चीन में जापानी कंपनियों के खिलाफ मुकदमा

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चीन की एक अदालत में दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान बंधुआ मज़दूरी कराने को लेकर एक जापानी फर्म पर मुआवजे के लिए याचिका दायर की गई है. इस याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया गया है.
याचिका दायर करने वाले 37 वादियों में वकील और शिक्षा जगत से जुड़े लोग शामिल हैं. इन लोगों का आरोप है कि उनसे बंधुआ मज़दूरी कराई गई थी.
चीनी मीडिया के अनुसार याचिकाकर्ता मुआवजे के साथ-साथ दोनों देशों के समाचारपत्रों में लिखित खेद जताए जाने की मांग कर रहे हैं.
यह याचिका ऐसे समय दायर की गई है जब एक दिन पहले ही चीन ने कहा था कि वो नानजिंग नरसंहार और जापान के समर्पण की याद में अवकाश घोषित करने पर विचार कर रहा है.
हाल ही में पूर्वी चीनी सागर के एक द्वीप को लेकर चीन और जापान के बीच तनाव आ गया है. इस पर चीन का कब्ज़ा है.
क्या हो सकता है?
जापान के असाही शिंबुन समाचारपत्र ने याचिकाकर्ताओं के हवाले से कहा कि उन्हें या उनके रिश्तेदारों को जापान ले जाया गया और दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान कोयले की एक खदान में काम करने के लिए मज़बूर किया गया.
चीन की सरकारी मीडिया के अनुसार, बीजिंग की अदालत ने इस याचिका को स्वीकार कर लिया है.
याचिकाकर्ताओं में से एक झांग शान ने चाइना न्यूज़ सर्विस को बताया कि चूंकि जापान में न्याय पाने का कोई रास्ता नहीं है इसलिए पीड़ितों और उनके परिवारों ने चीन में जापानी कंपनियों पर मुकदमा करने का निश्चय किया है.
जापान की क्योदो न्यूज़ एजेंसी ने दो कंपनियों की पहचान की है जिन पर मुकदमा किया गया है- मित्सबिशी मैटीरियल्स और निप्पोन कोक एंड इंजीनियरिंग.
इस बीच जापान सरकार के शीर्ष प्रवक्ता योशिहिदे सुगा ने कहा है कि 1972 के दौरान राजयनिक संबंध स्थापित किए जाने के समय हुए समझौते में देनदारी का मामला सुलझा लिया गया था.
इससे पहले भी बंधुआ मज़दूरी को लेकर कई याचिकाएं दायर की गई थीं लेकिन अदालतों द्वारा इन्हें खारिज किया जाता रहा.
पिछले साल दक्षिण कोरिया की एक अदालत ने कोरियाई प्रायद्वीप पर जापानी कब्जे के दौरान बंधुआ मजदूरी कराए जाने के मुद्दे पर, दो जापानी कंपनियों को मुआवजा देने का निर्देश दिया था.
उस समय भी सुगा ने कहा था कि इस मामले में सभी दावों को 1965 के समझौते के तहत हल किया जा चुका है.
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