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यूक्रेन-रूस युद्ध: जंग के पुराने तरीकों की मदद से रूस को रोकता यूक्रेन
- Author, जोनॉथन बेल
- पदनाम, रक्षा संवाददाता, पूर्वी यूक्रेन
यूक्रेन रूस पर बड़ी जवाबी कार्रवाई करने की तैयारी कर रहा है. जैसे-जैसे सैनिकों का जमावड़ा बढ़ेगा, उसके लिए रूस से अपनी सेनाओं की मौजूदगी छुपाना मुश्किल होता जाएगा. ऐसे में दुश्मन से बचने के लिए यूक्रेन की सेना को नए तरीक़े तलाशने पड़ रहे हैं.
पूर्वी यूक्रेन के मोर्चे की एक खाई में मौजूद यूक्रेन के तोप से हमला करने वाले दल को पता है कि रूस की सेना ना सिर्फ़ ड्रोन हमले के ज़रिए उन्हें मारने की कोशिश करेगी बल्कि उनकी स्थिति का पता लगाने के लिए वो इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का सहारा भी लेगी.
यूक्रेन की 28वीं ब्रिगेड के इन सैनिकों के पास भले ही निशाने को पहचानने के लिए सैटेलाइट, स्मार्टफ़ोन और टेबलेट जैसीं 21वीं सदी की तकनीकें मौजूद है लेकिन इन दिनों वो गुज़रे ज़माने की एक मशीन का इस्तेमाल कर रहे हैं.
पहले विश्व युद्ध के दौरान खाइयों में तैनात सैनिक संचार के लिए तार से जुड़े टेलीफ़ोन की इस तकनीक का ख़ूब इस्तेमाल करते थे.
व्लाद और उनके सैनिक जब भी तोप से गोला दागने वाले होते हैं, वो फ़ोन उठाते हैं. इस फोन की घंटी एक गुज़रे हुए दौर की याद दिलाती है. कॉल करने के लिए उन्हें पहले फोन का रिसीवर उठाकर कान से लगाना होता है और फिर वो नंबर डायल करते हैं. ये किसी पुरानी ब्लैक एंड व्हाइट फ़िल्म के सीन की याद दिलाता है.
व्लाद वो केबल उठाते हैं जो पास की दूसरी सैन्य खाइयों की तरफ़ जाते हैं. वो कहते हैं कि इस समय संचार का यही सबसे सुरक्षित माध्यम हैं. हालांकि इन पुराने टेलीफ़ोन पर आवाज़ सुनना आसान नहीं होता है.
व्लाद कहते हैं कि रूस की इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली मोबाइल फ़ोन और रेडियो तरंगों को पकड़ सकती है, लेकिन अपने प्राचीन फ़ोन की तरफ़ इशारा करते हुए वो कहते हैं, "ये तकनीक बहुत पुरानी है, लेकिन ये बेहतरीन काम करती है."
अभी तक रूस की परंपरागत सेना ने युद्ध में ख़राब प्रदर्शन किया है और भारी नुक़सान उठाया है. लेकिन रूस के पास दुनिया की सबसे उन्नत इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणालियों में से एक है. ये अदृश्य तकनीक ना सिर्फ़ दुश्मन के संचार को पकड़ लेती है बल्कि मोबाइल और रेडियो सिग्नल के ज़रिए दुश्मन सैनिकों की स्थिति का भी पता लगा लेती है.
स्थायी सुरक्षात्मक ठिकानों पर ये तकनीक यूक्रेन के सैनिकों के लिए आगे बढ़ने को और मुश्किल और ख़तरनाक़ कर सकती है. रूस के जू़पार्क रडार किसी तोप से चले गोले को पकड़ को सकता है. रूस के ज़ीटेल वाहन रेडियो फ्रीक्वेंसी की पहचान कर उसे ब्लॉक कर देते हैं. जबकि रूस की बोरिसोग्लेब्स्क-2 प्रणाली जीपीएस जैसे सेटेलाइट संचार में दख़ल दे सकती है और उसे ब्लॉक कर सकती है.
रूस की इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली ने यूक्रेन के ड्रोन विमानों के लिए भी हालात बेहद मुश्किल कर दिए हैं. युद्ध क्षेत्र में ड्रोन आसमान से नज़र रखने और सेनाओं की स्थिति का पता लगाने में बेहद मददगार साबित होते हैं.
पूर्वी मोर्चे के एक और ठिकाने पर ओलेक्सी और 59वीं ब्रिगेड की उनकी ड्रोन इंटेलिजेंस यूनिट एक बर्बाद हुई इमारत में अपना ठिकाना बनाए हुए है ताकि यहां से वो चीन से आयातित कॉमर्शियल ड्रोन का इस्तेमाल रूस के ठिकानों का पता लगाने के लिए कर सकें.
युद्ध के शुरुआती चरण में यूक्रेन इस तरह के ड्रोन का प्रभावी इस्तेमाल कर पा रहा था. लेकिन ओलेक्सी कहते हैं, "अब आसमान ड्रोन विमानों से भरा रहता है."
