माँएं क्यों करती है अपने बच्चों का अपहरण?

- Author, दिव्या तलवार और कैट्रिन नेय
- पदनाम, बीबीसी एशियन नेटवर्क एंड विक्टोरिया डर्बीशायर प्रोग्राम
अपने अभिभावकों द्वारा ही ब्रितानी बच्चों का अपहरण और उन्हें विदेश ले जाने की घटनाओं में हाल के समय में नाटकीय वृद्धि हुई है.
इस तरह से बच्चों के अपहरण और कस्टडी को लेकर होने वाली क़ानूनी लड़ाईयों में भी उतनी ही तेजी से वृद्धि आई है.
ऐसी ही एक कहानी है एमी की. वे अपने तीन साल के बेटे अनीस (बदला हुआ नाम) को लेकर दो साल पहले भारत चली आई थीं.
बेंगलुरू के एक उपनगरीय इलाक़े में अपने माँ बाप के साथ रह रहीं एमी की माँ, अपनी बेटी की दर्द भरी दास्तान सुनकर भावुक हो जाती हैं.
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एमी की शादी भारतीय मूल के एक ब्रितानी नागरिक से हुई थी. उसके साथ उनकी मुलाक़ात इंटरनेट पर हुई थी.
एमी कहती हैं कि, शुरुआत में यह एक ठीक रिश्ता लगा और वो इंग्लैंड चली गईं. वे जल्द ही प्रेग्नेंट हो गईं.
लेकिन उनके पति ने उन पर हावी होना शुरू कर दिया और एमी को उनके घरवालों से बात नहीं करने देते थे.
वे बताती हैं, “मैं जब भी कभी फ़ोन करती तो माँ रोने लगतीं, क्योंकि बहुत दिनों तक उन्हें हमारी कोई ख़बर ही नहीं रहती थी. पति फ़ोन पर कह देते कि मैं नहीं हूँ.”
आख़िरकार यह रिश्ता टूट गया. एमी के पति ने कहा कि वो तलाक़ चाहते हैं.
एमी कहती हैं कि उन्हें इस बात का डर था कि बच्चे को वो छीन लेंगे.
आख़िरकार एमी ने ये कहते हुए घर छोड़ दिया कि वो अपने दोस्तों के साथ रहने जा रही हैं. लेकिन कुछ ही सप्ताह में उन्हें पता चला कि उनकी मदद करने वाला कोई नहीं बचा.
रिश्ता टूटा

एमी कहती हैं, “रुकने के लिए मेरे पास कोई जगह नहीं थी. मैंने सोचा कि अब पति के साथ तो रहना संभव नहीं था, क्योंकि इससे मेरा बच्चा छिन जाता. मेरे लिए केवल माँ-बाप का ही घर बचा था.”
वे कहती हैं, “मेरी पूरी ऊर्जा और आत्मविश्वास खत्म हो गया था. मैं पूरी तरह से टूट चुकी थी.”
अब एमी यहीं रहते हुए अनीस की कस्टडी के लिए भारतीय अदालत के मार्फ़त कोशिश कर रही हैं.
उनके पूर्व पति इस बारे में जानते हैं कि वो लोग कहां हैं और एमी को हर दो सप्ताह में बेंगलुरू की एक अदालत में पेश होना पड़ता है. उनके ख़िलाफ़ इंग्लैंड लौटने का आदेश भी है.
इस तरह के अधिकांश मामलों में हमेशा यह नहीं कहा जा सकता कि दोषी कौन है. बहुत सी जानकारियां रिश्ते में रह रहे दो लोगों को ही पता होती हैं, लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में सबसे ज़्यादा दुख बच्चों को उठाना पड़ता है.
सरफ़राज़ की कहानी

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सरफ़राज़ ख़ान की बेटी अमीना को उनकी ही माँ (सरफ़राज़ की पत्नी) ने चार साल पहले अपहृत कर लिया था.
ख़ान अपनी बेटी से मिलने के लिए पांच बार पाकिस्तान की यात्रा कर चुके हैं, क्योंकि उनकी बेटी और पत्नी के पाकिस्तान में आने के रिकॉर्ड हैं,. लेकिन अभी भी उनका पता नहीं लग पाया है.
वे कहते हैं कि वो पूरी तरह असहाय महसूस करते हैं और उनके पास केवल कोर्ट का एक आदेश है, जिसमें अमीना की माँ और उनके परिजनों से उनकी बेटी को वापस भेजने या उनके बारे में कोई जानकारी देने को कहा गया है.

