यूएस, यूके और ऑस्ट्रेलिया परमाणु पनडुब्बी प्रोजेक्ट पर सहमत, चीन ने जताई आपत्ति

ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और ब्रिटेन मिलकर पनडुब्बियां बनाएंगे

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और ब्रिटेन मिलकर पनडुब्बियां बनाएंगे

ऑस्ट्रेलिया, अमेरका और ब्रिटेन ने एक नया संयुक्त परमाणु पनडुब्बी बेड़ा बनाने की अपनी योजना पेश की है. एशिया-प्रशांत क्षेत्र में चीन के प्रभाव को सीमित करने के लिए ये क़दम उठाया जा रहा है.

ऑकस (ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और अमेरिका) समझौते के तहत ऑस्ट्रेलिया को कम से कम तीन परमाणु संचालित पनडुब्बियां अमेरिका से मिलेंदी. ये ऑस्ट्रेलिया की पहली परमाणु पनडुब्बियां होंगी.

ये सहयोगी देश नई और बेहद उन्नत तकनीक से पनडुब्बियों का नया बेड़ा भी बनाएंगे. इनमें ब्रटेन में बने रॉल्स रॉयस के रिएक्टर भी होंगे.

चीन ने इस महत्वपूर्ण नोसैनिक समझौते का कड़ा विरोध किया है.

चीन के विदेश मंत्रालय ने मंगलवार को जारी बयान में 'तीनों देशों पर ख़तरनाक और ग़लतियों वाले रास्ते पर आगे बढ़ते जाने' के आरोप लगाए हैं.

संयुक्त राष्ट्र में चीन के मिशन ने भी इन पश्चिमी सहयोगी देशों पर परमाणु अप्रसार के प्रयासों को ठेस पहुंचाने के आरोप भी लगाए हैं.

वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने कहा है कि इस समझौते का मक़सद क्षेत्र में शांति को बढ़ावा देना है. उन्होंने कहा कि ये पनडुब्बियां परमाणु ऊर्जा से चलेंगी ना कि परमाणु हथियारों से लैस होंगी.

ऑस्ट्रेलिया प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज़ और ब्रितानी प्रधानमत्री ऋषि सुनक के साथ कैलिफ़ोर्निया के सेन डिएगो में बोलते हुए जो बाइडेन ने कहा इस समझौते से ऑस्ट्रेलिया के परमाणु मुक्त देश रहने की प्रतिबद्धता को कोई ख़तरा नहीं है.

परमाणु पनडुब्बी

इमेज स्रोत, Reuters

वहीं ऑस्ट्रेलिया की नोसैनिक ताक़त में ये बढ़ा इज़ाफ़ा होगा. ब्रिटेन के बाद ऑस्ट्रेलिया ऐसा दूसरा देश होगा जिसके पास अमेरिका में बनीं अति उन्नत परमाणु पनडुब्बियां होंगी.

परमाणउ ऊर्जा से संचालित ये पनडुब्बियां डीज़ल संचालित पनडुब्बियों के मुक़ाबले लंबी यात्राएं कर सकेंगी और इनकी रफ़्तार भी अधिक होगी. पहली बार ऑस्ट्रेलिया के पास लंबी दूरी पर स्थित दुश्मन पर हमला करने की क्षमता भी होगी.

समझौते के तहत ऑस्ट्रेलिया के नाविकों को अमेरिका और ब्रिटेन के परमाणु परनडुब्बी अड्डों पर भेजा जाएगा ताकि वो इन्हें चलाने का प्रशिक्षण हासिल कर सकें.

2027 के बाद से अमेरिका और ब्रिटेन ऑस्ट्रेलिया के पर्थ में बने अड्डे पर सीमित संख्या में परमाणु पनडुब्बियों को तैनात भी करेंगे. साल 2030 में ऑस्ट्रेलिया अमेरिका से तीन वर्जीनिया-क्लास पनडुब्बियां ख़रीद सकेगा और उसके पास आगे दो और पनडुब्बिया ख़रीदने का भी विकल्प होगा.

इसके बाद ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन की नौसेनाओं के लिए बिलकुल नई परमाणु पनडुब्बियां डिज़ाइन और निर्मित करने की योजना है. इस नए मॉडल को एसएसएन-ऑकस कहा जाएगा.

ब्रितानी डिज़ाइन पर आधारित ये पनडुब्बी ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन में बनेंगी लेकिन ये तीनों देशों की तकनीक से लैस होगी.

राष्ट्रपति बाइडेन ने कहा है कि तीनों भारत-प्रशांत क्षेत्र को मुक्त और स्वतंत्र बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध हैं.

बाइडेन ने कहा, "इस सहयोग को और मज़बूत करके, हम एक बार फिर ये प्रदर्शित कर रहे हैं कि लोकतंत्र कैसे सुरक्षा और समृद्धि दे सकते हैं.. ना सिर्फ़ हमारे लिए बल्कि समूची दुनिया के लिए."

