नवाज़ शरीफ़ की वापसी से सांप्रदायिक संघर्ष तेज़?

- Author, आलोक बंसल
- पदनाम, कार्यकारी निदेशक, एसएआईएसए
कुछ समय तक शांत रहने के बाद पाकिस्तान में चरमपंथियों ने तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के साथ मिलकर हिंसा की घटनाओं को अंजाम दिया है.
<link type="page"><caption> पाकिस्तान</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/06/130613_musharaff_arrested_ml.shtml" platform="highweb"/></link> में 15 जून को जब लोग ज़ियारत में बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी द्वारा जला डाले गए ब्रिटिश रेजीडेन्सी का शोक मना रहे थे, सुन्नी चरमपंथी संगठन 'लशकर-ए-झांगवी' ने <link type="page"><caption> क्वेटा</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/02/130220_quetta_shia_bomb_violence_vr.shtml" platform="highweb"/></link> में एक और हमला किया. बताया जाता है कि मुहम्मद अली जिन्ना ने वहीं अपने जीवन के अंतिम दिन बिताए थे.
ऐसे ही एक और <link type="page"><caption> चरमपंथी</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/06/130605_pakistan_economy_sharif_ap.shtml" platform="highweb"/></link> हमले में सरदार बहादुर खान महिला विश्वविद्यालय की 14 छात्राएं मारी गईं थीं. इन दो आत्मघाती हमलों में 30 से ज्यादा जिंदगियां चली गईं. इन दोनों नरसंहार की जिम्मेदारी लश्कर-ए-झांगवी ने ली थी.
आत्मघाती हमला
मात्र छह दिन बाद शुक्रवार की नमाज से कुछ पहले 21 जून को एक हमलावर ने पेशावर में शिया मदरसे में आत्मघाती विस्फोट में अपने आप को उड़ा लिया. यह शिया मदरसा पेशावर में शिया समुदाय के सबसे महत्वपूर्ण मदरसों में से एक है. इस मदरसे का नाम अल्लामा आरिफ हुसैन अलहुसैनी के नाम पर रखा गया है.
36 घंटे भी नहीं बीते थे कि चरमपंथियों ने फिर हमला किया. इस बार यह हमला पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर के गिलगित-बल्टिस्तान में हुआ. रविवार, 23 जून 2013 को रात के एक बजे गिलगित स्काउट की वर्दी पहने तालिबानी चरमपंथियों ने अंधाधुंध फायरिंग करते हुए यूक्रेन के छह और चीन के तीन सैलानियों को मार डाला.
शिविर में मौजूद एकमात्र शिया पाकिस्तानी नागरिक भी मारा गया. टीटीपी ने फौरन हमले की जिम्मेदारी ली.

सत्ता परिवर्तन
पाकिस्तान में <link type="page"><caption> सत्ता परिवर्तन</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/06/130611_musharaff_bail_ml.shtml" platform="highweb"/></link> के बाद हिंसा में अचानक आया यह उछाल खुद में कहीं न कहीं गहरा अर्थ लिए हुए है.
2013 के चुनाव का विश्लेषण पर इस बात की ओर संकेत करता है कि पाकिस्तान में कट्टरपंथ बढ़ा है और सांप्रदायिक तालमेल बिगड़ गया लगता है.
पाकिस्तान के शियाओं के लिए 2013 बुरा साल साबित हुआ है. ऐसा माना जाता है कि ईरान के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा शिया समुदाय पाकिस्तान में ही बसता है.
वहां के शिया अपेक्षाकृत बेहतर जिंदगी बिताते है. पाकिस्तान की सत्ता में भी इनकी भागीदारी अधिक रही है.
मौजूदा साल में ही 500 से ज्यादा शिया मारे गए हैं. हालांकि, हाल ही में संपन्न हुए चुनाव तक शियाओं को इस बात का संतोष हो सकता था कि शक्तिशाली राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी और संसद के दोनों सदनों के अध्यक्ष शिया थे.
इन सबकी वजह से वो अपने आपको सुरक्षित महसूस करते रहे हैं हालांकि सुरक्षा बलों और सुन्नी चरमपंथियों के बीच गठजोड़ की खबरें भी मिलती रही हैं.
शियाओं में असुरक्षा की भावना
ताजा चुनाव के बाद राष्ट्रपति जरदारी नाम मात्र के शासक रह गए हैं. इसका असर यह हुआ कि शियाओं के बीच असुरक्षा की भावना बढ़ गई है.
यही नहीं, <link type="page"><caption> नवाज शरीफ</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/international/2013/05/130512_nawaz_new_profile_ml.shtml" platform="highweb"/></link> और उनके भाई शाहबाज शरीफ़ के 'सिपाह ए साहिबा पाकिस्तान' (एसएसपी) जैसे सांप्रदायिक सुन्नी संगठनों के साथ करीबी संबंध बताए जाते हैं.
सऊदी अरब से नवाज शरीफ की कथित 'निकटता' ने शियाओं की असुरक्षा और बढ़ा दी है. अपने उदघाटन भाषण में नवाज शरीफ ने ईरान पाकिस्तान पाइप लाइन का जिक्र नहीं किया. यह बात भी इस तथ्य को पुख्ता करती है कि नवाज सऊदी अरब के 'प्रभाव' में हैं. इन वजहों से शियाओं की आशंकाएं बढ़ गई हैं.
सांप्रदायिक ध्रुवीकरण

