'नाकाम नहीं रही सार्क की बैठक'

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- Author, वीना सीकरी
- पदनाम, पूर्व राजनयिक
मैं ये बिलकुल नहीं मानती कि नेपाल की राजधानी में आयोजित दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) की बैठक कामयाब नहीं रही.
मेरे ख्याल से सार्क एक अंतर क्षेत्रीय मंच है और इसमें हमेशा कुछ न कुछ प्रगति होती रहती है.
इस बार तीन साल बाद बैठक हुई है और कुछ समझौतों पर हस्ताक्षर नहीं हो पाए हैं ये बात जरूर है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि सार्क का काम आगे नहीं बढ़ रहा है.
कनेक्टिविटी से जुड़े समझौते पर पाकिस्तान ने कहा है कि वे अपने यहाँ की आंतरिक कार्यवाही को पूरा नहीं कर पाए हैं, इसलिए इस पर हस्ताक्षर नहीं कर सकते हैं.
चूंकि सार्क के सारे समझौते सदस्य देशों की सहमति से होते हैं, इसलिए सारे समझौते पर हस्ताक्षर नहीं हो पाए हैं. लेकिन हमें इंतज़ार करना चाहिए, गुरुवार को कुछ समझौतों पर हस्ताक्षर हो सकते हैं.
क्षेत्रीय रिश्ते

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इतना ही नहीं, सार्क में संभावना है कि वह सब-रीजनल सहयोग के स्तर को बढ़ा सकता है. इसका ख़ास उदाहरण है कि बांग्लादेश, भूटान, नेपाल और भारत का आपसी सहयोग काफी बढ़ चुका है.
अगर ये चारों देश चाहें तो पाकिस्तान के बिना भी आपसी संपर्क को बढ़ाने पर सहमत हो सकते हैं. सार्क के अंदर सब रीजनल संबंधों को मान्य मान लिया गया है.
हाँ, ये सही है कि एक सार्क सम्मेलन से पहले रीजनल ग्रिड बनाने की बात हो रही थी. इसके अलावा रेल-रोड कनेक्टिविटी बढ़ाने की बात हो रही थी, ताकि कारोबार बढ़े, लेकिन ये नहीं हो पाया है.
लेकिन इससे मायूस होने की बहुत ज़रूरत नहीं है. हो सकता है कि पाकिस्तान अपनी आंतरिक कार्यवाही को कुछ ही हफ्ते-महीनों में पूरा कर ले जाए.
इसकी भी घोषणा हुई है कि सार्क का 19वां सम्मेलन अगले साल पाकिस्तान में ही होना है. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ ने भी इसकी घोषणा की है.
'काम बढ़ रहा है'
इससे जाहिर है कि सार्क का काम आगे बढ़ रहा है, चल रहा है.

मुझे व्यक्तिगत तौर पर उम्मीद थी कि बिजली को शेयरिंग करने के लिए रीजनल ग्रिड बनाने और कनेक्टिविटी बढ़ाने के लिए रेल-सड़क निर्माण वाले समझौते पर हस्ताक्षर हो जाएंगे.
अब ऐसा नहीं हुआ है, लेकिन गुरुवार की बैठक का इंतज़ार करना चाहिए. उसमें क्या बातचीत होती है ये देखना होगा.
वैसे भी अगर ये सार्क के जरिए नहीं होता है तो भी एशियाई रेल और रोड संपर्क को लेकर दूसरे समझौते हैं और उन पर अमल हो सकता है.
(बीबीसी संवाददाता ज़ुबैर अहमद से बातचीत पर आधारित)
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