परमाणु पनडुब्बी

इमेज स्रोत, EPA

राष्ट्रपति बाइडेन ने अमेरिका के मौजूदा पनडुब्बी बेड़े को बढ़ाने और वर्तमान में इस्तेमाल की जा रहीं वर्जीनिया क्लास पनडुब्बियों की मरम्मत के लिए 4.6 अरब डॉलर ख़र्च करने की प्रतिबद्धता भी ज़ाहिर की.

ऑस्ट्रेलिया प्रधानमंत्री अल्बनीस ने कहा है कि इस योजना पर अगले तीस सालों में ऑस्ट्रेलिया क़रीब 246 अरब डॉलर ख़र्च करेगा. ये ऑस्ट्रेलिया के समूचे इतिहास में सैन्य क्षमता में सबसे बड़ा निवेश होगा.

अल्बनीस ने कहा कि ये पनडुब्बियां ऑस्ट्रेलिया के शिपयार्ड में बनेंगी और इससे स्थानीय स्तर पर हज़ारों नई नौकरियां पैदा होंगी. ब्रितानी प्रधानमंत्री ने भी कहा कि डर्बी और बैरो-इन-फर्नेस में भी नई नौकरियां पैदा होंगी क्योंकि यहां भी पनडुब्बियों का कुछ निर्माण कार्य होगा.

ब्रितानी प्रधानमंत्री ने कहा कि 18 महीने पहले ऑकस की योजना पेश की गई थी, तब से लेकर वैश्विक सुरक्षा के लिए ख़तरा बढ़ता ही जा रहा है.

ऋषि सुनक ने कहा, "रूस ने यूक्रेन पर अवैध हमला कर दिया है, चीन और अकड़ रहा है, उत्तर कोरिया और ईरान का व्यवहार अस्थिर करने वाला है- इन सबसे ऐसी दुनिया बढ़ रही है जिसमें ख़तरे हैं, अव्यवस्था है और विभाजन है."

अपनी अमेरिकी यात्रा के दौरान ऋषि सुनक ने कहा है कि दुश्मन देशों से बढ़ रहे ख़तरों के मद्देनज़र ब्रिटेन अगले दो सालों में सुरक्षा पर 6 अरब डॉलर अतिरिक्त ख़र्च करेगा.

सितंबर 2021 में ऑकस सुरक्षा गठबंधन की घोषणा हुई थी, तब से ही चीन इसकी आलोचना करता रहा है.

पिछले सप्ताह ही चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा था कि ये गठबंधन हथियारों की नई दौड़ पैदा कर सकता है.

लेकिन इसमें शामिल तीनों देशों का कहना है कि इसका मक़सद हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता और शांति लाना है.

हालांकि तीनों नेताओं ने कहा है कि इस सझौते से सहयोग बढ़ेगा लेकिन इसके अपने राजनीतिक परीणाम भी हैं.

पिछले साल ऑस्ट्रेलिया ने फ़्रांस के साथ हुआ डीज़ल पनडुब्बियों की ख़रीद का सौदा रद्द कर दिया था जिसके बाद फ़्रांस ऑस्ट्रेलिया से नाराज़ हो गया था.

ऑस्ट्रेलिया के सामने चीन के साथ ख़राब हो रहे राजनयिक संबंधों की भी चुनौती है. विश्लेषक ये सवाल उठाते रहे हैं कि क्या ऑस्ट्रेलिया अमेरिका के साथ सैन्य सहयोग बढ़ाए रखते हुए बीजिंग के साथ अपने कारोबारी रिश्तों को बनाए रख सकता है.

अभी किन देशों के पास हैं परमाणु पनडुब्बियां?

परमाणु पनडुब्बी

अभी अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस, चीन और भारत के पास परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बियां हैं.

परमाणु ऊर्जा से चलने वाली पनडुब्बी का सबसे बड़ा फ़ायदा ये होता है कि उन्हें फिर से ईंधन लेने की ज़रूरत नहीं पड़ती है. किसी परमाणु पनडुब्बी को जब ड्यूटी पर उतारा जाता है तो उसमें ईंधन के रूप में यूरेनियम की इतनी मात्रा मौजूद होती है कि वो अगले 30 सालों तक काम करते रह सकती है.

डीज़ल से चलने वाली पारंपरिक सबमरीन की तुलना में परमाणु ऊर्जा से लैस पनडुब्बी लंबे समय तक तेज़ रफ़्तार से काम कर सकती हैं. इसकी एक और ख़ास बात है. पारंपरिक कम्बस्टन इंजन के विपरीत इस पनडु्ब्बी को हवा की ज़रूरत नहीं पड़ती.

इसका मतलब ये हुआ कि एक न्यूक्लियर सबमरीन महीनों तक गहरे पानी में रह सकती है. उसे लंबे सफ़र पर दूरदराज़ के इलाकों में खुफिया अभियानों पर भेजा जा सकता है. लेकिन इसका एक नकारात्मक पहलू भी है. इसकी लागत बहुत ज़्यादा पड़ती है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)