तालिबान को कहां से ताक़त मिलती है?

पाकिस्तानी तालिबान, मुल्ला फ़ज़लुल्लाह

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    • Author, आकार पटेल
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए

पेशावर में शर्मनाक और हृदयविदारक हमले के बाद पाकिस्तानी तालिबान दुनिया भर में सबके निशाने पर आ गया है.

चरमपंथियों पर सख़्त कार्रवाई के लिए पाकिस्तान के सभी नेता एक मंच पर एक स्वर में बोलते नज़र आए.

लेकिन ऐसी क्या वजह है कि तालिबान लंबे समय से पाकिस्तान की सत्ता के ख़िलाफ़ संघर्ष छेड़े हुए है और पाकिस्तान सरकार उससे निबट नहीं पा रही है?

पाकिस्तानी तालिबान आख़िर चाहता क्या है और उसे शक्ति कहां से मिलती है?

पढ़िए पूरा लेख

पाकिस्तान, पेशावर आर्मी स्कूल हमला

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पाकिस्तान में संशय किस चीज़ को लेकर है? तालिबान चाहता क्या है और पाकिस्तान के लिए उससे लड़ना आसान क्यों नहीं है?

एसोसिएटेड प्रेस ने 17 दिसंबर को एक लेख छापा, "पेशावार चरमपंथी हमला, पाकिस्तानी तालिबान क्या चाहता है?"

इस सवाल का जवाब देते हुए रिपोर्ट कहती है, "टीटीपी ने सरकार को उखाड़ फेंकने और सख़्त इस्लामिक क़ानून लागू करने की क़सम खाई है."

'तालिबान चाहता क्या है' विषय पर ही सीएनएन पर लॉरा स्मिथ-स्पार्क और टिम लिस्टर के विश्लेषण में कहा गया, जब घेराबंदी अंततः ख़त्म हुई तो पाकिस्तान लड़खड़ा रहा था और दुनिया अचंभित थी. कौन ऐसा करना चाहेगा? और इससे वह क्या हासिल करना चाहते हैं?

सरकार को उखाड़ फेंकने और शरिया क़ानून लागू करने के लिए लंबे समय से संघर्ष कर रहे पाकिस्तानी तालिबान ने पेशावर हमले का श्रेय लेने में ज़रा भी देर नहीं की.

जेम्स रश ने इंडिपेंडेट में लिखा, "पाकिस्तानी तालिबान सरकार को उखाड़ फेंकने और सख़्त इस्लामिक शासन के लिए लड़ रहे हैं. कबायली क्षेत्र में भारी सैन्य अभियान के बाद इस समूह ने हमले की योजना बनाई."

कौन देता है पैसा

पाकिस्तानी तालिबान, पेशावर के हमलावर

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अंग्रेज़ी मीडिया में यही सवाल लंबे समय से पूछा जाता रहा है. दि नेशनल के लिए रिपोर्टिंग करते हुए 2010 में हामिदा गफ़ूर ने अफ़गान तालिबान के बारे में लिखा था, "लेकिन तालिबानी हैं कौन और वह चाहते क्या हैं?"

तालिबान के नेता मुल्ला उमर के प्रवक्ता ज़ैबिउल्लाह ने पिछले साल सीएनएन से कहा था, "हम एक बार फिर कहते हैं. अफ़गानिस्तान में शरिया क़ानून लागू करना, इस्लामिक सरकार बनाना और देश से विदेशी सेनाओं को हटाना चाहते हैं."

ऑर्थर ब्राइट ने क्रिश्चियन साइंस मॉनिटर ने 2012 में तालिबान को पैसा दिए जाने पर एक विशेषज्ञ के हवाले से लिखा, "बड़ी मात्रा में.... अरब देशों में रहने वाले समृद्ध व्यक्तियों से मिलता है.... घुसपैठिए चंदा उगाहने के लिए हज का भी इस्तेमाल कर सकते हैं. खाड़ी के चरमपंथियों के ये संबंध कुछ गुटों पर अल क़ायदा के प्रभाव के चलते भी हो सकते हैं."

दो चीज़ें साफ़ हैं. पहली तो यह कि तालिबान शरिया क़ानून चाहता है और दूसरी कि वह अलग-थलग पड़े जंगली गुट नहीं हैं बल्कि उनके पास पैसा पाने के पर्याप्त साधन हैं.

