इराक़ी कुर्द की रमज़ान में दुआ

- Author, विवेक राज
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, इरबिल, इराक़ से लौटकर
इराक़ के इरबिल एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही मुझे कुछ श्रीलंकाई कर्मचारी मिले, जो चार महीने से एयरपोर्ट पर काम कर रहे थे.
वे बेहद चिंतित थे और दो हफ़्ते से बग़दाद स्थित श्रीलंका के दूतावास से संपर्क साधने की नाकाम कोशिश में थे.
इरबिल उत्तरी इराक़ में स्वायत्त कुर्द इलाक़े की राजधानी है और इराक़ के बाक़ी शहरों से काफ़ी अलग है. ख़ूब तेल ही यहां की संपन्नता का राज़ है.
शहर के बीचों-बीच क़िला है, जिसे हाल ही में यूनेस्को ने हेरिटेज साइट घोषित किया है.
जंग
इरबिल में पहली ही रात ख़बर मिली कि किरकुक शहर में फ़िदायीन हमला हुआ है और काराकोश में कुर्द पशमर्गा और आईएसआईएस के बीच गोलीबारी चल रही है. काफ़ी संख्या में लोग वहां से इरबिल का रुख़ कर रहे हैं.
सुबह होते ही हमने कराकोश का रुख़ किया. दूर से काले धुएं के बादल दिख रहे थे और सड़कों पर सामान से लदी गाड़ियां मौजूद थीं.
एक पुराने चर्च के सामने कुर्दों की चेकपोस्ट मिली, जिन्होंने बताया कि आगे जाना ख़तरनाक है.

तभी हमने तोप से दाग़े जा रहे गोलों के गिरने की आवाज़ें सुनीं.
दूसरी तरफ़ से एक महिला रोते हुए सैनिकों से गुहार कर रही थी कि उसे वापस जाने दें क्योंकि उसकी विकलांग बेटी शहर में छूट गई है.
कैंप में रमज़ान
इरबिल से आधे घंटे दूर रेगिस्तान में हमें एक बड़ा शरणार्थी शिविर मिला, जहां मोसुल और आस-पास से आए क़रीब डेढ़ हज़ार लोग रह रहे हैं.
कुछ टेंटों में कूलर भी थे. दिन का तापमान यहां 50 डिग्री तक पहुंच जाता है.
हमें यहां ख़दीजा मिलीं, जो अपने सात बच्चों के साथ छोटे से टेंट में रह रही थीं.

ख़दीजा और उनके दो बच्चों ने रोज़े रखे थे. ख़दीजा से मैंने पूछा – आगे क्या होगा? तो वह बोलीं, ''हम 30 साल से संघर्ष और युद्ध सें फंसे हैं. मुझे जिंदगी से कोई उम्मीद नहीं है.''
तभी इफ़्तार के वक़्त अचानक एक गाड़ी आई. उसमें लोगों के लिए पानी और खाना आया था.
रेगिस्तान में कहीं दूर से अज़ान की आवाज़ सुनाई दी. ख़दीजा और उसके बच्चों ने इफ़्तार किया और नमाज़ पढ़ी.
मैंने ख़दीजा से पूछा कि क्या दुआ की आपने? बोलीं, ''मैंने अपने देश और देशवासियों के लिए शांति की प्रार्थना की है.''
ख़ुद मुश्किलों से घिरी ख़दीजा ने मुझे इफ़्तार में शामिल किया.
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