सीसीटीवी की निगाह में 'अमरीका'

बॉस्टन मैराथन बम धमाकों के संदिग्ध सीसीटीवी फुटेज की मदद से पकड़े गए. तो क्या इसका ये मतलब निकाला जाए कि अमरीकियों को सीसीटीवी फुटेज पर और ज्यादा निर्भर होने की जरूरत है?
जब तक तामरलेन और ज़ोख़र सारनाएफ़ के रूप में उनकी पहचान नहीं हुई थी तब तक उन्हें काली और सफेद टोपी लगाने वाले दो नौजवान के रूप में ही लोग जानते थे. धुंधली वीडियो फुटेज में दिखाई देने वाले दोनों युवक बॉस्टन धमाके के प्रमुख संदिग्ध हैं.
सैकड़ों घंटों की रिकॉर्डिंग से जांचकर्ताओं ने दो व्यक्तियों को चिन्हित किया और इसके बाद कथित रूप से बम रखने से पहले और बाद की उनकी गतिविधियों को परखना शुरू किया.
बॉस्टन मैराथन के दौरान फिनिशिंग लाइन पर हुए दो बम धमाकों में तीन लोग मारे गए और 200 घायल हुए. काली और सफेद टोपी वाले नौजवानों की तस्वीर जारी की गई और जल्दी ही उनकी पहचान भी कर ली गई. इसके एक दिन बाद ही उनमें से एक पुलिस के साथ मुठभेड़ में मारा गया और दूसरा अस्पताल में भर्ती है.
इस केस में सीसीटीवी फुटेज ने जो अहम योगदान दिया है और यही वजह है कि अब अमरीकियों ने सार्वजनिक स्थानों की सीसीटीवी निगरानी के लिए इन कैमरों को लगाने के बारे में दोबारा सोचना शुरू कर दिया है.
ब्रिटेन से सीख
हालांकि अमरीका में ब्रिटेन जैसे सरकरी सीसीटीवी निगरानी को मान्यता नहीं मिली है, फिर भी वहां पर राष्ट्रीय सुरक्षा और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए सालों से इसका उपयोग होता आ रहा है.
ह्यूस्टन विश्वविद्यालय में कंप्यूटेशनल फीजियोलॉजी के प्रॉफेसर योआनिस पावलिडिस का कहना है, “जैसा कि बॉस्टन बम धमाकों के बाद साबित हुआ है, हम पर अच्छी तरह से निगाह रखी जाती है.”
ये निगरानी निजी और सरकारी वीडियो कैमरों के जरिए की जाती है.
अकादमिक जगत में आने से पहले पावलिडिस निजी क्षेत्र में काम करते थे. उनका कहना है कि उनके प्रोजेक्ट को सरकारी और निजी क्षेत्र दोनों से सहायता मिलती थी.
वो कहते हैं, “हमारी आमदनी का कुछ हिस्सा एक सरकारी एजेंसी से आता था. वो एजंसी इस तरह की तकनीक विकसित करने में रुचि ले रही थी. इसमें सरकार की भी रुचि थी. लेकिन साथ ही उसमें निजी क्षेत्र की रुचि थी.”
वीडियो निगरानी का इतिहास

वैसे अमरीका में निगरानी का ज्यादातर काम निजी तौर पर होता है.1980 के दशक में वीडियो तकनीक इतनी सस्ती हो गई थी कि व्यवसायी और आम नागरिक निजी तौर पर अपने घर पर सुरक्षा उपकरण लगा सकते थे.
90 के दशक तक तकनीक में सुधार हुआ और बढ़िया गुणवत्ता वाली फुटेज उपलब्ध होने लगी.
सार्वजनिक सुरक्षा के लिए निजी फुटेज का इस्तेमाल रोनी किंग केस में किया गया. इसमें पुलिस को किंग को पीटते हुए दिखाया गया था.
इसके बाद वर्ल्ड ट्रेंड सेंटर हमले की घटना हो गई.
अमरीकी सिविल लिबर्टीज यूनियन के लिए काम करने वाले एक पुलिस विश्लेषक जे स्टेनली कहते हैं, “9/11 की घटना के बाद पुलिस द्वारा संचालित कैमरों में बढ़ोत्तरी हुई है. बाकी चीजें तो पहले से थी हीं.”
न्यूयॉर्क शहर के प्रशासन ने दावा किया है कि उसने ऐसा तंत्र विकसित किया है जिसमें न केवल अपराधियों की पहचान की जा सकेगी बल्कि उन्हें पकड़ा भी जाएगा.
“होमलैंड सिक्योरिटी टुडे” के संपादक डेन वर्टोन कहते हैं, “इन सभी कैमरों की फुटेज नियंत्रण कक्ष में भेजी जाती हैं जहां फुटेज की जांच पड़ताल करने की खास सुविधाएं होती हैं. अगर एक बैग लावारिस पड़ा है तो उसे मशीनें अपने आप पकड़ लेगीं.”
वीडियो फुटेज की सहायता से पुलिस को समस्याग्रस्त इलाकों में तैनात किया जा सकता है. कम अधिकारियों के साथ भी उस स्थिति में बेहतर काम किया जा सकता है.

