हाथ-पांव नहीं, फिर भी सफलता के शिखर पर

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- Author, पीटर बोउस
- पदनाम, बीबीसी कैपिटल
दो संस्थाओं के प्रमुख 31 वर्षीय निक वुजिकिक के दोनों हाथ और दोनों पांव नहीं हैं.
जन्म से इस विकलांगता से जूझने वाले निक के पास हौसले की कोई कमी नहीं है.
पूरी दुनिया में मोटिवेशनल स्पीकर के तौर पर मशहूर निक की कहानी एक मिसाल बन गई है जो लाखों लोगों को जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है.
बड़ा सवाल यह है कि 10 साल की उम्र में आत्महत्या का प्रयास करने वाले निक ने सफलता की कौन सी कुंजी खोज निकाली जो आम लोगों के पास नहीं है.
आख़िर क्या है निक की सफलता का राज़
निक का जन्म ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न में हुआ. जन्म के समय ही ना तो इनके हाथ थे और ना ही पांव.
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माता-पिता ही नहीं डॉक्टर भी अचरज में पड़ गए, क्योंकि इसका मेडिकल साइंस के पास भी कोई जवाब नहीं था.
<link type="page"><caption> बीबीसी कैपिटल</caption><url href="http://www.bbc.com/capital" platform="highweb"/></link> से बातचीत में निक ने बताया, "अब तक पता नहीं चल पाया कि मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ."
बाद में पता चला कि निक टेट्रा-एमेलिया सिंड्रोम नाम की दुर्लभ किस्म की जन्मजात बीमारी की चपेट में आ गए थे.
हालांकि बाएं कूल्हे के नीचे छोटे से पांव के होने से उन्हें संतुलन बिठाने में मदद मिली.
लेकिन रोजमर्रा के जीवन में तमाम मुश्किलें थी. ब्रश करने से लेकर टायलेट जाने तक...
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निक हौसले के साथ इन मुश्किलों से जूझते रहे. उनकी मेहनत ने रंग दिखाया.
आज वे किसी भी आम इंसान की तरह टाइप कर सकते हैं. अपने अंगूठे के बीच सामान फंसा लेते हैं. गेंद को किक तक कर सकते हैं.
आत्महत्या की कोशिश
इतना ही नहीं निक रोज़ाना स्विमिंग करते हैं, पानी की सतह पर सर्फिंग करते हैं और स्काई डाइविंग करने का रोमांच भी उठाते हैं.
स्विमिंग के बारे में निक कहते हैं, "इससे मुझे नया उत्साह मिलता है. ख़ुद को तरोताजा महसूस करता हूं."
लेकिन यह सब इतना आसान भी नहीं था. एक समय था कि वो अवसाद में डूब गए थे. मेलबर्न के जिस स्कूल में पढ़ते थे, वहां के लड़के उनका मजाक उड़ाते थे.
यह सब इतना असहनीय था कि महज 10 साल की उम्र में उन्होंने आत्महत्या की कोशिश की थी.
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17 साल की उम्र में उनके हाई स्कूल में सफ़ाई और रखरखाव के इंचार्ज ने उन्हें बहुत प्रेरित किया और सार्वजनिक तौर पर व्याख्यान देने की सलाह दी.
एक सलाह जिसने किस्मत बदली
निक ने उनके बारे में बताया, "मेरी उनसे दोस्ती हो गई थी. उन्होंने मुझे कहा तुम्हें स्पीकर होना चाहिए. मैंने कहा कि मैं क्या बोलूंगा? तो उसने कहा कि तुम्हें अपनी कहानी लोगों को बतानी चाहिए."
इस एक सलाह ने निक की किस्मत बदल दी. उन्होंने पॉजिटिव एटीट्यूड को अपनाना शुरू किया.
तब से निक ने अब तक दुनिया भर में कई व्याख्यान दिए हैं. करीब 50 देशों में बीते 15 साल में निक ने हजारों व्याख्यान दिए हैं.
उन्होंने अपने अनुभवों पर अधारित किताब 'मेमायर लव विदाउट लिमिट्स' लिखी है.
निक मौजूदा समय में लाइफ विदाउट लिंब्स और एटीट्यूट इज एटीट्यूड नामक दो संस्थाओं के मुखिया हैं.
ये संस्थाएँ दुनिया भर में विकलांग लोगों के बीच उम्मीद और भरोसा जगाने की दिशा में काम करती है.
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दुनिया भर के विकलांग लोगों के लिए निक एक उम्मीद की किरण हैं.
निक कहते हैं कि विकलांग लोगों को व्हील चेयर देने या उनके लिए कोई इमारत बनाने से बदलाव नहीं आएगा, उन्हें भरोसा देने की जरूरत है कि आप भी कुछ कर सकते हैं.
उम्मीद का भरोसा
निक कहते हैं, "जब दूसरे लोग अपने सपनों को हासिल कर सकते हैं तो हमें भी कोशिश करनी चाहिए. मैं अपनी ओर से पूरी कोशिश करता हूं. हमें ज़रूर कोशिश करनी चाहिए."
निक विकलांग लोगों से अपील करते हैं, "कभी कोशिश करने से डरना नहीं चाहिए, नाकामी से डरना नहीं चाहिए और किसी बात के लिए हिचक भी नहीं होनी चाहिए. किसी बात के लिए शर्म भी नहीं करनी चाहिए."
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निक अब लॉस एंजलिस में रहते हैं, अपनी पत्नी केन और दो साल के बेटे के साथ. इस साल निक दूसरे बच्चे के पिता बनने वाले हैं. साफ़ है कि जीवन के सफर में तमाम मुश्किलों के बावजूद निक ना तो रुके और ना उन्हें कोई रोक पाया.
<italic><bold>(अंग्रेज़ी में <link type="page"><caption> मूल लेख</caption><url href="http://www.bbc.com/capital/story/20150318-leading-without-limbs" platform="highweb"/></link> यहाँ पढ़ें, जो <link type="page"><caption> बीबीसी कैपिटल</caption><url href="http://www.bbc.com/capital" platform="highweb"/></link> पर उपलब्ध है.)</bold></italic>
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