पिछले चुनाव में ध्रुवीकरण साफ देखा जा सकता था. <link type="page"><caption> इस चुनाव में</caption><url href="http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2013/06/130605_indian_hope_nawaz_pk.shtml" platform="highweb"/></link> हजारा के प्रभुत्व वाली क्वेटा द्वितीय प्रांतीय विधान सभा सीट में मतदाताओं ने हजारा डेमोक्रेटिक पार्टी (एचडीपी) के मुकाबले शिया राजनीतिक दल मजलिस वहादत मुसलिमीन (एमडब्लयूएम) को चुना.
ऐसा करके यहां के मतदाताओं ने 'जातीय पहचान' के मुकाबले 'सांप्रदायिक पहचान' को प्राथमिकता दी है.
वर्तमान साल के पहले दो महीनों में 200 से ज्यादा हजारा समुदाय के लोग सांप्रदायिक हिंसा में मारे गए थे. इसी तरह हाल में कराची में हुए पीएस128 के सर्वेक्षण में धांधली के आरोपों के बीच कट्टर मानी जाने वाली सुन्नी बहुल एएसडब्ल्यूजे मुत्ताहिदा कौमी मूवमेंट (एमक्यूएम) से मात्र 202 वोट से हार गई.
शिया समुदाय के संरक्षक के रूप में माने जाने वाले एमक्यूएम की स्थिति कराची में कमजोर पड़ती जा रही है. इससे भी शियाओं के बीच असुरक्षा की भावना बढ़ी है.
हाल के वर्षों में कराची में निशाना बनाकर शियाओं की हत्या के अनगिनत मामले सामने आए हैं. इसमें मशहूर वकील कौसर सकलेन और उनके दो बेटों की हत्या का मामला भी शामिल है.
सुन्नी समर्थक तालिबान
तालिबान के सुन्नियों की ओर से इस लड़ाई में शामिल होने की वजह से परिस्थितियां और भी जटिल हो गई हैं.

पिछले चुनाव में तालिबान द्वारा मिली धमकी के कारण तीन ‘धर्मनिरपेक्ष’ पार्टियां- पाकिस्तान पीपल्स पार्टी (पीपीपी), अवामी नेशनल पार्टी (एएनपी) और एमक्यूएम खुलकर चुनाव प्रचार नहीं कर पाई थीं जिसकी वजह से उन्हें नुकसान उठाना पड़ा था.
जिन पार्टियों ने समझौते की वकालत की और टीटीपी की ओर नरम रुख रखा उन्होंने चुनाव में बहुत अच्छा प्रदर्शन किया.
इसका परिणाम यह हुआ कि टीटीपी और इसके सहयोगी दलों का साहस बढ़ गया.
इस्लामी दुनिया के भीतर सांप्रदायिक तर्ज पर गहन ध्रुवीकरण हो रहे हैं. सीरिया में तेज होते संघर्ष ने आग में घी का काम किया है.
आने वाले दिनों में यदि यदि नवाज शरीफ ने अपने पूर्व सहयोगी एएसडब्ल्यूजे और उनके सहयोगियी टीटीपी के खिलाफ कठोर कार्रवाई नहीं की तो पाकिस्तान में सांप्रदायिक संघर्षों की लगातार और ज्यादा भयावह घटनाएं हो सकती हैं.
(आलोक बंसल सामरिक मामलों के दक्षिण एशियाई संस्थान (एसएआईएसए) में कार्यकारी निदेशक हैं और ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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