चीन-पाक सिल्क रोड है गेम चेंजर?

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- Author, एम इलियास ख़ान
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, इस्लामाबाद
चीन ने पाकिस्तान के साथ 46 अरब डॉलर के निवेश की घोषणा की है.
इस <link type="page"><caption> निवेश का</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/news/world-asia-32377088" platform="highweb"/></link> अधिकांश हिस्सा पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह से लेकर चीन के शिनजियांग प्रांत के काशगर तक जाने वाले आर्थिक कॉरीडोर पर ख़र्च होगा.
क्या यह परियोजना पाकिस्तान और साथ ही चीन के लिए गेमचेंजर साबित होगा? आईए पांच बिंदुओं में इसके महत्व को समझने की कोशिश करते हैं.
क्यों हो रही है इतनी चर्चा?
चीन इस परियोजना के मार्फ़त पाकिस्तान में धन की जितनी बारिश करने की योजना बना रहा है वो साल 2008 से पाकिस्तान में होने वाले सभी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के दोगुने से भी ज़्यादा है.
चीन का यह निवेश साल 2002 से अब तक पाकिस्तान को अमरीका से मिली कुल आर्थिक सहायता से भी ज़्यादा है.
पाकिस्तानी अधिकारियों का कहना है कि एकाध को छोड़ अधिकांश परियोजनाओं के पूरा होने में एक से तीन साल लगेंगे. इसलिए निवेश थोड़ा-थोड़ा कर कई सालों में नहीं आएगा, जैसा कि अमरीकी सहायता के साथ हुआ है.

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यह निवेश चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (सीपीईसी) पर अधिक केंद्रित है. यातायात और ऊर्जा का मिला-जुला यह प्रोजेक्ट समंदर में बंदरगाह को विकसित करेगा जो भारतीय हिंद महासागर तक चीन की पहुंच का रास्ता खोल देगा.
विशेषज्ञों का कहना है कि इससे रोज़गार के अवसरों में वृद्धि होगी और पिछले तीन दशकों से खस्ता हालत में चल रही पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को संजीवनी मिलेगी.
हालांकि रक्षा विशेषज्ञ प्रोफ़ेसर हसन अस्क़री रिज़्वी का कहना है कि असल गेमचेंजर सौदा नहीं, बल्कि समय से परियोजना का पूरा होना है.
इतने विशाल फ़ंड का क्या होगा?
अधिकारी मानते हैं कि साल 2010 में चीन और पाकिस्तान के बीच हुए कुछ समझौते अभी भी पूरे नहीं हो पाए.
अगर इस मामले में भी ऐसा हुआ तो, ये अयोग्यता, भ्रष्टाचार और पारदर्शिता की कमी की वजह से होगा.

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कुछ भ्रष्टाचार की उम्मीद तो दोनों तरफ़ से की जा सकती है और दोनों देश पारदर्शिता को बढ़ावा देने के लिए नहीं जाने जाते.
इसमें से कितना धन कर्ज़ के रूप में, कितना अनुदान के रूप में और कितना सार्वजनिक-निज़ी भागीदारी के तहत आ रहा है, हो सकता है इसके बारे में हमें बहुत बाद में पता चले.
आर्थिक गलियारे के रास्ते को लेकर पाकिस्तान के अंदर भी राजनीतिक विवाद बढ़ रहा है.
आर्थिक विशेषज्ञ डॉ. क़ैसर बंगाली कहते हैं कि तमाम मुश्किलों के अलावा पाकिस्तान को देश के पश्चिमोत्तर प्रांत में चरमपंथ पर काबू पाना होगा.
उनके मुताबिक़, ऐसे समय में इतने बड़े पैमाने पर चीनी निवेश का मतलब है कि आर्थिक हालात बदलने के लिए पाकिस्तान के लिए यह ‘जीवन में एक बार’ मिलने वाला मौका है.
चरमपंथियों का क्या होगा?

