मलालाः गोली खाकर जो उम्मीद की मशाल बन गई

- Author, मिशाल हुसैन
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
करीब एक साल पहले पाकित्सान की स्वात घाटी में तालिबानी बंदूकधारियों ने मलाला यूसुफज़ई के सिर में गोली मार दी थी.
उसका "अपराध" केवल इतना था कि वह लड़कियों की शिक्षा के लिए आवाज़ उठा रही थी.
इस जानलेवा हमले के बावजूद डॉक्टरों की मेहनत से मलाला की ज़िंदगी बच गई.
मैंने पाकिस्तान में उसके शहर की यात्रा की. उस स्कूल को देखा जिसने उसे भविष्य के लिए तैयार किया.
उस डॉक्टर से मिली जिसने मलाला का इलाज किया और उसके परिवार और दोस्तों के साथ समय बिताया.
सिर्फ इतना जानने के लिए कि आखिर मलाला है कौन.
पिछले अक्टूबर में उसे गोली मारने वाले हमलावार ने भी तो यही पूछा था: मलाला कौन है?
पढ़ने का हक
मलाला ने बीते दिनों अपने 16वें जन्मदिन के मौके पर संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में लोगों को संबोधित किया. ब्रिटेन के एक पूर्व प्रधानमंत्री ने उन्हें "साहस और उम्मीद की प्रतीक" बताकर उनकी तारीफ की.
लेकिन ये मलाला किसी भी आम लड़की की तरह ही है, जो अपने होमवर्क और पढ़ाई को लेकर चिंतित रहती है.
वह अपने पुराने स्कूल के दोस्तों को याद करती है और दो छोटे भाइयों के साथ उसका अक्सर झगड़ा होता ही रहता है.
एक समय था जब स्वात घाटी को पाकिस्तान का स्विटजरलैंड कहा जाता था और 1997 में मलाला के जन्म के समय तक यह जगह शांतिपूर्ण थी.
पाकिस्तानी सेना ने 2009 में स्वात को तालिबान के नियंत्रण से आजाद कर लिया था, लेकिन आज भी वहां जाना काफी चुनौती भरा है.

आमतौर पर पाकिस्तान का उत्तर-पूर्वी इलाका काफी पिछड़ा हुआ है, लेकिन स्वात शिक्षा के मामले में काफी आगे है.
मलाला के जन्म के आसपास ही उनके पिता जियाउद्दीन यूफुसज़ई ने एक स्कूल खोलने का फैसला किया.
कुछ शिष्यों के साथ शुरू हुआ ये सफ़र देखते-देखते 1,000 से अधिक छात्र-छात्राओं का एक कारवाँ बन गया.
इस स्कूल से <link type="page"><caption> मलाला</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/08/130828_malala_yousafzai_children_peace_prize_ml.shtml" platform="highweb"/></link> की यादें जुड़ी हुईं हैं. उसकी पुरानी क्लास के बाहर अखबारों में छपी उससे संबंधित समाचारों की कतरनें लगी हैं.कक्षा में अगली पंक्ति की एक कुर्सी पर उसका नाम लिखा है.
ये ही मलाला की दुनिया थी.
उनकी प्रधानाध्यापक मरियम खालिकी बताती हैं कि मलाला की पूरी कक्षा ही खास है. उनमें से कई डॉक्टर बनना चाहती हैं. लेकिन ये सफर इतना आसान नहीं है.
मुश्किल हालात
जब मैं बर्मिंघम में मलाला से मिली, तो उसने बताया कि "मेरे भाइयों के लिए भविष्य के बारे में सोचना आसान है. वो जो चाहें बन सकते हैं. लेकिन मेरे लिए यह कठिन था और यही वजह थी कि मैं पढ़ना चाहती थी और ज्ञान के ज़रिए खुद को सामर्थ्यवान बनाना चाहती थी."