पाकिस्तानी तालिबान लड़ाके

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सवाल यह है कि वह यह मांग कर क्यों रहे हैं. इसका जवाब क़ानून में है.

'संविधान से ताकत'

पाकिस्तानी संविधान के अनुच्छेद 227 (इस्लाम के प्रावधान, भाग 9) में लिखा है, "(1) सभी मौजूदा क़ानूनों को पवित्र क़ुरान और सुन्नाह में बताई गई इस्लाम की हिदायत के अनुरूप करना होगा, इस भाग को इस्लाम की हिदायतों के अनुरूप ही माना जाए, और कोई भी ऐसा क़ानून लागू नहीं होगा जो ऐसी हिदायतों के प्रतिकूल जाए."

यह प्रतिबद्धता स्पष्ट और संदेह से परे है. यह 1949 में पाकिस्तान की संविधान सभा में जिन्नाह के उत्तराधिकारी लियाक़त अली ख़ान के किए वायदे के अनुरूप है.

उद्देश्यों के प्रस्ताव में लिखा गया है, "चूंकि संपूर्ण विश्व पर सर्वशक्तिमान अल्लाह की हुकूमत चलती है और पाकिस्तान के लोगों को अधिकारों का इस्तेमाल उसके बताए तरीकों की सीमाओं में रहकर ही करना होगा."

पाकिस्तान

"और जहां तक पाकिस्तान के लोगों की व्यवस्था बनाए रखने की इच्छा का सवाल है, राज्य अपनी शक्तियों और अधिकारों का इस्तेमाल लोगों के चुने हुए प्रतिनिधियों के ज़रिए करेगा'; जहां लोकतंत्र, आज़ादी, समानता, सहनशीलता और सामाजिक न्याय- उसी प्रकार होंगे जैसे कि इस्लाम ने स्थापित किए गए हैं; मुसलमानों को पवित्र क़ुरान और सुन्नाह में बताए गए तरीक़ों और शिक्षा के मुताबिक़ अपनी निजी और सामूहिक ज़िंदगी पर अधिकार होगा."

इसके बावजूद, पाकिस्तान के क़ानून मुख्यतः भारत की तरह धर्मनिरपेक्ष हैं. यह वैसे ही हैं जैसे औपनिवेशक काल में थे, जब लॉर्ड मैकाले के नेतृत्व में इन्हें लिखा गया था.

'असमंजस'

अस्सी के दशक में राष्ट्रपति ज़िया उल हक़ ने कुछ इस्लामी क़ानून लागू किए, जिनमें शराब के साथ पकड़े गए लोगों को कोड़े मारना, बलात्कार पर क़ानून और ब्लड मनी शामिल थे.

इनमें से कई क़ानूनों का पालन नहीं किया जाता क्योंकि पाकिस्तान सरकार वापस नहीं लौटना चाहती.

पाकिस्तानी नमाज़

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विश्लेषक ख़ालेद अहमद पाकिस्तान को अपूर्ण इस्लामीकृत राज्य कहते हैं. इसका अर्थ यह है कि पूरे शरिया क़ानून का वादा पूरा नहीं किया गया, जिससे पैदा हुए असमंजस का फ़ायदा तालिबान ने उठाया.

वह सवाल, जिसके लिए विश्लेषक अपना सिर खुजला रहे हैं, उसका जवाब यह है कि तालिबान दरअसल पाकिस्तान के संविधान पर अमल चाहता है.

इसीलिए उनसे लड़ना इतना मुश्किल है- क्योंकि वह कहते हैं कि क़ानून के सवाल पर सही हैं. उनके ख़िलाफ़ कोई भी लड़ाई तब तक सफ़ल नहीं हो सकती, या ठीक से शुरू नहीं हो सकती, जब तक संविधान और इसके वादों पर जारी संशय को ख़त्म न कर दिया जाए.

मुझे नहीं लगता कि यह ऐसा मुद्दा है जिसका वास्ता सरकार या सेना से है. बदलाव समाज में आना चाहिए. इसीलिए तालिबान से लड़ना इतना मुश्किल है.

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