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ब्रिटेन में उनके घर बेडरूम में अमीना की स्कूल ड्रेस और खिलौने वैसे ही पड़े हुए हैं, जैसे उनके जाने के समय रखे गए थे.
सरफ़राज़ कहते हैं, “जब अमीना आएगी तो मैं उसे बताउंगा कि मैं कभी भी उसे नहीं भूला.”
हालांकि उन्होंने दूसरी शादी कर ली है और उनके दो बच्चे हैं लेकिन वो कहते हैं कि अमीना को खोने से इन बच्चों से जुड़ना भी बहुत कठिन होता है.
ऐसी धारणा है कि पिता ही बच्चों का सबसे ज़्यादा अपहरण करते हैं, लेकिन <link type="page"><caption> रीयूनाइट संस्था</caption><url href="http://www.reunite.org/" platform="highweb"/></link> के अनुसार, इस तरह के 70 फ़ीसदी मामलों में माँओं का हाथ होता है.
ईमेल से ढूंढा बेटे को

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इसी तरह की एक घटना मोहम्मद शेख़ के साथ घटी.
उनका 11 साल का बेटा अभी उनके पास है, लेकिन उन्हें हमेशा ही इस बात का डर लगता है कि वो फिर उनसे दूर ना हो जाए.
उनका बेटा रमीज़ जब पांच साल का था तो उनकी पूर्व पत्नी उन्हें लेकर यूएई चली गईं. चूंकि <link type="page"><caption> हेग संधि</caption><url href="http://www.hcch.net/index_en.php?act=text.display&tid=21" platform="highweb"/></link> यूएई के साथ नहीं थी, इसलिए उन्हें खोजना मुश्किल था.
मोहम्मद ने उन्हें तलाशने का एक अनोखा तरीक़ा अपनाया. उन्होंने अपनी पूर्व-पत्नी को एक ईमेल भेजा. ईमेल की लोकेशन पता करने का भी एक तरीक़ा होता है, यह ग़ैरक़ानूनी नहीं है.
वे कहते हैं, “इस तरह मुझे यूएई में शारजाह में किसी कम्प्यूटर का आईपी एड्रेस मिला. मैंने दुबई में रह रहे अपने भाई से सम्पर्क किया, उन्होंने वहां जाकर पता लगाया.”
और इस तरह उन्हें अपना बेटा वापस मिला. अब उऩके पास उसकी कस्टडी भी है.
अपहरण के मामले

सूचना की आज़ादी एक्ट के तहत मिली जानकारी के अनुसार, साल 2014 में ब्रिटेन में ऐसे 477 मामले दर्ज किए गए. यह 2005 के 226 मामलों के आंकड़े के मुक़ाबले दो गुने से ज़्यादा है.
गैर सरकारी संस्था रीयूनाइट के अनुसार, वास्तविक आंकड़े इससे भी ज़्यादा हो सकते हैं क्योंकि साल 2014 में इससे संबंधित 17,000 फ़ोन कॉल्स दर्ज किए गए थे.
सबसे बड़ी समस्या है कि बच्चों को ऐसे देशों में ले जाया जाता है, जिन्होंने हेग संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं. इस अंतरराष्ट्रीय संधि के तहत बच्चों की तत्काल वापसी का रास्ता आसान बनाया जाता है.
इस तरह के देशों में पाकिस्तान और भारत सबसे ऊपर हैं, इसके बाद नंबर आता है सोमालिया, नाइजीरिया और मिस्र का.
रिश्तों के अधिकाधिक टूटने, आसानी से आने-जाने की सुविधा और दो देशों के नागरिकों के बीच रिश्ते इस समस्या के मुख्य कारण हैं.
लेकिन एक बार बच्चों के दूसरे देश में चले जाने के बाद उनकी वापसी बहुत मुश्किल होती है.
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