पाकिस्तानः पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने चुप्पी तोड़ी

साल के अंत में पाकिस्तान के पूर्व सैन्य शासक परवेज़ मुशर्रफ़ ने अपनी नज़रबंदी के बाद से अब पहली बार सार्वजनिक तौर से कुछ बोला है.
दो टेलीविजन चैनलों से की गई बातचीत में उन्होंने पिछले <link type="page"><caption> नौ साल</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/03/130301_musharraf_return_pakistan_aa.shtml" platform="highweb"/></link> के दौरान लिए गए सारे फैसलों और कदमों को सही ठहराया है.
पूर्व राष्ट्रपति <link type="page"><caption> परवेज मुशर्रफ</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/03/130325_musharraf_india_ac.shtml" platform="highweb"/></link> पर हत्या और न्यायाधीशों को नज़रबंद रखने का आरोप है.
सभी प्रमुख मामलों में उन्हें ज़मानत मिल चुकी है. लेकिन अगले हफ़्ते होने वाली सुनवाई के लिए उन्हें अदालत में पेश होने के लिए कहा गया है. इस बार वे राजद्रोह जैसे गंभीर आरोप का सामना करेंगे.
राजद्रोह का आरोप
सुरक्षा कारणों से परवेज़ मुशर्रफ़ अपनी नज़रबंदी के बाद से इस्लामाबाद स्थित अपने आवास से बाहर नहीं निकले. उन पर देश से बाहर जाने पर पाबंदी लगी हुई है.
उन पर लगाए गए राजद्रोह का आरोप तब लगा जब उन्होंने साल 2007 में एक ख़ास आदेश जारी किया था.
तब सुप्रीम कोर्ट में राष्ट्रपति चुने जाने के लिए फिर से करवाए जा चुके चुनाव की वैधता पर फ़ैसला आना था. परवेज़ मुशर्रफ़ ने इस फ़ैसले के आने से पहले ही सेना प्रमुख के पद पर रहते हुए पाकिस्तान में राष्ट्रपति शासन लागू करने का फ़ैसला ले लिया. तब वे सेना प्रमुख थे.
परवेज़ मुशर्रफ़ ने पाकिस्तान के निजी टेलीविजन चैनल एआरवाई को बताया, " ईंशाल्लाह, मैं इस दबाव से ज़रूर बाहर निकल आऊंगा. मुझे इस बात का यकीन है क्योंकि मैंने कोई गलत काम नहीं किया है. आज तक मैंने जो भी किया पाकिस्तान और यहां के अवाम की भलाई के लिए किया."
"मैं अपने उपर लगाए गए हर आरोप का सामना करुंगा. हार नहीं मानूंगा."
निर्वासन
साल 1999 में तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ ने सैन्य तख़्तापलट कर नवाज़ शरीफ़ को प्रधानमंत्री के पद से हटा दिया था.
तब से साल 2008 तक वे पाकिस्तान के राष्ट्रपति पद पर तब तक बने रहे जब तक साल 2008 में पाकिस्तान में लोकतांत्रिक तरीके से सरकार नहीं चुन ली गई.
सरकार चुन लिए जाने के बाद वे इस्तीफ़ा देने को मजबूर हो गए.
इस घटना के तुरंत बाद वे निर्वासन में देश से बाहर चले गए. उन्हें आशंका थी कि फिर से मज़बूत हो रहा न्यायालय कहीं उन्हें कारावास की सजा न सुना दे.
लाल मस्जिद गोलीबारी

इस दौरान परवेज़ मुशर्रफ़ को पाकिस्तान चरमपंथियों से भी धमकियां मिलीं. इन चरमपंथियों ने उन पर साल 2007 में इस्लामाबाद के लाल मस्जिद में गोलीबारी का आदेश देने का आरोप लगाया.
लाल मस्जिद गोलीबारी की घटना में 100 लोगों की मौत हुई थी, इसमें से ज़्यादातर चरमपंथी थे.
वे इस साल मार्च में कई सालों के निर्वासन के बाद चुनाव में भाग लेने के लिए लौट आए. मगर न्यायालय ने उनके चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी.
तुरंत बाद कई आरोप लगाकर उन्हें नज़रबंद कर दिया गया. इन आरोपों में पूर्व प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो और बलूच कबायली नेता की हत्या, न्यायाधीशों को नज़रबंद करना और लाल मस्जिद कार्रवाई के आदेश देना शामिल थे.
इस महीने टेलीविजन चैनल पर मुशर्रफ़ पहली बार दिखाई दिए. टेलीविजन पर उन्होंने खुद पर लगाए गए राजद्रोह सहित सारे आरोपों को सिरे से ख़ारिज कर दिया.
मुकदमे का सामना करेंगे
संवाददाता का कहना है कि परवेज़ मुशर्रफ़ के खिलाफ़ जितने भी मामले रहे उनसे संबंधित कार्यवाही अब तक बेहद धीमी रही. ज़मानत दिए जाने के अलावा इन मामलों में फ़ैसला हमेशा स्थगित होता रहा.
नवंबर में सरकार ने 70 वर्षीय मुशर्रफ़ को राजद्रोह के मामले में 24 दिसंबर को सुनवाई के लिए विशेष अदालत के सामने उपस्थित होने का आदेश दिया.
बीबीसी के एम इलियास ख़ान ने इस्लामाबाद में कहा कि पाकिस्तान के इतिहास में यह पहला मौका होगा कि देश का कोई सैन्य शासक राजद्रोह के आरोप का सामना करेगा.

इधर मुशर्रफ़ ने मंगलवार को कहा है कि वे मुकदमे का सामना करने को तैयार हैं.
उन्होंने कहा, "मेरे खिलाफ़ लगाए गए ये सारे मामले झूठे हैं और इनमें पर्याप्त सबूत भी नहीं हैं. मैंने जो कुछ भी किया वह पाकिस्तान के लोगों की भलाई और देश की बेहतरी के लिए किया."
पूर्व राष्ट्रपति ने तालिबान की धमकी के बारे में भी बात की. उन्होंने कहा कि अर्थव्यवस्था में सुधार और देश में विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए चरमपंथ को काबू किया जाना जरूरी है.
परवेज़ मुशर्रफ़ ने कहा, "तालिबान हमारे लोग हैं इसलिए हमें उनसे संवाद करना चाहिए, मगर इसका मतलब ये नहीं कि हम उन्हें माफ़ कर देंगे."
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