लेकिन 2008 तक हालात काफी मुश्किल हो चुके थे. स्थानीय <link type="page"><caption> तालिबानी</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/07/130726_women_jirga_pakistan_dil.shtml" platform="highweb"/></link> नेता <link type="page"><caption> मुल्ला फजलुल्लाह</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/04/130404_pakistan_malala_diary_vd.shtml" platform="highweb"/></link> ने चेतावनी जारी की थी कि एक महीने के अंदर महिलाओं की पढ़ाई पूरी तरह से बंद हो जानी चाहिए और अगर ऐसा नहीं हुआ तो स्कूलों को इसके नतीजे भुगतने होंगे.
मलाला उस क्षण को याद करते हुए बताती हैं, "वो हमें स्कूल जाने से कैसे रोक सकते थे? मैं सोच रही थी. ये नामुमकिन है. वो ऐसा कैसे कर सकते हैं?"
उस समय मलाला की उम्र महज 11 साल थी.
लेकिन मलाला के पिता और उनके दूसरे स्कूल संचालक दोस्तों को वास्तविकता का अंदाजा था. उन्होंने स्थानीय सेना कमांडर से मदद मांगी.
ऐसे ही वक्त में मलाला ने बीबीसी की उर्दू सेवा के लिए <link type="page"><caption> 'डायरी ऑफ अ पाकिस्तानी स्कूलगर्ल</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/03/130328_malala_diary_part-1_sk.shtml" platform="highweb"/></link>' शीर्षक से एक ब्लॉग लिखना शुरू किया.
तालिबान को चुनौती
इन लेखों में स्कूल जाने को लेकर उनकी उम्मीद और स्वात के भविष्य को लेकर डर दिखता था.
मलाला ने इस ब्लॉग को एक अवसर के रूप में लिया और शिक्षा के अधिकार को लेकर आवाज़ उठानी शुरू कर दी.
पाकिस्तान के टीवी पत्रकार हामिद मीर ने बताया कि, "मैं यह देखकर आश्चर्यचकित था कि स्वात में एक छोटी लड़की है, जो पूरे आत्मविश्वास के साथ बोल सकती है, जो बहुत बहादुर है और जो साफ़गोई के साथ अपनी बात रखती है."
वह बताते हैं कि, "साथ ही मैं उसकी और उसके परिवार की सुरक्षा को लेकर चिंतित भी हुआ."

चूंकि <link type="page"><caption> मलाला</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/07/130712_malala_speech_un_rd.shtml" platform="highweb"/></link> के पिता जियाउद्दीन यूफुफज़ई भी शिक्षा के अधिकारों के लिए सक्रिय थे, इसलिए उन्हें भी खतरा था.
मलाला बताती हैं कि, "मैं अपने पिता को लेकर चिंतित थी. मैं सोचती थी कि अगर तालिबान घर में आ गए तो मैं क्या करूंगी."
किसी ने यह नहीं सोचा था कि तालिबान एक बच्ची को अपनी निशाना बनाएगा, हालांकि उनकी तरफ से महिलाओं पर हमले हो चुके थे.
जानलेवा हमला
लेकिन जो नहीं सोचा था वो हुआ और 2012 में मलाला पर जानलेवा हमला हुआ.
नौ अक्तूबर को दोपहर स्कूल से वापस लौटते हुए वह अपनी सहेलियों के साथ खड़ी बस का इंतजार कर रही थी.
तभी दो लोग आए और उन्होंने पूछा कि मलाला कौन है? और ये पूछने के साथ ही ताबड़तोड़ गोली चला दी.
मलाला के सिर में गंभीर चोट आई थी और उसका बचना मुश्किल लग रहा था. उसकी दो सहेलियाँ भी घायल थीं.
मलाला के पिता बताते हैं कि, "अस्पताल में मैंने उसके चेहरे की ओर देखा और उसके माथे को चूमकर कहा कि मुझे तुम पर गर्व है."
उसे हेलिकॉप्टर से पेशावर स्थित सेना के अस्पताल लाया गया. उसकी जान बचाने के लिए सर्जरी ज़रूरी थी.

