"क्या आपने गोलियों से छलनी कपड़े देखे है"

- Author, ब्रजेश उपाध्याय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
ओक क्रीक, न्यू टाउन, औरोरा, कोलंबाइन--इन अमरीकी शहरों के नाम आपने सुन रखे हैं लेकिन शायद ये याद न हो कि क्यों सुने थे ?
अमरीका में लोगों को अच्छी तरह याद है कि इन शहरों के नाम अख़बारों और टीवी पर क्यों आए थे. अब इस फ़ेहरिस्त में वाशिंगटन के नेवीयार्ड का नाम भी जुड़ गया है.
<link type="page"><caption> अमरीकी नेवी यार्ड में गोलीबारी</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/multimedia/2013/09/130917_us_navy_firing_gallery_vs.shtml" platform="highweb"/></link>
जब भी कोई सरफिरा या दुनिया से नाराज़ इंसान कभी स्कूली बच्चों पर तो कभी गुरूद्वारे में शीश झुकाने आए लोगों पर, कभी अपने ही सहपाठियों पर तो कभी फ़िल्म देख रहे दर्शकों पर गोली बरसाता है तो ये नाम एक बार फिर धूल की परतों से बाहर निकल आते हैं. लेकिन फिर उसी तेज़ी से दफ़न भी हो जाते हैं.
बंदूक पर रोक लगाने की बहस तेज़ होती है फिर गर्म तवे पर पानी के छींटे की तरह ग़ायब. बंदूक रखने के हक़ के लिए जब रैली निकलती है तो ज़्यादा लोग जुटते हैं, जब उसका शिकार बने बेगुनाहों को याद करने के लिए कोई सभा होती है तो लोग वहां नज़रें बचाकर स्मार्टफ़ोन पर ईमेल चेक कर रहे होते हैं.
चालीस बार प्रस्ताव

जिस क़ानून से लाखों अमरीकी स्वास्थ्य सुविधाओं के दायरे में आ गए हैं, उसे ख़त्म करने के लिए रिपबलिकन सांसद चालीस बार अमरीकी <link type="page"><caption> संसद में प्रस्ताव</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/01/130117_us_gun_debate_ss.shtml" platform="highweb"/></link> ला चुके हैं. बंदूक पर रोक लगाने की बात हो तो यही लोग बगलें झांकने लगते हैं.
आई-फ़ोन का नया मॉडल खरीदने के लिए रात भर कतार लगती है. कुछ लोग घंटों खड़े होने से बचने के लिए अपनी जगह बेघरों और भिखारियों को पैसे देकर कतार में खड़ा कर जाते हैं.
लेकिन बंदूक खरीदनी हो तो तेल-साबुन की तरह खरीद सकते हैं. आख़िर संविधान ने इसकी आज़ादी दे रखी है. इस आज़ादी को बरक़रार रखनेवालों की दलील होती है--<link type="page"><caption> गोली बंदूक</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2012/12/121225_us_fire_shooting_ml.shtml" platform="highweb"/></link> नहीं चलाती, आदमी चलाता है.
नेवीयार्ड में हुई गोलीबारी को मुश्किल से एक हफ़्ता हुआ है. लगता है मानो महीने गुज़र गए.
बंदूक की बहस

जिनके अपने छिन गए, बस उन्हीं की आंखें नम रहती हैं. "क्या आपने देखा है जब कपड़े गोलियों से छिद जाते हैं तो कैसे दिखते हैं? आप कल्पना नहीं कर पाएंगे. मैने अपनी बहन के गोलियों से छलनी कपड़ों को उसके बिस्तर पर बिछा रखा है. उसे पांच गोलियां लगी थीं...एक बिल्कुल दिल के अंदर."
लेकिन सैंडी हुक स्कूल में बीस मासूम बच्चों के साथ मारी गई टीचर विक्टोरिया की बहन की ये गुहार <link type="page"><caption> अमरीका</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/06/130607_us_shooting_sm.shtml" platform="highweb"/></link> के दिल को नहीं चीर पा रही है.
अभी वहां मिस अमरीका के रंग और फ़िगर पर बहस हो रही है, नए आई-फ़ोन के कैमरे का विश्लेषण हो रहा है. बंदूक की बहस को एक बार फिर दफ़न करने का वक़्त आ गया है.
<bold>(बीबीसी हिंदी का एंड्रॉयड मोबाइल ऐप डाउनलोड करने के लिए <link type="page"><caption> यहाँ क्लिक</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link> करें. आप हमारे <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> पन्ने पर भी आ सकते हैं और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)</bold>