वर्टोन कहते हैं, “हमारा मकसद है कि कम से कम अधिकारियों की सहायता से जहां भी कैमरे हैं पूरे शहर में निगरानी रखी जाए. और जहां जरूरत है पुलिस को वहां तैनात किया जा सके.”
निजता बनाम सुरक्षा
बॉस्टन बम धमाकों के बाद न्यूयॉर्क शहर के पुलिस कमिश्नर रे केली ने जोर शोर से निगरानी कैमरों का समर्थन किया है.
एमएसएन टेलीविजन पर केली ने कहा, “जो लोग इसके खिलाफ शिकायतें कर रहे हैं, उनकी संख्या कम हैं. लोगों को लगता है कि आप जहां भी जाते हैं आपकी तस्वीर ली जाती है.”
ज्यादातर विश्लेषक मानते हैं कि आने वाले दिनों में और भी निगरानी बढ़ेगी. गूगल ग्लास का उदाहरण देते हुए पावलिडिस कहते हैं, “यही रास्ता है जहां तकनीक और दुनिया जा रही है. हर आदमी के ऊपर एक निगरानी तंत्र होगा.”
सीसीटीवी की सहायता से ब्रिटेन में कई हाई प्रोफाइल केस सुलझाए गए हैं लेकिन हर कोई ये मानने के लिए तैयार नहीं है कि अपराध से लड़ने का ब्रिटेन का तरीका कारगर है.
बिग ब्रदर वॉच के निदेशक निक पिकल्स कहते हैं, "अगर सीसीटीवी कैमरों का अपराध से सीधा संबंध होता तो लंदन दुनिया का सबसे सुरक्षित शहर होता.” वो ये भी कहते हैं कि लंदन के पांच में से चार उपनगरों में जहां कि सबसे ज्यादा सीसीटीवी कैमरे लगे हैं वहां पर अपराधियों को पकड़ने की दर सबसे कम है.

पिकल्स के मुताबिक कैमरों पर पैसे खर्च करने से बेहतर है कि उस पैसे को स्ट्रीट लाइट और घरों में सुरक्षा तंत्र लगाने के लिए खर्च किया जाए.
निजता का समर्थन करने वाले स्टेन ली जैसे लोगों के लिए निजी तौर पर फुटेज लेने और सरकार की फुटेज लेने में बड़ा फर्क है.
वो कहते हैं, “जब बड़े पैमाने पर निगरानी तंत्र लगाया जाता है जैसे कि न्यूयॉर्क में है तो उस स्थिति में आप लोगों को जगह और वक्त से पहचान कर सकते हैं. निजी फुटेज में ऐसा संभव नहीं है.”
इससे पहले अमरीकी इस तरह के उपायों पर ऐतराज जता चुके हैं. वर्टोन कहते हैं कि निगरानी के यंत्र के तौर पर ड्रोन के इस्तेमाल की काफी आलोचना की गई थी. निजता की रक्षा के चलते कई उपायों को रोका भी जा सकता है.
हाल ही में एक सर्वे में साबित हुआ है कि 40 प्रतिशत अमरीकियों ने सार्वजनिक सुरक्षा के नाम पर कैमरों के इस्तेमाल के पक्ष में वोट दिया है. इसके बाद भी और कैमरे लगाए जा रहे हैं.
डेनवर, फिनिक्स, शिकागो और दूसरे शहरों में पुलिस अधिकारी निगरानी के लिए वीडियो फुटेज पर ज्यादा निर्भर हैं.












