अब 'चरमपंथ से युद्ध' नहीं करेगा अमरीका?

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- Author, पीजे क्राउली
- पदनाम, पूर्व अमरीकी उप विदेश मंत्री
अमरीका इराक़ में सुन्नी जेहादियों पर हवाई हमले कर रहा है. राष्ट्रपति ओबामा कहते हैं कि वे इराक़ में इस्लामी 'ख़िलाफ़त' नहीं स्थापित होने देंगे और जब तक ज़रूरी है हवाई हमले चलेंगे.
अमरीका इराक़ की ज़मीन पर सैनिक नहीं उतारेगा. सुन्नी जेहादियों से क़ुर्द इलाक़े के अहम शहर इर्बिल को ख़तरा होने के बाद ओबामा ने यह क़दम उठाया.
इससे पहले इराक़ ने अमरीका से मदद मांगी थी, पर अमरीका ने ऐसा नहीं किया था.
क्या चरमपंथ के ख़िलाफ़ युद्ध को लेकर अमरीकी रणनीति बदल रही है?
पढ़ें अमरीका के पूर्व उप विदेशमंत्री पीजे क्राउली का विश्लेषण
अमरीकी जनता के नाम गुरुवार को जल्दबाज़ी में दिए एक संदेश में राष्ट्रपति ओबामा इराक़ में अमरीकी हमलों को अपनी अनुमति और मानवीय मदद देने के बारे में सिर्फ़ आठ मिनट बोले.
इस्लामिक स्टेट से पैदा हुए ख़तरे के बारे में ओबामा जो बोले और जो नहीं बोले, उससे 11 सितंबर के हमलों के बाद पिछले 13 साल में अमरीका की चरमपंथ विरोधी रणनीति कहां पहुंची है, इसका पता चलता है.

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ओबामा ने इस्लामिक स्टेट की चुनौती को स्थानीय स्तर तक सीमित रखा. उन्होंने उसकी 'ख़िलाफ़त' की महत्वकांक्षा और सीरिया और इराक़ के बड़े हिस्से पर क़ब्ज़ा करने की क्षमता के बारे में बात नहीं की.
चरमपंथ का ख़तरा एक परस्पर जुड़े वैश्विक नेटवर्क से पैदा हो सकता है. मगर यह ऐसी क्षेत्रीय या क़बीलाई समस्याओं से भी पैदा हो सकता है जिन्हें अमरीका नहीं सुलझा सकता.
और इसके समाधान भी स्थानीय हो सकते हैं जो अमरीका अपनी निगरानी में लागू नहीं करवा सकता.
'सैनिक हल नहीं'
ओबामा ने साफ़ कहा कि अमरीकी हस्तक्षेप सिर्फ़ इस्लामिक स्टेट की इर्बिल की ओर बढ़त रोकने तक सीमित होगा. इसका उद्देश्य उत्तरी इराक़ में मौजूद अमरीकी अधिकारियों की सुरक्षा और संघर्ष में फंसे अल्पसंख्यक समुदायों को मानवीय मदद पहुंचाना और इराक़ की सुरक्षा क्षमता को मज़बूत करना है.
ओबामा ने इराक़ युद्ध में फंसे अमरीका को बाहर निकाला था. यह उनके राष्ट्रपति कार्यकाल की अहम उपलब्धियों में एक है. इसलिए ओबामा अमरीका को फिर इस युद्ध में नहीं धकेलेंगे.
इसलिए ओबामा ने कहा, "इराक़ के मौजूदा हालात का हल सेना के ज़रिए नहीं निकाला जा सकता."
उन्होंने सभी समुदायों के प्रतिनिधित्व वाली नई सरकार के गठन पर ज़ोर दिया.
रणनीति में बदलाव

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राष्ट्रपति ने सीरिया का ज़िक्र तक नहीं किया और इस्लामिक स्टेट की समस्या को इराक़ तक सीमित कर दिया.
एक साल पहले जब सीरिया में रसायनिक हथियारों के इस्तेमाल की बात सामने आई थी तब भी उन्होंने ठीक यही किया था. उन्होंने आक्रामक कार्रवाई के बजाय अमरीकी संसद और संयुक्त राष्ट्र में विरोध को तरजीह दी थी.
हालांकि इस बार ओबामा ने यह संकेत ज़रूर दिया कि इस्लामिक स्टेट के यज़ीदियों को मिटाने के मंसूबे नरसंहार साबित हो सकते हैं. बावजूद इसके उन्होंने सिर्फ़ सीमित सैन्य कार्रवाई की ही घोषणा की.
उन्होंने यह नहीं कहा कि इस्लामिक स्टेट अमरीका के लिए सीधा ख़तरा है.
यह अमरीका की चरमपंथ विरोधी रणनीति में अहम बदलाव है.
सीमित सैन्य भूमिका

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11 सितंबर 2001 को राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने चरमपंथ के ख़िलाफ़ युद्ध की घोषणा की थी.
उस समय ओसामा बिन लादेन और उनके संगठन अल-क़ायदा की चुनौती को वैश्विक माना गया था.
शीतयुद्ध की तरह ही दुनिया दो भागों में बंट गई थी. या तो आप अमरीका के साथ हैं या चरमपंथियों के.
बुश ने ख़तरे के पहले ही कार्रवाई की रणनीति बनाई थी. सहयोगी देश अहम थे पर अमरीका अकेले ही कार्रवाई के लिए पूरी तरह तैयार था.
2009 में ओबामा प्रशासन ने पिछली सरकार से विरासत में मिले चरमपंथ के ख़िलाफ़ युद्ध को छोटा कर दिया था.
'इस्लाम का भीतरी युद्ध'

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पांच सालों में ओसामा बिन लादेन को मारा जा चुका है और अल क़ायदा ख़त्म हो गया है.
अब समस्या अधिक जटिल और विस्तृत है. मध्य पूर्व और उत्तरी अफ़्रीका में ओबामा सहयोगियों, हितैषियों और प्रतिद्वंदियों को साथ लेकर नए सिरे से रणनीति परिभाषित कर रहे हैं और राजनीतिक चरमपंथ से निपटने के लिए नए राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय तरीक़े अपना रहे हैं. साथ-साथ सेना की भूमिका को कम कर रहे हैं.
माना जा रहा है कि सेना भेजने के उल्टे नतीजे भी हो सकते हैं.
इराक़ में अनुभव से ओबामा ने यही रणनीतिक समझ हासिल की है.
2003 में इराक़ पर अमरीकी हमले के बाद से चरमपंथ के ख़िलाफ़ अभियान को इस्लाम के ख़िलाफ़ अभियान मान लिया गया था.
अब ओबामा इस्लामिक स्टेट को इस्लाम का भीतरी युद्ध मान रहे हैं, जिसे सिर्फ़ मुस्लिम देश ही सुलझा सकते हैं.
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