वो कहते हैं कि रूस की सेना भी इसी तरह के ड्रोन का इस्तेमाल कर रही है लेकिन उनके पास ये ड्रोन संख्या में बहुत अधिक हैं. हालांकि ओलेक्सी कहते हैं कि उन्हें इन ड्रोन की मौज़ूदगी से बहुत फ़र्क नहीं पड़ता है.
ओलेक्सी कहते हैं कि वो पहले ही चीन से आए पांच छोटे ड्रोन गंवा चुके हैं और उनकी टीम को रोज़ाना इस तरह के तीन से चार ड्रोन का नुक़सान होता ही है. वो कहते हैं कि दुश्मन सेना के पास रेडियो इलेक्ट्रॉनिक वॉरफ़ेयर स्टेशन हैं और ड्रोन को मार गिराने वाली बंदूकें हैं जो ड्रोन के संचार में दख़ल देती हैं और उसे निष्क्रिय कर देती हैं.
लेकिन वो ये भी कहते हैं कि अगर चलाने वाले अनुभवी हों तो छोटे ड्रोन से भी तीन से चार सप्ताह तक युद्धक्षेत्र में काम लिया जा सकता है.
ओलेक्सी की टीम रूस की ड्रोन को पकड़ने वाली प्रणाली से बचने की हर संभव कोशिश करती है.
वो अपने ड्रोन की जियोलोकेशन को भी बदल देते हैं. रूस की सेना की रक्षात्मक ट्रेंच के ऊपर वो जिस ड्रोन को उड़ा रहे हैं वो वीपीएन के ज़रिए ऑस्ट्रेलिया का आईपी पता इस्तेमाल कर रहा है. ऐसे में रूस की प्रणाली जब इस ड्रोन को पकड़ेगी तो वो ऑस्ट्रेलिया में उड़ता हुआ नज़र आएगा. लेकिन वो ये भी स्वीकार करते हैं कि ये चाल हमेशा काम नहीं आती है.
इसके उलट, रूस के ड्रोन को मार गिराने की यूक्रेन की कोशिशें पुराने ज़माने की प्रतीत होती हैं. एक अन्य ठिकानें पर हमने ये तरीक़ा देखा.
यूक्रेन के सैनिक आसमान में दूर उड़ रहे एक ड्रोन की तरफ़ इशारा करते हैं. ये रूस में निर्मित ओरलान ड्रोन है जो थोड़ा बड़ा है और जासूसी और संचार में खलल डालने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. इस समय ये ड्रोन यूक्रेन की रक्षात्मक ट्रेंच के ऊपर उड़ रहा है ताकि रूस के सैनिकों को तोप से हमला करने के लिए सटीक जानकारी दे सके.
हमें दूर धमाके के बाद धुआं उठने से पहले तोप के गोलों के दागे जाने की सनसनाती सी आवाज़ सुनाई देती है.
इसकी प्रतिक्रिया में यूक्रेन के सैनिक अपनी ऑटोमैटिक राइफ़लों से आसमान में अनगिनत गोलियां दागते हैं. लेकिन रूस का ड्रोन जिस ऊंचाई पर उड़ रहा है वहां तक यूक्रेन के सैनिकों की गोलियां नहीं पहुंच पातीं. ये सब बर्बाद हो जाती हैं.
पास ही स्थित यूक्रेन की 10वीं ब्रिगेड के कमांड सेंटर में कमांडर बोहदान अपनी उलझन ज़ाहिर करते हुए कहते हैं कि इस स्थिति में वो बहुत कुछ नहीं कर पा रहे हैं. वो कहते हैं, "रूस के ड्रोन हर दिन, हर घंटे, हर मिनट आसमान में उड़ान भर रहे हैं. उनके पास इसके लिए पर्याप्त साधन हैं. हम उनके ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं लेकिन जिस क्षमता से हमें लड़ना था, वो हमारे पास नहीं है."
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उनके पीछे लगी बड़ी स्क्रीन पर दिख रहा है कि यूक्रेन भी इस समय आसमान में ड्रोन उड़ा पा रहा है- भले ही इस समय उन्हें अपने ड्रोन को युद्ध में ख़र्च हो जाने वाली चीज़ के रूप में ही देखना पड़ रहा हो.
हम आसपास की खाइयों के ऊपर उड़ रहे यूक्रेन के ड्रोन की लाइव फुटेज देखते हैं. रूस के पास भले ही बेहतर इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली हो और अधिक संख्या में ड्रोन हों- जो आने वाले यूक्रेन के आक्रमण के लिए चुनौती पैदा कर सकते हैं.
लेकिन रूस अभी तक यूक्रेन के आसमान पर नियंत्रण नहीं कर सका है और ना ही यूक्रेन के हौसले को तोड़ सका है और उसकी प्रतिभा को हरा सका है.
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