नेपाल संविधानः कब ख़त्म होगा इंतजार

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    • Author, सुरेन्द्र फुयाल
    • पदनाम, बीबीसी नेपाली सेवा

नेपाल में नए संविधान के निर्माण की प्रक्रिया भले ही ख़ून ख़राबे वाली न हो लेकिन इसके लिए इंतज़ार लंबा और तकलीफ़देह होता जा रहा है

इसके लिए पूर्व विद्रोही माओवादियों ने 1996 से 2006 तक तक़रीबन दशक एक दशक तक 'पीपुल्स वॉर' जारी रखा और इसके लिए दक्षिणी नेपाल के मधेसी नेता 2006 और 2007 की लगातार दो सर्दियों में सड़क पर उतर आए थे.

और नेपाल के लोगों ने इसके लिए बहादुरी के साथ एक हिंसक गृहयुद्ध का सामना किया, जिसमें 1700 नेपालियों की जान चली गई थी. उन्होंने सामाजिक और आर्थिक नज़रिए से भी एक बेहद ख़राब दौर देखा.

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पुष्प कुमार दहल

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जैसा कि नेपाल के राजनेता कहते हैं, जनता के एक सच्चे संविधान के लिए नेपाली लोगों ने बेहतर भविष्य के लिए राजशाही के ढांचे को भी अलविदा कह दिया.

पचास के दशक के बाद जब नेपाल ने अपने दरवाजे बाहरी दुनिया के लिए खोलना शुरू किया था और हिंदू राजशाही के तहत लोकतांत्रिक तौर तरीक़े अपनाए जाने लगे थे, तो नेपाल का संविधान आयोगों के मार्फत लिखा गया था.

तब आयोगों के सदस्यों को राजशाही बड़ी ही सावधानी के साथ चुनती थी.

माओवादियों के हिंसक विद्रोह के ख़त्म होने के बाद मई, 2008 में पहली संविधान सभा का निर्वाचन हुआ.

राजनीतिक विवाद

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इससे लोगों में शांति और समृद्धि की उम्मीदें जगी थीं और माना जा रहा था कि यह संविधान सभा नया संविधान लिखेगी.

राजनीतिक विवादों की वजह से यह संविधान सभा पूरी तरह से नाकाम रही और मई 2012 तक संविधान तैयार कर लेने का इसका मक़सद अधूरा रह गया.

इस राजनीतिक विफलता के बाद दूसरी संविधान सभा नवंबर 2013 में निर्वाचित हुई.

इसकी पहली बैठक 2014 के जनवरी में हुई थी और इसने संकल्प लिया था कि 22 जनवरी 2015 तक संविधान तैयार करने का काम पूरा कर लिया जाएगा.

शांति समझौते

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इसकी तारीख पास ही है, लेकिन अभी तक कोई ठोस प्रगति हासिल नहीं हो पाई है. हक़ीकत ये है कि नए संविधान का रास्ता नेपालियों के लिए आसान नहीं है.

नवंबर 2006 में उस समय की बहुदलीय सरकार और पूर्व विद्रोही माओवादियों के बीच हुए ऐतिहासिक शांति समझौते पर दस्तख़त के बाद नेपाल एक गणतंत्र बन गया.

इस समझौते के साथ ही उस वक्त के राजा ज्ञानेंद्र को काठमांडू के नारायणहिति राजमहल से औपचारिक तौर पर बेदखल कर दिया गया. इसके साथ ही नेपाल की सदियों पुरानी राजशाही ख़त्म हो गई.

संविधान की घोषणा!

सुशील कोइराला, नेपाली प्रधानमंत्री

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इमेज कैप्शन, नेपाल के प्रधानमंत्री सुशील कोइराला.

इस शांति समझौते पर तत्कालीन प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोइराला और माओवादी नेता प्रचंड ने दस्तख़त किए थे.

समझौते के बाद मई 2008 में संविधान सभा के लिए पहली बार चुनाव हुए और नतीजतन पूर्व विद्रोही माओवादियों को सत्ता मिली क्योंकि वे सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरे थे.

माओवादियों की तरफ से सरकार की अगुवाई करने वाले दोनों नेता प्रचंड और बाबू राम भट्टाराई नए संविधान की घोषणा करने में नाकाम रहे.

सहमति नहीं!

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मई 2012 में संविधान घोषणा न कर पाने का कारण ये बताया गया कि नेपाल के राजनीतिक दल संघीय ढांचे, सरकार के स्वरूप, चुनावी व्यवस्था और न्यायिक प्रणाली जैसे मुद्दों को लेकर सहमत नहीं हो पाए.

दूसरी संविधान सभा के लिए नवंबर 2013 में जब चुनाव हुए तो इसके नतीजे चौंकाने वाले थे.

पहली संविधान सभा के उलट नंबर एक रही माओवादी पार्टी नेपाली कांग्रेस और सीपीएन-यूएमएल के बाद तीसरे पायदान पर खिसक गई.

लोगों से वादा

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2013 के बाद गठबंधन सरकार की अगुवाई कर रहे नेता सुशील कोइराला पर नए संविधान की घोषणा की जिम्मेदारी थी.

पहली संविधान सभा की नाकामी के बाद नेपाल के राजनेताओं ने लोगों से वादा किया था कि वे दूसरी संविधान सभा की पहली बैठक के छह महीने के भीतर आम सहमति बना लेंगे.

वे एक बार फिर से नाकाम हुए और उन्होंने दोबारा कहा कि किसी भी सूरत में एक साल के भीतर यानी 22 जनवरी 2015 तक नए संविधान की घोषणा कर दी जाएगी.

सहमति की कोशिश

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अब ये तारीख पास आ चुकी है. और विवादास्पद मुद्दे अब भी वैसे ही हैं जैसे साल भर पहले थे. इन मुद्दों में शामिल है, क्या नेपाल संघीय राष्ट्र बने या न बने.

इसके राज्यों के नाम और सीमाएं क्या हों. सरकार का स्वरूप कैसा हो, प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के अधिकार क्या हों, चुनावी व्यवस्था और न्यायिक प्रणाली कैसी हो.

नेपाली राजनेता प्रचंड, सुशील कोइराला, झाला नाथ खनाल
इमेज कैप्शन, नेपाली राजनेता प्रचंड, सुशील कोइराला, झाला नाथ खनाल.

इस बीच जब आख़िरी तारीख पास आ रही है तो नेपाल के राजनीतिक दल आख़िरी लम्हों में विवाद खत्म करने और आम सहमति बनाने की कोशिश जारी रखे हुए हैं.

प्रधानमंत्री सुशील कोइराला समेत सत्तारूढ़ पार्टियों के नेताओं ने 22 जनवरी से पहले आम सहमति बनाने पर जोर दिया है.

लेकिन संघीय ढांचे, सरकार के स्वरूप और चुनावी व्यवस्था के सवाल पर कड़ा रुख़ रखने वाली विपक्षी पार्टियां अपना रुख़ नरम करने पर आसानी से तैयार नहीं दिखतीं.

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