क्या सौर ऊर्जा परमाणु बिजली से बेहतर है?

राष्ट्रपति बराक ओबामा, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

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    • Author, विवेक वाधवा
    • पदनाम, फ़ेलो, स्टैनफ़ोर्ड यूनीवर्सिटी

राष्ट्रपति बराक ओबामा यक़ीनन मोदी सरकार को अच्छी सलाह देंगे कि किस तरह से भारतीय अर्थव्यवस्था को खोलें ताकि देश का फ़ायदा हो.

लेकिन ओबामा पर विशेष हितों के लिए काम करने वाले समूहों का दबाव है और वे ऐसी चीज़ों की मांग कर सकते हैं जो वे दिल से जानते हैं कि भारत और विश्व के लिए ठीक नहीं है.

साफ़ तौर पर कहें तो ओबामा भारत के न्यूक्लियर लायबिलिटी से छूट की मांग कर सकते हैं और मोदी पर अमरीकी कंपनियों से परमाणु रिएक्टर ख़रीदने के लिए दबाव बना सकते हैं.

दो दशक पहले इस तरह के मुद्दों की अहमियत समझी जा सकती थी लेकिन तब स्वच्छ ऊर्जा के कम ही विकल्प थे और अब हालात बदल गए हैं.

पढ़े विस्तार से

सौर ऊर्जा, भारत

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सौर और पवन ऊर्जा से जुड़ी तकनीकी इतनी तेज़ी से विकसित हो रही हैं कि जब पहली परमाणु भट्टी स्थापित होगी, वैकल्पिक ऊर्जा के स्रोत परमाणु ऊर्जा और पेट्रोल-डीज़ल जैसे जीवाश्म ईंधन से सस्ते होंगे.

ये नई तकनीकी पहले से स्वच्छ और सुरक्षित भी होगी. अब सौर ऊर्जा को ही लें जिसकी अहमियत अमरीका में बढ़ गई है क्योंकि नाकाम हो चुकी सौर ऊर्जा कंपनियों को राष्ट्रपति ओबामा ने सहयोग देने की बात कही है.

आलोचकों का कहना है कि सौर ऊर्जा बेअसर है, महंगी है और ग़ैरभरोसेमंद है. सरकारी मदद के बग़ैर यह नाकाम हो जाएगी.

सौर ऊर्जा विश्व की ऊर्जा ज़रूरतों का एक फ़ीसदी ही पूरा कर पाती है. हमें जीवाश्म और परमाणु ऊर्जा पर अपना दांव दोगुना कर देने की ज़रूरत है. लेकिन वे ग़लत हैं.

पारंपरिक स्रोत

पनबिजली परियोजना

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पिछले 30 सालों से सौर ऊर्जा का उत्पादन हर दो साल पर दोगुना हो रहा है. इससे लागत में भी कमी आई है.

अगर इसी रफ़्तार से चलता रहा तो रोज़मर्रा की जरूरतें पूरी करने के लिहाज़ से सौर ऊर्जा के उत्पादन में छह बार दोगुना होना है और इसमें 14 साल से भी कम समय लगेगा. इसमें भी हम धरती पर गिरने वाली सूर्य की किरणों के दस हज़ार में से एक हिस्से का ही इस्तेमाल कर रहे होंगे.

जर्मनी, स्पेन, पुर्तगाल और ऑस्ट्रेलिया जैसी जगहों, अमरीका के कुछ हिस्सों और भारत के भी एक बड़े हिस्से में सौर ऊर्जा का उत्पादन उस स्तर पर पहुंच गया है जहां उसकी लागत पारंपरिक ऊर्जा के क़रीब पहुंच गई है.

दूसरे शब्दों में कहें तो लंबे अंतराल में सौर ऊर्जा के पैनल लगाने की लागत में पारंपरिक ऊर्जा से ज़्यादा लागत नहीं आती है.

बिना सब्सिडी के!

परमाणु ऊर्जा

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अकेले पिछले पांच सालों में सौर ऊर्जा पैनल की क़ीमतों में 75 फ़ीसदी तक की गिरावट आई है. जैसे-जैसे इनके निर्माण की तकनीकी में सुधार आएगा और उत्पादन का स्तर बढ़ेगा, ये क़ीमतें और गिरेंगी.

साल 2020 तक सौर ऊर्जा क़ीमतों के लिहाज़ से पारंपरिक ऊर्जा से प्रतिस्पर्द्धात्मक होंगी. और दुनिया के ज़्यादातर हिस्सों में बिना सब्सिडी के उपलब्ध होंगी.

इसके बाद भी क़ीमतों में गिरावट जारी रहेगी और इसकी कार्यकुशलता में इसके बाद भी इज़ाफ़ा होता रहेगा. साल 2020 के अंत तक इसमें जीवाश्म ऊर्जा और परमाणु ऊर्जा पर आने वाली लागत का एक हिस्सा ही ख़र्च बैठेगा.

उत्पादन और भंडारण

पवन ऊर्जा

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हां, ऊर्जा के स्टोरेज का सवाल रह जाता है क्योंकि बैटरियों की क्षमता सीमित होती है. लेकिन अगले दशक तक गांव के आकार वाली स्टोरेज यूनिट भी मुमकिन हो पाएगी और ये क़ीमत के लिहाज़ से वाजिब भीं होंगी और पर्याप्त भी.

इससे जीर्ण शीर्ण अवस्था में पहुंच गए भारत के नेशनल इलेक्ट्रिसिटी ग्रिड की समस्याएं भी धीरे-धीरे दूर होंगी. ऊर्जा का स्थानीय स्तर पर उत्पादन और भंडारण किया जा सकेगा.

सौर ऊर्जा

पवन ऊर्जा, बायो ऊर्जा, ताप विद्युत और कचरे के अपघटन से बनने वाली बिजली और अन्य प्रकार की ऊर्जा तकनीकें तेज़ रफ़्तार से विकसित हो रही हैं और भारत में इन्हें लगाना व्यावहारिक होता जा रहा है.

उदाहरण के तौर पर पवन ऊर्जा भारत और दुनिया के ज़्यादातर हिस्सों में नए ताप विद्युत संयंत्रों से अधिक प्रतिस्पर्द्धात्मक हैं.

तकनीकी के मौजूदा स्तर में दुनिया की बराबरी करने की कोशिश की बजाय भारत के पास बड़ी छलांग लगाने का एक बेहतरीन मौक़ा है.

(विवेक वाधवा को अमरीका की सिलिकॉन वैली में स्टार्ट अप गुरु माना जाता है.)

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