10 साल के नक़ीब कैसे बने ख़ुदकुश हमलावर

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- Author, दाऊद आज़मी
- पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस
जाड़े की एक सुबह रिश्तेदार, पड़ोसी और ढेर सारे शुभचिंतक 10 साल के नक़ीबुल्लाह को देखने उसके चाचा के घर आए हैं.
वो उसे ज़िंदा देखकर खुश हैं. नक़ीबुल्लाह बलूचिस्तान के मदरसे से रहस्यमयी ढंग से ग़ायब हो गए थे, जहां वह तालीम पा रहे थे.
पांच महीने तक कुछ पता नहीं चला पर एक रोज़ नक़ीबुल्लाह के पड़ोसियों ने उन्हें एक अफ़ग़ान टीवी चैनल पर देखा.
नक़ीबुल्लाह कंधार में पकड़े गए चरमपंथियों की कतार में खड़े थे.
आत्मघाती

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पड़ोसी अब्दुल अहद बताते हैं, "मैं दौड़कर नक़ीबुल्लाह के चाचा के घर गया और उन्हें बताया कि उसे पुलिस ने कंधार में आत्मघाती हमले के लिए पकड़ा है."
नक़ीबुल्लाह की कहानी से पता चलता है कि तालिबान और दूसरे चरमपंथी कैसे बच्चों को आत्मघाती हमलावर के बतौर तैयार करते हैं.
नक़ीबुल्लाह ने बताया कि उसे ले जाने वालों ने उससे कहा कि वह जन्नत जाएगा और उसकी सारी मुसीबतें ख़त्म हो जाएंगी.

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अफ़ग़ानों में लड़ाका बनने की गौरवपूर्ण परंपरा रही है पर आत्मघाती हमले इसका हिस्सा नहीं थे.
अफ़ग़ानिस्तान में ख़ुदकुश हमलों की शुरुआत करीब 2005 में हुई. ऐसा ही कुछ इराक़ी जंग के मैदान में भी देखा गया.
ख़मियाज़ा
अफ़ग़ानिस्तान में 2001 से ही तालिबान के सत्ता से बेदखल होने के बाद से लड़ाई जारी है और बच्चों को इसका सबसे ज़्यादा ख़मियाजा भुगतना पड़ा है.

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बच्चों का चरमपंथियों गतिविधियों में इस्तेमाल लंबे समय से होता आया है. चाहे वह धमाके का काम हो या निगरानी और जासूसी.
अफ़ग़ान अधिकारी कहते हैं कि उन्होंने 10 साल में 250 के क़रीब बच्चों को चरमपंथियों गतिविधियों में शामिल होने के आरोपों में गिरफ़्तार किया है.
मगर जो बात सबसे ज़्यादा चिंताजनक है, वह यह कि बच्चों के ख़ुदकुश बम हमले बढ़ रहे हैं.
अफ़ग़ान पुलिस
और बच्चे सिर्फ़ इसलिए भर्ती किए जा रहे हैं कि वो बच्चे हैं.

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अफ़ग़ान सुरक्षा बलों की क्षमता बढ़ने से व्यस्क ख़ुदकुश हमलावरों को टार्गेट पर हमला करने में मुश्किल आ रही थी. इस लिहाज़ से बच्चे ज़्यादा कारगर लगते हैं क्योंकि उन्हें समझाना आसान होता है और सुरक्षा बल उन पर कम संदेह करते हैं.
हज़ारों दूसरे बच्चों की तरह नक़ीबुल्लाह के चाचा ने भी उन्हें उनके पिता के गुज़रने के बाद मदरसे में तालीम के लिए भेजा था.
पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान के ग़रीब परिवार अपने बेटों को मुफ़्त पढ़ाई और रहने के लिए मदरसा भेज देते हैं.
भर्ती

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तालिबान ऐसे मदरसों में भर्ती का काम करते हैं. हिरासत में लिए गए बच्चों से बातचीत में पता चला कि उन्हें गली मोहल्लों और ग़रीब परिवारों से भी उठाया गया था.
कई मामलों में घरवालों का कहना था कि उन्हें इसकी कोई जानकारी नहीं है.
हालांकि चरमपंथी गतिविधियों के लिए लड़कियों की भर्ती के मामले बहुत कम सामने आए हैं.

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10 साल की एक लड़की की ओर अंतरराष्ट्रीय मीडिया का ध्यान तब गया जब दक्षिणी हेलमंद प्रांत से छह जनवरी 2014 को उसे हिरासत में लिया गया.
प्रशिक्षण
लड़की ने बताया था कि उसके भाई ने एक पुलिस चौकी पर उससे ख़ुदकुश हमला करवाने की कोशिश की.
अफ़ग़ान अधिकारियों के मुताबिक़ हिरासत में लिए गए 90 फीसदी बच्चों को ख़ुदकुश हमला करने, झूठ बोलने और उनके दिमाग़ में ये सब चीज़ें पाकिस्तान में भरी गई थीं.

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इस बात के भी सबूत हैं कि अफ़ग़ानिस्तान के तालिबान नियंत्रित इलाकों में भी प्रशिक्षण दिया जा रहा है.
जन्नत

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पिछले साल अफ़ग़ानिस्तान के कुंदुज़ शहर में एक पिता ने अपने किशोर बेटे को पुलिस को सौंपा था.
उन्हें डर था कि बेटा चरमपंथी बन जाएगा. उनका परिवार साल भर पहले पाकिस्तान से लौटा था.
फ़रवरी 2011 में मर्दान शहर में स्कूल यूनीफ़ॉर्म पहने 12 साल के एक बच्चे ने खुद को उड़ा लिया था. इसमें 30 लोग मारे गए थे.

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एक अधिकारी का कहना था, "उन बच्चों को अपनी जान देने की एवज में जन्नत के ख़्वाब दिखाए गए थे, जहां दूध और शहद की नदियां बहती हैं."
निशाना
बच्चों को यह कहकर भी उकसाने की कोशिश की गई है कि अफ़ग़ान औरतों और लड़कियों का 'विदेशी हमलावर फौज' बलात्कार कर रही है और अमरीकी क़ुरान को जला रहे हैं.
ट्रेनिंग देने वाले बच्चों को सिखाते हैं कि विदेशी सैनिकों को रोकना उनकी जिम्मेदारी है और ऐसा करने पर वो और उनके माता-पिता जन्नत जाएंगे.

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इन बच्चों को किसी खास निशाने के बारे में नहीं बताया जाता. तालिबान इन आरोपों से इनकार करता है, खासकर लड़कियों की भर्ती के आरोपों से.
मगर तालिबान के एक अधिकारी ने बताया कि स्थानीय कमांडरों में से किसी ने अपनी मर्ज़ी से ऐसा किया होगा.
पुनर्वास

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उनमें से कई के लिए उम्र मायने नहीं रखती. जो कोई भी यौवन की दहलीज़ पार कर चुका है और मानसिक रूप से स्वस्थ है, लड़ने लायक माना जाता है.
अफ़ग़ान सुरक्षा अधिकारियों के मुताबिक़ चरमपंथी गतिविधियों में शामिल होने के आरोपों में 30 बच्चे अभी भी हिरासत में हैं. उनके पुनर्वास की प्रक्रिया भी जटिल है.
नक़ीबुल्लाह के चाचा को उनकी घर वापसी के लिए क़बायली नेताओं से लेकर मौलवियों और अफ़ग़ान अधिकारियों तक से संपर्क करना पड़ा.
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