ईरानः समयसीमा क़रीब, मुद्दे बरक़रार

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विएना में ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर वार्ता अंतिम दौर में हैं.
पश्चिमी वार्ताकारों का कहना है कि महत्वपूर्ण बिंदुओं पर गतिरोध अभी भी बरक़रार है.
सोमवार को अंतिम समझौते पर पहुँचने की समयसीमा से पहले जर्मनी और अमरीका का कहना है कि दोनों पक्ष 'फ़ासले पाटने' की कोशिशें कर रहे हैं.
अमरीकी विदेश मंत्री जॉन केरी ईरानी विदेश मंत्री जवाद ज़रीफ़ के साथ फिर वार्ता करेंगे.
विश्व के छह शक्तिशाली देश ईरान से संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंध हटाने के बदले में अपना परमाणु कार्यक्रम ख़त्म करने की माँग कर रहे हैं.
अमरीका, ब्रिटेन, जर्मनी, फ़्रांस, रूस और चीन परमाणु हथियार न विकसित करने को लेकर ईरान से पुख़्ता आश्वाश्न चाहते हैं.
ईरान हमेशा से कहता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम नागरिक ज़रूरतों को पूरा करने के लिए हैं.
वार्ता में गतिरोध के मुख्य मुद्दे

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यूरेनियम संवर्धन- पश्चिमी देश ईरान की क्षमता कम करना चाहते हैं ताकि वे हथियार न बना सकें लेकिन ईरान अगले कुछ सालों में अपनी क्षमता बीस गुणा तक बढ़ाना चाहता है.
प्रतिबंधों में छूट- ईरान चाहता है कि प्रतिबंध तुरंत हटा लिए जाएं लेकिन पश्चिमी देश इसमें देरी चाहते हैं ताकि ईरान अपने वादों को पूरा करे.
बम तकनीक- ईरान ने ऐसे विस्फोटक परीक्षणों और अन्य गतिविधियों का ब्यौरा नहीं दिया है जिनका संबंध हथियार बनाने से हो सकता है. ईरान ने अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों को पारचिन सैन्य अड्डे की जाँच की अनुमति भी नहीं दी है.
शनिवार को जॉन केरी ने कहा, "हम मेहनत कर रहे हैं और सावधानीपूर्वक आगे बढ़ रहे हैं. लेकिन कुछ बड़े फ़ासले हैं और हम उन्हें पाटने में लगे हैं."
जर्मनी के विदेश मंत्री फ्रेंक वॉल्टर स्टीनमियर ने अभी तक की वार्ता को 'सार्थक' बताया लेकिन यह भी कहा कि "इससे इस तथ्य को नहीं छुपाना चाहिए कि अभी भी कुछ मुद्दों पर हमारे बीच मतभेद हैं."
एक यूरोपीय सूत्र ने समाचार एजेंसी एएफ़पी को बताया कि बचे हुए समय में पूर्ण समझौते तक पहुँचना नामुमकिन है.

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हालांकि एक ईरानी सूत्र ने समयसीमा को कुछ दिनों के लिए बढ़ाने का सुझाव देते हुए बीबीसी से कहा कि उन्हें विश्वास है कि अभी भी पूर्ण समझौता किया जा सकता है.
ईरान और पश्चिमी देशों के बीच एक साल पहले अंतरिम समझौता हो गया था. लेकिन दोनों पक्ष जुलाई तक पूर्ण समझौता नहीं कर सके थे और समयसीमा को 24 नवंबर तक बढ़ाया गया था.
शुक्रवार को जॉन केरी से मुलाक़ात के बाद जवाद ज़रीफ़ ने कहा था कि उन्होंने कोई नए विचार नहीं सुने और उनके पास तेहरान ले जाने के लिए कोई महत्पूर्ण प्रस्ताव नहीं है.
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