सूडान से भारत के लिए अपने लोगों को सुरक्षित निकाल पाना यूक्रेन के मुकाबले क्यों ज़्यादा मुश्किल है?

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- Author, कीर्ति दुबे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
सोमवार को 500 भारतीय सूडान पोर्ट पहुंचे हैं और इसी के साथ भारत का सूडान में फंसे भारतीयों को सुरक्षित अपने देश वापस लाने का ऑपरेशन शुरू हो चुका है.
आईएनएस सुमेधा से इन भारतीयों को जेद्दा लाया जाएगा और वहां से उन्हें एयरफ्राफ्ट के ज़रिए भारत वापस लाया जाएगा.
ये ऑपरेशन सूडान में समुद्री मार्ग से किया जा रहा है. सूडान में एयर स्पेस पूरी तरह बंद हैं ऐसे में कोई भी विमान उड़ान नहीं भर सकता.
सोमवार को भारत के विदेश मंत्री ने ट्वीट के ज़रिए बताया कि ऑपरेशन कावेरी के तहत 500 भारतीय पोर्ट सूडान पहुँच गए हैं.
उन्होंने ट्वीट किया, "हमारे समुद्री और हवाई जहाज़ भारतीयों को वापस लाने के लिए तैयार हैं."
सूडान से भारतीय को उस गति से नहीं निकाला जा सका है जिस गति से यूक्रेन में ऑपरेशन शुरू हो सका था.
जब साल 2022 में रूस ने 24 फ़रवरी को यूक्रेन पर हमला किया तो इसके ठीक दो दिन बाद यानी 26 फ़रवरी को भारत सरकार ने यूक्रेन में फंसे भारतीयों को बाहर निकालने के लिए ऑपरेशन गंगा शुरू कर दिया.
पहले बैच में 219 भारतीयों को यूक्रेन से मुंबई एयरपोर्ट पर उतारा गया.
26 फ़रवरी 2022 से लेकर 3 मार्च 2022 तक 18000 भारतीयों को यूक्रेन से सुरक्षित भारत लाया जा चुका था.
अब बात करते हैं सूडान में फंसे भारतीयों की.
15 अप्रैल से अफ्रीकी देश सूडान में गृहयुद्ध चल रहा है. देश में सेना और अर्धसैनिक बल के बीच संघर्ष अपने चरम पर है, लेकिन नौ दिन बाद भी भारत यहां से अपने 3000 नागरिकों को बाहर नहीं निकाल पाया है.
रविवार को भारत ने सऊदी अरब की राजधानी जेद्दा में दो बड़े एयरक्राफ़्ट और पोर्ट सूडान पर एक जहाज़ तैनात किया ताकि यहां फंसे हुए भारतीयों को सुरक्षित बाहर निकाला जा सके.
23 अप्रैल को विदेश मंत्रालय ने कहा, "हमारी तैयारियों के तहत भारत सरकार कई विकल्पों पर गौर कर रही है. दो भारतीय एयरक्राफ्ट C-130J को जेद्दा में तैनात किया गया है. वहीं आईएनएस सुमेधा को सूडान के पोर्ट पर तैनात किया गया है."
विदेश मंत्रालय का कहना है कि सूडान में भारतीय दूतावास लगातार वहां रह रहे भारतीय नागरिकों के संपर्क में हैं. और दूतावास इस बात को लेकर संभावित मार्ग तलाश रहा है कि ख़ार्तूम से कैसे भारतीयों को निकाला जा सके.

किस हाल में रह रहे हैं भारतीय
सूडान में फंसे कई भारतीयों के लिए सबसे बड़ी मुश्किल ये है कि उन्हें ना तो पीने के लिए पानी मिल पा रहा है और ना ही बिजली.
कर्नाटक के मांड्या ज़िले के मूल निवासी संजू कई अन्य भारतीयों के साथ एक ऐसे होटल में रह रहे हैं, जहां के कर्मचारियों को युद्ध शुरू होने के कुछ दिन पहले ही वहां से निकाला जा चुका था. लेकिन वहां ना तो उनके पास पीने को पानी है और ना ही खाना.
वो बताते हैं, "हम बचे हुए ब्रेड के टुकड़े और बाथरूम के नल से पानी पीने को मजबूर हैं. एक कमरे में दस लोग रह रहे हैं."
संजू और उनकी पत्नी 18 अप्रैल को भारत आने वाले थे लेकिन उसके तीन दिन पहले ही 15 अप्रैल से सूडान में गृहयुद्ध शुरू हो गया और यहां का एयर स्पेस ही बंद कर दिया गया.
संजू कहते हैं कि हमें नहीं पता कि ये बाथरूम का पानी भी हमें कब तक मिलता रहेगा.

