ग्रीस संकटः हमें क्या फ़र्क पड़ेगा?

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ग्रीस के कर्ज संकट को हल करने के लिए यूरोप के नेताओं के बीच बातचीत का दौर चल रहा है.
किसी समझौते पर पहुंचने के लिए अंतिम समय सीमा 30 जून है और इसे काफ़ी महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
लेकिन अगर यह समझौता नहीं हो पाता है और ग्रीस दिवालिया हो जाता है तो इसका दुनिया की अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा?
यूरोज़ोन की अर्थव्यवस्था में ग्रीस की हिस्सेदारी दो प्रतिशत है, इसलिए ग्रीस यूरो ज़ोन में बना रहे या जाए, इससे क्या फ़र्क पड़ेगा, आइए पांच बिंदुओं में समझते हैं.
1. यूरो से निकलना ग्रीस के लिए विनाशकारी हो सकता है.

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इसकी कोई गारंटी नहीं है कि यूरो ज़ोन से निकलने के बाद उसमें कोई सुधार आएगा.
बैंक ऑफ़ ग्रीस ने यूरो से निकलने की स्थिति की बहुत निराशाजनक तस्वीर खींच रखी है- बहुत ज़्यादा मंदी, बेरोज़गारी में इजाफ़ा और आमदनी में गिरावट.
आम ग्रीस निवासियों की बचत का अवमूल्यन हो जाएगा और अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में ग्रीस की साख गिर जाएगी, जिससे उसकी अर्थव्यवस्था के पटरी पर लौटने की संभावना और कम हो जाएगी.
ग्रीस में तख्तापलट का इतिहास रहा है और ऐसी स्थिति में वहां राजनीतिक अस्थिरता पैदा हो सकती है.
अगर सिरीज़ा, ग्रीस को यूरो ज़ोन से बाहर ले जाती है तो परंपरागत दलों से निराश होकर सिप्रास की पार्टी को चुनने वाले मतदाताओं की हताशा और बढ़ेगी और वो कम्युनिस्ट या धुर दक्षिणपंथी पार्टी गोल्डेन डॉन की ओर आकर्षित हो सकते हैं.
2. जो भी नतीजा हो, असर बाकी देशों पर भी पड़ेगा.

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यूरोपीय राजनीति आपस में इतनी गुंथी हुई है कि ऐसा हो नहीं सकता कि इसका इसके बाकी देशों पर असर न पड़े.
ग्रीस के प्रधानमंत्री एलेक्सिस सिप्रास की प्रगति पर, खर्चों में कटौती की विरोधी यूरोप की अन्य पार्टियां बहुत क़रीबी से नज़र रख रही हैं.
अगर जर्मनी ग्रीस की शर्तों को मानता है तो जर्मन चांसलर एंगेला मर्केल को घरेलू राजनीति में विरोध का सामना करना पड़ सकता है.
फ़्रांस की नेशनल फ़्रंट या ब्रिटेन की यूकिप जैसी यूरोपीय संघ विरोधी पार्टियों के लिए यह संकट उनके तर्क को मजबूत करेगा.
एक और समस्या है, इटली के साथ ग्रीस को भी मध्यपूर्व और उत्तर अफ़्रीका से आने वाले आप्रवासियों का भार सहना पड़ रहा है.
ग्रीस के रक्षा मंत्री पैनोस कैमेनोस ने धमकी दी थी कि अगर ग्रीस को दिवालिया होने दिया गया तो वो पूरे यूरोप को आप्रवासियों से ‘पाट’ देगा.
3. अमरीका बेहद चिंतित है.