उसका इलाज कर रहे डॉक्टर खान ने कभी भी <link type="page"><caption> मलाला यूफुफज़ई</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/07/130712_malala_speech_un_rd.shtml" platform="highweb"/></link> का नाम नहीं सुना था, लेकिन वो इतना समझ चुके थे कि वो किसी हाई-प्रोफाइल मरीज का इलाज कर रहे हैं.
अस्पताल के बाहर कैमरों और मीडियाकर्मियों की भीड़ जमा हो चुकी थी.
सभी का कहना था कि, "अगर वो मलाला जैसी छोटी लड़की को निशाना बना सकते हैं, तो वो किसी को भी निशाना बना सकते हैं."
दुनिया भर का साथ
अब तक मलाला पर हुए इस हमले की ख़बर दुनिया में फैल चुकी थी और पूरी दुनिया मलाला की सेहत के बारे में जानना चाहती थी.
पाकिस्तान के सेना प्रमुख अशफाक कियानी इस मामले में खास दिलचस्पी ले रहे थे.
इस बीच मलाला के इलाज में मदद के लिए बर्मिंघम से डॉक्टरों का एक विशेष दल पाकिस्तान आ गया.
डॉक्टरों के इस दल की अगुवाई पाकिस्तानी मूल के ब्रिटिश डॉक्टर जावेद कियानी कर रहे थे.
इसके बाद उसे बेहतर इलाज के लिए ब्रिटेन भेजा गया. <link type="page"><caption> </caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/02/130208_international_others_sm.shtml" platform="highweb"/></link>
<link type="page"><caption> बर्मिघंम के क्वीन एलिज़ाबेथ अस्पताल</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/02/130208_international_others_sm.shtml" platform="highweb"/></link> में मलाला की खोपड़ी के एक हिस्से पर टाइटेनियम की एक प्लेट लगाई गई है और सुनने का एक यंत्र लगाया गया है. ये ऑपरेशन लगभग पांच घंटे चला.
इस ऑपरेशन के बारे में मलाला बताती हैं, "मैंने अपनी आंखें खेली और मैंने पाया कि मैं अस्पताल में हूं और मैं नर्स और डॉक्टरों को देख सकती थी. मैंने अल्लाह का शुक्रिया अदा किया. ओ अल्ला, मैं आपको धन्यवाद देती हूं क्योंकि आपने मुझे एक नई ज़िंदगी दी है और मैं ज़िंदा हूं."
इस समय मलाला कुछ बोल नहीं सकती थी, इसलिए उसने एक राइटिंग पैड और पेंसिल की इच्छा जताई. उसके लिखने की कोशिश की, लेकिन वो पेंसिल को पकड़ नहीं पा रही थी. ऐसे में एक अल्फाबेट बोर्ड मंगाया गया.
बच्चों की आवाज़
मलाला ने पहला शब्दा लिखा 'कंट्री'. ऐसे में सभी ने सोचा कि वह जानना चाहती है कि वो किस देश में है. उसे बताया गया कि वो इस समय इंग्लैंड में है.

उसने अगला शब्दा 'फादर' लिखा. उसे बताया गया कि उसके पिता पाकिस्तान में हैं. इसके बाद मलाला ने पूछा कि "मेरे साथ ऐसा किसने किया?"
मलाला की तबियत में तेज़ी के साथ सुधार दर्ज किया गया और उसके बाद जो हुआ उसे पूरी दुनिया ने देखा.
आत्मविश्वास से भरी मलाला ने अपनी लड़ाई को आगे बढ़ाने का फैसला किया.
इसी साल 12 जुलाई को उन्होंने संयुक्त राष्ट्र को संबोधित किया. उनके भाषण का प्रसारण दुनिया भर में किया गया.
इस मौके पर उन्होंने कहा, "एक बच्चा, एक अध्यापक, एक किताब, एक पेन इस दुनिया को बदल सकते हैं."
मलाला के पिता बताते हैं कि, "वह उम्मीद की मशाल थामे है और दुनिया को बता रही है कि हम आतंकवादी नहीं हैं, हम शांतिप्रिय हैं और शिक्षा को पसंद करते हैं."
अब इस बात को लेकर भी अटकलें लगाई जा रही हैं कि मलाला को <link type="page"><caption> शांति के लिए नोबेल पुरस्कार</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/02/130201_nobel_for_malala_aa.shtml" platform="highweb"/></link> मिल सकता है.
जब मैंने उनसे पूछा कि वो क्या सोचती हैं कि चरमपंथियों को उन पर हमला करके क्या मिला?
उन्होंने कहा कि "मैं सोचती हूं कि उन्हें मलाला पर हमला करने का अफ़सोस होगा. अब उसकी आवाज़ दुनिया के हर कोने में सुनी जाती है."
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