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लेकिन सवाल ये है कि सूडान में बचाव ऑपरेशन शुरू करने में भारत को इतना वक़्त क्यों लगा?
यही सवाल बीबीसी ने लीबिया, जॉर्डन, माल्टा में भारत के राजदूत रहे अनिल त्रिगुणायत से पूछा.
वह कहते हैं, "सूडान में सिविल वॉर चल रही है. देश में सेना और अर्ध सैनिक बल युद्ध लड़ रहे हैं. दोनों ही ओर से ज़बरदस्त फ़ायरिंग हो रही है और वो किसी को बख़्श नहीं रहे हैं. इसमें एक भारतीय की मौत हो गई, एक अमेरिकी नागरिक की भी मौत हुई है. भारत या कोई भी देश ये नहीं चाहता कि जब हम अपने लोगों को निकाल रहे हों तो हमारे दस्ते पर ही हमला हो जाए. इसलिए ये ज़रूरी है कि दोनों पक्षों से बात हो जाए, तो ऑपरेशन शुरू किया जाए."
"भारत विदेश में फंसे अपने लोगों को सुरक्षित वापस निकालने के लिए किए गए ऑपरेशन में काफ़ी कुशल है. हमने इराक़ से एक लाख भारतीयों को निकाला. लीबिया में जब मैं था तो वहां भी ऐसे ही हालात थे, दो से तीन बार में हमने वहां से भारतीयों को सुरक्षित वापस लाया था. जब तक गद्दाफ़ी के हाथों में सत्ता का केंद्र था तो आर्मी सारे एग्ज़िट प्वाइंट को कंट्रोल कर रहे थे लेकिन उनकी हत्या होने के बाद से ही वहां कई सारे मिलिशिया समूह हो गए और वो सभी एक दूसरे पर बिना रूके लगातार फ़ायरिंग करने लगे तो वही स्थिति यहां भी है. यहां किसी एक के पास कंट्रोल नहीं है."

सऊदी और फ्रांस का ऑपरेशन जिसमें फंसे भारतीय निकाले गए
रविवार को सऊदी अरब ने बताया कि उसने सूडान में फंसे 66 लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला. इसमें भारत के कुछ लोग भी शामिल हैं.
रविवार को देर रात फ्रांस ने भी सूडान में फंसे 388 लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला और इसमें भी भारत के कुछ नागरिक शामिल हैं.
हालांकि दोनों देशों ने कितने भारतीयों को बाहर निकाला है इसका कोई ब्रेक-डाउन आधिकारिक रूप से जारी नहीं किया गया है.
हाल ही में सफलतापूर्वक ऑपरेशन गंगा को अंजाम देने वाले भारत के लिए सूडान में अपने नागरिकों को सुरक्षित वापस लाना यूक्रेन के मुकाबले कैसे अलग है?
अनिल त्रिगुणायत कहते हैं, "दरअसल, यूक्रेन में जो युद्ध हो रहा था वो दो देशों के बीच था और जब ऑपरेशन शुरू होने की बात हुई तो सत्ता यूक्रेन के पास ही थी, वहीं एग्ज़िट रूट रूस के पास थे. ऐसे में भारत ने जल्द से जल्द दोनों ही तरफ़ से बात की और अपने लगभग 20000 लोगों को निकाल लिया.
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"इसके पड़ोसी देशों में सरकारें मज़बूत थीं चाहे वो रोमानिया हो, पोलैंड हो या फिर हंगरी हो. इन देशों ने भी विदेशी नागरिकों को बाहर निकाले जाने के लिए रूट दिया और इसलिए यहां हमारा ऑपरेशन काफ़ी सफल रहा. लेकिन सूडान में दो ही पार्टियां आपस में लड़ रही हैं और ऐसे में ह्यूमेनिटेरियन कॉरिडोर बनाने का काम मुश्किल हो जाता है."
"अमेरिका , ब्रिटेन सरकार या भारत सरकार सबके लिए यही मुसीबत है. मैंने ऐसे ऑपरेशन किए हैं तो मुझे पता है कि ये बहुत मुश्किल काम है. जिन दो जनरल के बीच लड़ाई हो रही है उन दोनों को बचाव ऑपरेशन के लिए राज़ी कराना खुद में बड़ा चैलेंज है. "
"ये शक्ति की लड़ाई है. इसमें कीनिया, जीबुटी और दक्षिण सूडान के राष्ट्रपति बीच-बचाव कराने में लगे हैं, सऊदी अरब भी दोनों जनरलों के बीच इस संघर्ष को ख़त्म कर बातचीत की राह पर लाना चाहता है. लेकिन मेरा मानना है कि एक हफ़्ते में हालात थोड़े बेहतर हो सकते हैं क्योंकि दोनों ही जनरल के हालिया बयान में उन्होंने साफ़ किया है कि विदेशी नागरिकों से हमें कोई दिक़्क़त नहीं है और उन्हें हम बाहर जाने देंगे."

