35 साल से बन रही है राजधानी, अब भी अधूरी

नाइजीरिया के सैन्य शासकों में से एक, जनरल ओलुसेगन ओबासान्जो, ने जब 1970 में उस ज़मीन पर कब्ज़ा किया था जिस पर नई राजधानी अबुजा का निर्माण होना था तब उन्हें अंदाज़ नहीं था कि ये 35 साल तक बनती ही रहेगी और फिर भी अधूरी होगी.
यह अफ़्रीका के सबसे महंगे और सबसे फीके शहरों में से एक है.
इसके एक ओर राष्ट्रीय क्रिश्चियन केंद्र है और दूसरी तरफ़ राष्ट्रीय मस्जिद का सोने का गुंबद है. दोनों शहर केंद्र के व्यस्त हाईवे से एक दूसरे को घूरते लगते हैं.
शहर का दूसरा पहचान चिन्ह मिलेनियम टावर का निर्माण स्थल है. यह, अगर कभी पूरा हो पाया तो, नाइजीरिया की सबसे ऊंची इमारत होगा.
इसे 2011 में अबुजा की बीसवीं वर्षगांठ तक तैयार हो जाना था लेकिन अब इसके पूरा होने की तारीक बढ़ा दी गई है- कोई नहीं जानता कि कब तक. पूर्व निर्धारित बजट से बहुत ज़्यादा इस पर ख़र्च हो चुका है और कई सरकारी जांच इस पर चल रही हैं.
असली अबुजा
मैं अबुजा में तीन दिन रहा. मेरा दोस्त अट्टा, जो एक समाजशास्त्री है, मुझे मेरे होटल में लेने आया.
हम असो पहाड़ की ओर बढ़े. यह अकेला पहाड़ राष्ट्रपति निवास के ऊपर झुकता सा लगता है.
सड़क के दोनों तरफ़ भारी, बंगले दिखते हैं. ज़्यादातर का निर्माण पूरा नहीं हुआ है.
कई में ख़ाली स्विमिंग पूल हैं, दूसरे इंग्लैंड के 19वीं सदी के टुडोर घरों जैसे दिखते हैं. बस ज़्यादातर में खिड़कियां नहीं हैं और न ही छतें.
अट्टा ने मुझे बताया कि 65% घरों में कोई रहता नहीं है और ये सिर्फ़ अबुजा के काले धन को सफ़ेद करने के लिए बनाए गए हैं.

मिलेनियम टावर की तरह ये आडंबरपूर्ण योजनाएं पूरी होने से पहले ही नष्ट हो गईं. अब ये चुराई हुई ज़मीन पर विलासी राजनीतिज्ञों द्वारा बनाए गए वीरान स्मारकों से लगते हैं.
इसके बाद अट्टा मुझे गड्ढों भरे, कच्चे, धूल भरे रास्ते पर ले गया और कहा, "मैं तुम्हें असली अबुजा दिखाता हूं."
हमें सड़कों पर लोग दिखने लगते हैं- लोग आदिमकाल की सिंगर सिलाईमशीन लेकर जाते हुए और महिलाएं अपने सिरों पर टोकरियों का संतुलन बनाती हुईं.
हम झोपड़ियों के एक कस्बे में पहुंच जाते हैं.
यहां से निसान की मिनीवैन गुज़रती हैं- जिन्हें "एक मौके वाली" बस कहा जाता है, क्योंकि वह इन धूल भरी सड़कों पर शायद ही कभी रुकती हैं.
पैसा ही सब है
ईसाइयत का प्रचार करने वाले टीवी कार्यक्रमों के पोस्टरों के नीचे दुबली गायों के आस-पास लोग इकट्टे हैं.
संगीत और नृत्य का शोर आता है लेकिन मुअज्ज़िन की अज़ान उसे काटती हुई आती है. चमकदार नज़रों वाले बच्चे फ़ुटबॉल खेल रहे हैं.

जहां राजधानी बन रही है वह जगह कभी ग्वारी लोगों का घर हुआ करता था. वो इस जगह के मूल निवासी थे.
इन लाखों लोगों को आनन-फ़ानन में निकाल दिया गया था और 1970 से वह पहाड़ों में मुश्किल से ज़िंदगी काट रहे हैं.
अबुजा भी एक ग्वारी शब्द ही है. राजनेताओं और जनरलों की राजधानी में मुश्किल से 7,00,000 लोग रहे हैं लेकिन झोपड़ियों के इस कस्बे में बीस से तीस लाख लोग रहते हैं- जिनमें से ज़्यादातर ग्वारी हैं.
ग्वारी लोग अब तक उस ज़मीन के मुआवज़े के लिए संघर्ष कर रहे हैं जो ओबासान्जो सरकार ने उनसे छीन ली थी. उस ज़मीन की कीमत अब अफ़्रीका में सबसे ज़्यादा है.
हम लोग एक झोपड़ी के बाहर बने अस्थाई बार में फ्रैंक और मैरी के पास पहुंचते हैं.
फैंटा पीते वक्त फ़्रैंक बताते हैं, "मैं एक प्रशिक्षित आर्किटेक्ट हूं. मेरे पास शिक्षा है लेकिन पैसा नहीं. मैं सही लोगों को नहीं जानता. इसलिए मैं यहां अपनी बहन के साथ काम करता हूं. अबुजा में पैसा ही सब कुछ तय करता है."
मैं उनसे नीचे शहर में बने खाली बंगलों के बारे में पूछता हूं.
तकलीफ़ और मुस्कान

फ्रैंक कहते हैं, "वो एक झूठा अबुजा है, एक नकली जगह. यह अन्याय है- उन घरों में हमें रहना चाहिए था. लेकिन.... हम यहां रह रहे हैं."
मैरी कहती हैं, "यहां जीना बहुत मुश्किल है. कई बार धूल के कारण हम सड़क के उस पार तक नहीं देख पाते. अगर बारिश हो जाए तो कीचड़ पर चलना असंभव हो जाता है. लेकिन हम काफ़ी शिद्दत से प्रार्थना करते हैं."
फ्रैंक एक पुराने हाई-फ़ाई पर गानों की एक सीडी- तकलीफ़ झेलना और मुस्कुराना- चलाते हैं.
वह कहते हैं, "यह, नाइजीरियाई समाज की दबी हुई आवाज़ है. हम तकलीफ़ झेलते हैं, लेकिन हम मुस्कुराते हैं. कुछ भी तब तक नहीं बदलेगा जब तक हमें गुस्सा नहीं आता, जब तक हम मुस्कुराना बंद नहीं करते."
तूफ़ान आने वाला, लाल बादल सिरों के ऊपर घूमने लगे हैं.
फ्रैंक और मैरी हमारी ओर देखकर हाथ हिलाते हैं, संगीत अब भी चल रहा है. हम लोग नीचे घाटी की ओर बढ़ते हैं, नकली-अबुजा की तरह.
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