पाकिस्तान: तालिबान से बातचीत की 'राहें हुईं तंग'

पेशावर में चर्च पर हमला
इमेज कैप्शन, पेशावर में चर्च पर हमले की चौतरफा निंदा हुई

पाकिस्तान के पेशावर में शनिवार को एक चर्च पर हुए हमले के बाद तालिबान चरमपंथियों के साथ सरकार की बातचीत की कोशिशों पर सवाल उठने लगे हैं.

कई बरसों से चरमपंथी हिंसा से जूझ रहे पाकिस्तान में प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ की सरकार चरमपंथियों से बातचीत के ज़रिए शांति की तरफ कदम बढ़ाने की योजना बना रही थी, लेकिन जानकारों का कहना है कि हाल के दिनों में एक के बाद एक चरमपंथी हमलों से उसकी कोशिशों पर पानी फिरता दिख रहा है.

पाकिस्तान के ख़ैबर पख़्तूनख्वाह के अपर दीर इलाके में पिछले दिनों चरमपंथी हमले में जहां सेना के एक मेजर जनरल और एक लेफ्टिनेंट कर्नल की मौत हो गई वहीं पेशावर में चर्च पर हमले में 80 लोगों की मौत ने सरकार को सोचने पर मजबूर किया है.

पेशावर से बीबीसी संवाददाता अज़ीज़ुल्लाह ख़ान कहते हैं कि पेशावर के हमले ने चरमपंथियों से बातचीत की कोशिशों पर सवालिया निशान लगा दिया है.

'नहीं गंवाएंगे मौका'

रक्षा मामलों के जानकार ब्रिगेडियर सईद महमूद मानते है कि इस मुद्दे को कभी बातचीत की तरफ जाना ही नहीं था. उनके अनुसार, “बातचीत के लिए चरमपंथियों की तरफ से शर्तें छन-छन कर आ रही थीं. इनमें सभी कैदियों की रिहाई और चरमपंथी संगठनों के खिलाफ सैन्य अभियान को बंद करना शामिल था.”

वो कहते हैं, “जब चरमपंथी हमले में मेजर जनरल सनाउल्ला मारे गए तो सेना ने संकेत दे दिया था कि वो अगर इस मुद्दे पर कोई बड़ी कार्रवाई नहीं करेगी तो बातचीत के मुद्दे को भी गंभीरता से नहीं लेगी.”

महमूद मानते है कि जब तक उत्तरी वज़ीरिस्तान में चरमपंथियों के ठिकाने मौजूद रहेंगे, पाकिस्तान में इस तरह के हमलों को रोक पाना मुश्किल होगा.

अपर दीर इलाके में पाकिस्तानी सेना को निशाना बनाए जाने के बाद तालिबान ने कहा था कि बातचीत के लिए संघर्षविराम का एलान नहीं हुआ है. ऐसे में अगर उनके खिलाफ कार्रवाई होती है तो वो भी कोई मौका नहीं गंवाएँगे.

चरमपंथियों के हालिया दो बड़े हमले पाकिस्तान के ख़ैबर पख़्तूनख़्वाह में हुए हैं जहां पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार चल रही है.

'बातचीत मुनासिब नहीं'

तालिबान
इमेज कैप्शन, पाकिस्तान कई साल से चरमपंथी हिंसा से जूझ रहा है

तहरीके इंसाफ की सांसद मुंज़ा हसन मानती हैं कि पेशावर में चर्च पर हमला होने के बाद सरकार और तालिबान के बीच बातचीत बहुत मुश्किल हो गई है.

उनका कहना है कि इस हमले में जो भी चरमपमंथी संगठन शामिल है उसके साथ बातचीत करना मुनासिब नही होगा.

वो कहती हैं, “पेशावर के हमले ने देश की बुनियादें हिला दी हैं. ऐसे में बातचीत बहुत ही मुश्किल है. ये नहीं हो सकता है कि एक तरफ तो आप बात करते रहें और अगला आपके ऊपर हमले करता रहे.”

सईद महमूद मानते हैं कि चरमपंथी हमलों के बीच बातचीत के प्रयासों को आगे बढ़ाना प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के लिए मुश्किल होगा.

वो कहते हैं कि शरीफ़ कतई नहीं चाहेंगे कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी पहचान ऐसे नेता के रूप में बने जिसका अपने देश पर नियंत्रण नहीं है और जहां अल्पसंख्यकों को किसी की तरह की सुरक्षा ही नहीं है.

सईद महमूद के मुताबिक, “सरकार को कुछ तो करना होगा. ऐसे तो नहीं चल सकता है.”

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