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बातचीत कितनी गंभीर हो गई है, इस बात का अंदाजा इस बात से मिलता है कि राष्ट्रपति ओबामा ने पिछले हफ़्ते सिप्रास पर ‘कड़े राजनीतिक विकल्प’ चुनने के लिए दबाव डाला था.
हालांकि पहले ही वॉशिंगटन ने ग्रीस के यूरो ज़ोन से निकलने के असर को लेकर चेतावनी दे दी थी लेकिन ओबामा का हस्तक्षेप उसके इस डर को दिखाता है कि ग्रीस रूस की बाहों में न चला जाए.
यूरो को छोड़ने के बाद ग्रीस को मज़बूरन रूस की सहायता लेनी पड़ सकती है, हालांकि यह अभी साफ नहीं है कि मॉस्को इसकी क्या क़ीमत वसूलेगा.
सिप्रास ने पहले ही यूक्रेन के मसले पर रूस पर प्रतिबंध का विरोध कर यूरोपीय एकता को चुनौती दी थी.
ग्रीस नेटो का भी सदस्य है. अमरीका में जर्मनी के राजदूत रहे <link type="page"><caption> वोल्फ़गैंग इशिंगर ने कहा है</caption><url href="http://www.bloomberg.com/news/articles/2015-06-19/nato-sees-greek-exit-from-euro-as-security-risk-vershbow-says" platform="highweb"/></link>, “अगर ग्रीस बाहर होता है, तो यह तय है कि इसे मॉस्को में रूस की थ्योरी को बल मिलेगा कि यूरोपीय संघ अपने अवसान की ओर है और जल्द ही बिखर जाएगा.”
4. बाकी देश भी ग्रीस की राह पकड़ सकते हैं.

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सबसे बड़ा डर यह है कि अगर ग्रीस बाहर होता है तो बाकी देशों पर भी इसका असर पड़ेगा.
हालांकि यूरोपीय संघ ने वित्तीय मुश्किलों को बाकी सदस्य देशों से अलग कर रखा है लेकिन ग्रीस बाहर जाता है तो ऐसा उस समय होगा जब यूरोप की अर्थव्यवस्था सुधर रही है.
अमरीकी ट्रेज़री सेक्रेटरी जैक लियू का मानना है कि यह मानना ग़लत होगा कि इसका कोई असर नहीं पड़ेगा. इससे पहले बेलआउट पैकेज पा चुके आयरलैंड और पुर्तगाल जैसे देश फिर से संकट में फंस सकते हैं.
यूरोपीय संघ में एक मुद्रा की जो योजना थी, उस पर फिर से विचार ज़रूरी हो जाएगा.
यूरोपीय संघ आयोग ने एक बार यूरो ज़ोन की सदस्यता को ‘अचल’ बताया था लेकिन ग्रीस के बाहर होने के साथ ही यह पलट जाएगा.
5. वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा असर

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हालांकि विश्व अर्थव्यवस्था में ग्रीस की बहुत छोटी हिस्सेदारी है, लेकिन गोल्डमैन सैक्स के पूर्व मुखिया (इकोनॉमिक्स) जिम ओ नील की एक गणना के मुताबिक़, चीन हर तीन महीने में ग्रीस जितनी अर्थव्यवस्था के बराबर उत्पादन करता है.
लेकिन दुनिया की एक बड़ी ताक़तवर मुद्रा में ग्रीस की भूमिका होने का मतलब, उसका उससे बाहर जाने को हल्के में नहीं लिया जा सकता.
ग्रीस के साथ बेलआउट पैकेज पर समझौते की हर ख़बर पर शेयर मार्केट गिर और उठ रहे हैं और उनमें एक संशय का भाव बना हुआ है.
ग्रीस के कर्ज़दाता यूरोपीय सेंट्रल बैंक और अन्य यूरोपीय देशों को भी इसका सीधा नुकसान उठाना पड़ेगा.
यहां तक कि अगर कोई समझौता हो भी जाता है तो भी समस्या रातों रात हल नहीं हो जाएगी. ना ही एक मुद्रा की आलोचना का जवाब मिलेगा और आगे भी अनिश्चितता बनी रहेगी.
<link type="page"><caption> इकोनॉमिस्ट मैगज़ीन</caption><url href="http://www.economist.com/news/leaders/21654598-greece-and-euro-zone-are-stuck-abusive-relationship-my-big-fat-greek-divorce" platform="highweb"/></link> का कहना है, “शादी टिकी रह सकती है लेकिन यह पहले की अपेक्षा ज़्यादा पीड़ादायी होगी.”
<bold>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए <link type="page"><caption> यहां क्लिक</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link> करें. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)</bold>