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अलजज़ीरा से बात करते हुए खाड़ी और उत्तरी अफ्रीकी देशों में यूरोपीय संघ के राजदूत रहे जेम्स मोरन कहते हैं, "लोगों को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए सबसे बड़ी ज़रूरत है एयरपोर्ट. ख़ार्तूम से पोर्ट तक की दूरी लंबी है ऐसे में सुरक्षित एयरपोर्ट सबसे ज़रूरी है. ऐसे माहौल में ख़ार्तूम से लोगों को निकाल कर पोर्ट तक लाना जोखिम भरा काम है. लोगों को एयरलिफ़्ट करके ही राजधानी से बाहर निकलना सुरक्षित है. हमें पता है कि एयपोर्ट सुरक्षित नहीं, इसलिए अमेरिका सहित कई देश पोर्ट के ज़रिए रेस्क्यू ऑपरेशन करने को लेकर सहज नहीं हैं."
सूडान में हो क्या रहा है?
बीते दस दिन से सूडान की राजधानी खार्तूम और देश के अन्य हिस्सों में दो सैन्य बल आपस में भिड़ गए हैं.
इस टकराव के केंद्र में दो जनरल हैं. सूडानी आर्म्ड फ़ोर्सेस (एफ़एएस) के प्रमुख अब्देल फ़तह अल बुरहान और अर्द्धसैनिक बल रैपिड सपोर्स फ़ोर्सेस (आरएसएफ़) के लीडर मोहम्मद हमदान दगालो जिन्हें हेमेदती के नाम से भी जाना जाता है.
साल 2021 में दोनों ने एक साथ काम किया और मिलकर देश में तख़्तापलट किया था लेकिन अब दबदबे के लिए दोनों के बीच की लड़ाई ने सूडान को बदहाल कर दिया है.
क़रीब एक दशक तक देश पर सैन्य शासन करने वाले ओमर अल बशीर सेना के साथ संतुलन बनाने के लिए हेमेदती और आरएसएफ़ पर बहुत भरोसा करते थे. उन्हें उम्मीद थी कि केवल एक सैन्य समूह उनका तख़्तापलट नहीं कर सकता.
लेकिन अप्रैल 2019 में जब महीनों तक विरोध प्रदर्शन हुआ तो बशीर का तख़्तापलट करने के लिए दोनों जनरल एक हो गए.

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अक्तूबर 2021 में नागरिकों और सेना की संयुक्त सरकार के तख्तापलट के बाद से ही सेना और अर्धसैनिक बल आमने-सामने हैं.
फ़िलहाल सॉवरेन काउंसिल के ज़रिए देश को सेना और आरएसएफ चला रहे हैं. लेकिन सरकार की असली कमान सेना प्रमुख जनरल अब्देल फतेह अल बुरहान के हाथों में है. वे एक तरह से देश के राष्ट्रपति हैं.
सॉवरेन काउंसिल के डिप्टी और आरएसएफ़ प्रमुख मोहम्मद हमदान दगालो यानी हेमेदती देश के दूसरे नंबर के नेता हैं.
क़रीब एक लाख की तादाद वाली रैपिड सपोर्ट फ़ोर्स के सेना में विलय के बाद बनने वाली नई सेना का नेतृत्व कौन करेगा, इस पर सहमति नहीं बन पा रही है.
आरएसएफ़ प्रमुख का कहना है कि सेना के सभी ठिकानों पर कब्ज़ा होने तक उनकी लड़ाई चलती रहेगी. वहीं सेना ने बातचीत की किसी संभावना को नकारते हुए कहा है कि अर्धसैनिक बल आरएसएफ़ के भंग होने तक उनकी कार्रवाई जारी रहेगी.
कैसे ये युद्ध पूरे क्षेत्र को प्रभावित कर सकता है
सूडान की भौगौलिक स्थिति इसे अफ्रीकी क्षेत्र का अहम देश बनाता है. इसकी सीमा सात देशों- मिस्र, इथोपिया, लीबिया, चाड, मध्य अफ्रीकी गणराज्य, इरिट्रिया और दक्षिण सूडान से लगती है.
जानकार मानते हैं सूडान के इस गृह युद्ध का असर इसके पड़ोसी देशों पर भी हो सकता है. इन देशों में पहले ही आंतरिक विरोध चल रहा है, अगर ऐसा हुआ तो ये पूरा क्षेत्र ही अस्थिर हो जाएगा.

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इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप के सदस्य एलन बोसवेल एसोसिएट प्रेस से बात करते हुए कहते हैं, "सूडान में जो हो रहा है उसका असर इस देश के बाहर तक जाएगा."
"खासकर चाड और दक्षिण सूडान ऐसे देश हैं जिन पर सूडान की सेना और आरएसएफ़ के बीच जारी संघर्ष का जल्द असर पड़ सकता है. अगर ऐसे ही चलता रहा तो सूडान में भी जल्द ही बाहरी ताकतें भी शामिल हो जाएंगी."
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