अगर हो हिलेरी क्लिंटन-जेब बुश की टक्कर.....

व्हाईट हाउस

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    • Author, ब्रजेश उपाध्याय
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, वॉशिंगटन

वॉशिंगटन की हवा में बहार आने की आहट सुनाई देने लगी है. हर दूसरे दिन होनेवाली बर्फ़बारी के बाद ज़मीन पर जमी बर्फ़ पिघल रही है.

बर्फ़ के नीचे दबे डैफ़ोडिल्स बाहर आने को किस क़दर बेताब हो रहे हैं, उसकी झलक भी दिखने लगी है. साथ ही यहां की सियासत भी कुछ बेताब सी हो रही है.

कांग्रेस में कुछ रिपब्लिकन सीनेटरों की बेताबी तो ऐसी है कि अपने ही राष्ट्रपति के ख़िलाफ़ भाषण देने के लिए इसरायल के प्रधानमंत्री को बुला लेते हैं.

उससे भी दिल नहीं भरा तो ईरान के सुप्रीम लीडर को ख़त लिख दिया कि ओबामा पर यक़ीन मत करना. ये वही मुल्क है जिसे वो बचपन से ही अपना सबसे बड़ा दुश्मन कहते आए हैं.

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बराक ओबामा

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ख़ासियत ये है कि इनमें से कुछ तो ऐसे भी हैं जिन्हें कांग्रेस में आए मुश्किल से दो महीने भी नहीं हुए, लेकिन मानो ठान कर आए हैं कि व्हाइट हाउस जल्द से जल्द खाली करवाना है.

दरअसल सियासत होती ही है बेताब चीज़.

जैसे जम्मू कश्मीर में ही देखिए-मुफ़्ती साहब और मोदीजी को गले मिले हफ़्ता भी नहीं गुज़रा था, गले मिलने के बाद कपड़ों में जो सिलवटें आई थीं वो भी सीधी नहीं हुई थीं कि चाकू-खंजर निकल आए हैं.

कोई भरोसा नहीं कि जब तक आप ये पढ़ रहे हों तब तक "मैं अपने रास्ते, तू अपने रास्ते" का फ़ैसला न हो गया हो या फिर नए सिरे से गले मिलने की तैयारी हो रही हो.

राष्ट्रपति चुनाव

हिलेरी और बिल क्लिंटन

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वॉशिंगटन की सियासी बेताबी पर लौटें तो बड़ी बेसब्री से इंतज़ार हो रहा है कि कौन-कौन रिपब्लिकन और डेमोक्रेट 2016 के राष्ट्रपति चुनाव की उम्मीदवारी के लिए टोपी डालने का औपचारिक तौर पर एलान करते हैं.

ख़बर आ रही है कि बुश खानदान के ज़्यादा सलीकेदार और समझदार कहे जाने वाले चिराग, जेब बुश के चुनावी फंड में हर दिन दस लाख डॉलर का चंदा आ रहा है.

आख़िर बाप-भाई की ताक़त कुछ तो मायने रखती है.

वहीं क्लिंटन परिवार एक बार फिर से व्हाइट हाउस की चाभी की रेस में शामिल होने का एलान कब करता है, उसके लिए भी दिन गिने जा रहे हैं.

लेकिन लगता है कि फ़िलहाल ये गिनती कुछ और हफ़्ते या महीने चल सकती है.

हिलेरी की दावेदारी

हिलेरी क्लिंटन

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क़ायदे से तो हिलेरी क्लिंटन ने समां बांधना शुरू कर दिया था, महिलाओं के अधिकारों के लिए भाषणों का सिलसिला तेज़ हो गया था.

कमांडर इन चीफ़ की तरह गॉगल्स लगाकर ईमेल देखते हुए तस्वीरें जारी करनी शुरू कर दी थीं, चुनावी टीम में कौन-कौन से दिग्गज शामिल हो रहे हैं, उनके बारे में ख़बरें लीक होनी शुरू हो गई थीं.

लेकिन तभी झटका दिया न्यूयॉर्क टाइम्स ने कि जब वो विदेश मंत्री थीं तो उन्होंने सरकारी ईमेल एकाउंट नहीं बनवाया और निजी ईमेल से ही सरकारी काम करती रहीं.

इतना ही नहीं, उन्होंने कुर्सी छोड़ने के कई महीनों बाद अपने ईमेल से सरकारी ईमेल विदेश विभाग को तो सौंप दिए, पूरा एकाउंट उनके हवाले नहीं किया और पूरे एकाउंट में सरकारी ईमेल कौन से थे, ये भी उन्होंने खुद ही तय किया.

क्लिंटन और विवाद

क्लिंटन, ओबामा और बुश

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सवाल उठने शुरू हो गए हैं. क्लिंटन ने कहा है कि उन्होंने बस सहूलियत की वजह से एक ही मेल रखा था.

लेकिन उनकी उस तथाकथित सहूलियत ने मीडिया और रिपब्लिकंस दोनों को ही उन्हें कटघरे में खड़ा करने का पूरा मसाला दे दिया है. देखें कैसे उबरती हैं वो इससे.

बिल क्लिंटन ने भी जब वर्ष 1991 में अपनी उम्मीदवारी का एलान किया था तो एक टीवी रिपोर्टर जेनिफ़र फ्लावर्स के साथ उनके सेक्स संबंधों की ख़बरें आने लगी थीं.

लेकिन मामला बिल्कुल हाथ से निकलता, उसके पहले हिलेरी ने टीवी पर उनके साथ बैठकर इंटरव्यू दे दिया कि ''मेरा पति मेरा देवता है''.

पांच-छह साल बाद जब बिल का दिल एक दो जगह और भी फ़िसला तब जाकर पता चला कि पहले वाले इल्ज़ाम भी सही थे.

हिलेरी और बिल क्लिंटन

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तो क्लिंटन और कॉंट्रोवर्सी का गुड़ और मक्खी वाला रिश्ता रहा है और ख़ासियत है कि वो इसमें से निकल भी आते हैं.

हमारी तो ख्वाहिश है कि वो इस बार भी निकल आएं क्योंकि एक बार फिर से अमरीकी सियासत में बुश और क्लिंटन की टक्कर हो तो इंडिया-पाकिस्तान के क्रिकेट फ़ाइनल जैसा मज़ा आ जाए.

फ़िलहाल तो ये लग रहा है जैसे बहार के आने से ही पहले फिर से बर्फ़बारी का माहौल बन गया है.

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