ने पीड़ितों के लिए दिन में दो बार खाना मुहैया कराया.
कार्लेटी कहती हैं, “इस साल के शुरू में उन्होंने रक्त लाने ले जाने के लिए रेड क्रॉस को एक कार उपहार में दी. कुछ नागरिक सुरक्षा में सहयोग करते हैं. वो हमारे समुदाय के हिस्से हो गए हैं. वो इतालवी हैं.”
अप्रवासी यहां घुल मिल गए

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सात साल पहले यहां आने वाले सुखविंदर कहते हैं, “जो लोग पहली बार हमें देखते हैं, वो हमें आतंकवादी या तालिबान समझ लेते हैं. लेकिन यहां लोग हमें जानते हैं. वो वाकई बहुत अच्छे लोग हैं.”
अमृतपाल खुद को भारतीय-इतालवी मानते हैं, “आप अपनी जड़ों को नहीं काट सकते इसलिए मैंने इन्हें अपने अंदर ज़िंदा रखा हुआ है, लेकिन बाकी सब तो इतालवी है.”
जहां तक खान-पान का संबंध है, वो दोनों संस्कृतियों का आनंद लेते हैं, “निश्चित रूप से मैं मांस नहीं खाता लेकिन घर पर भारतीय और इतालवी दोनों तरह के व्यंजन खाते हैं.”
और इसमें पार्मिजियानों रेजियानो भी शामिल रहता है.
लेकिन यह सफ़ल एकरूपता, लंबे समय में स्थानीय चीज़ उद्योग के लिए दोबारा ख़तरा पैदा कर सकती है.
इतालवी सिख

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नोवेलारा के मध्ययुगीन किले में स्थित टाउन हॉल में एलिना कार्लेटी एक युवा सिख जोड़े की शादी कराने वाली हैं. रमन और मनिंदर स्वीकार करते हैं कि वो यहां कम घबराए हुए हैं क्योंकि पिछले सप्ताह उनके लिए आयोजित एक धार्मिक कार्यक्रम में क़रीब 300 मेहमान आए हुए थे.
आज, उनके साथ बस दो गवाह हैं- रमन के अभिभावक.
रमन कहते हैं, “यहां जन्म लेने और यहीं बड़े होने से हम खुद को इतालवी महसूस करते हैं. अगर हम विदेश जाते हैं तो हम दूसरी संस्कृति की तुलना इटली से करते हैं न कि भारत से.”
मेयर स्वीकार करती हैं कि उन्हें लगता है कि कैलिफ़ोर्निया, हवाई या लास वेगास की बजाय वो भारत में अपना हनीमून मनाएंगे.
नोवेलारा की नई सिख पीढ़ी स्थानीय लहजे में बोलती है और उनकी आकांक्षाएं मूल इतालवी लोगों जैसी ही हैं.
रमन एक अंतरराष्ट्रीय ट्रांस्पोर्ट कंपनी में काम करते हैं. मनिंदर एक केमिकल हब के लिए काम करती हैं. वो ऐसे बहुसंख्यक लोगों में आते हैं, जो अब आजीविका के लिए डेयरी उद्योग के भरोसे नहीं रहना चाहते.
मंदी का असर

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पार्मेसन उत्पादन उद्योग में लगे श्रमिकों में 60 प्रतिशत भारतीय हैं.
आर्थिक मंदी ने पहले ही इस उद्योग पर असर डाला है और अधिकांश किसान अब कामगारों को मुफ़्त रिहाइश मुहैया कराने में सक्षम नहीं हैं.
अगर इस उद्योग के बुनियादी कामों में लगा सिख समुदाय खुद को इससे दूर खींच लेता है तो इस मशहूर चीज़ उद्योग का क्या होगा?
हाल के दिनों में बहुत से लोग बेरोजगार हो गए हैं और नई पीढ़ी ने अपने दादाओं के पुराने धंधे को फिर से अपनाना शुरू किया है.
मेयर एलिना कहती हैं, “अधिकांश लोग खेती की ओर जाने की फिर कोशिश कर रहे हैं.”
दूसरे शब्दों में कहें तो पार्मिजियानों रेजियानों को इस बार बचाने के लिए पंजाब से लोग नहीं, बल्कि पो वैली से ही आएंगे.
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