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आर्थिक गलियारा ग्वादर से शुरू होकर काशगर तक जाएगा.
ग्वादर बलूचिस्तान के अरब सागर तट पर स्थित है. पाकिस्तान के दक्षिण-पश्चिम का यह हिस्सा दशकों से अलगाववादी विद्रोह का शिकार है.
जबकि काशगर चीन के मुस्लिम बहुल इलाक़े शिनजियांग में स्थित है. यहां वीगर मुस्लिम आबादी रहती है और 1990 के दशक से ही यहां अलगाववादी आंदोलन चल रहा है. हाल के दिनों में यहां हिंसा में बढ़ोत्तरी हुई है और चीन इसके लिए अलगाववादी ‘आतंकियों’ को ज़िम्मेदार ठहराता है.
आर्थिक गलियारा उन इलाक़ों से होकर गुज़रेगा जो पाकिस्तान तालिबान लड़ाकों के हमले की ज़द में आते हैं.
अभी तक अफ़ग़ानिस्तान से सटे इन इलाक़ों पर इन्हीं का क़ब्ज़ा है और चीन के बाहर वीगर ‘आतंकियों’ की शरणस्थली है.

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हालांकि पिछले जून से शुरू हुए पाकिस्तानी सेना के अभियान से इन्हें नुकासान हुआ है.
वीगर और पाकिस्तानी तालिबान चरमपंथी, पाकिस्तान में चीनी नागरिकों को निशाना बनाते रहे हैं.
एक पूर्व राजनयिक अशरफ़ जहांगीर क़ाजी ने एक टीवी बहस में कहा था कि पाकिस्तानी सेना ने इस 3,000 किलोमीटर लंबे आर्थिक गलियारे की सुरक्षा के लिए विशेष सुरक्षा बल बनाने का निर्णय लिया है.
कई लोगों मानना है कि हालांकि नाटो सेना को सुरक्षित रास्ता पाकिस्तानी सेना नहीं मुहैया करा पाई लेकिन बलोच विद्रोहियों को अलग-थलग करने के लिए वो इस बार काफ़ी मुस्तैद होगी.
चीन क्यों कर रहा है ऐसा?

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चीन पाकिस्तान को सैन्य साजो-सामान मुहैया कराने में अमरीका के मुक़ाबले अधिक भरोसेमंद और कम झंझट वाला रहा है.
इस कारण पाकिस्तानी अपने पुराने दुश्मन भारत के ख़िलाफ़ चीन को अपना खामोश सहयोगी मानते हैं.
चीन के साथ दोस्ती के कारण पाकिस्तान को अपने ‘अधिक अस्थाई’ पश्चिमी सहयोगियों से निपटने में मदद मिलेगी.
चीनियों के लिए यह रिश्ता रणनीतिक महत्व का है. यह गलियारा चीन को मध्यपूर्व और अफ़्रीका तक पहुंचने का सबसे छोटा रास्ता मुहैया कराएगा, जहां हज़ारों चीनी कंपनियां कारोबार कर रही हैं.

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इस परियोजना से शिनजिंयाग को भी कनेक्टिविटी मिलेगी और सरकारी एवं निजी कंपनियों को रास्ते में आने वाले पिछड़े इलाकों में अपनी आर्थिक गतिविधियां चलाने का मौका मिलेगा, जिससे रोज़गार के अवसर पैदा होंगे.
वर्तमान में मध्यपूर्व, अफ़्रीका और यूरोप तक पहुंचने के लिए चीन के पास एकमात्र व्यावसायिक रास्ता मलक्का जलडमरू है. यह लंबा होने के आलावा युद्ध के समय बंद भी हो सकता है.
यही कारण है कि चीन एक पूर्वी गलियारे के बारे में भी कोशिश कर रहा है जो म्यांमार, बांग्लादेश और संभवतः भारत से होते हुए बंगाल की खाड़ी तक जाएगा.
विशेषज्ञों का कहना है कि चीन की अधिकांश गतिविधियां घरेलू आय और मांग को बढ़ाने पर केंद्रित हैं.
बाहरी मोर्चे पर चीन ऊर्जा और समुद्री रास्ते पर अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए एशिया में कई बंदरगाहों पर निवेश कर रहा है.
भारत और अमरीका क्या सोचते हैं?

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ऐसे संकेत हैं कि अफ़ग़ानिस्तान में स्थिरता लाने की भूमिका निभाने के लिए अमरीकी चीन को बढ़ावा दे रहे हैं.
पाकिस्तान में कुछ लोगों का मानना है कि इस इलाक़े से अमरीका का असर ज़ल्द ही कम हो जाएगा.
हालांकि लंबे दौर में अमरीकी निश्चित तौर पर उभरते रूस और चीन से मुक़ाबले के लिए रणनीति बनाएंगे.
इसी तरह चीन का सबसे बड़ा व्यावसायिक साझीदार होते हुए भी भारतीयों के लिए ग्वादर बंदरगाह पर चीन का नियंत्रण लंबे समय के लिए एक चिंता का विषय बन सकता है.
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