सीरिया में भूकंपः इतनी देर से क्यों पहुंची संयुक्त राष्ट्र की मदद

इमेज स्रोत, Getty Images
- Author, बीबीसी वर्ल्ड न्यूज़ अरबी
- पदनाम, वर्ल्ड सर्विस
बीते महीने तुर्की और सीरिया में आए भूकंप के बाद सीरिया तक संयुक्त राष्ट्र की मदद पहुंचाने में अप्रत्याशित देरी हुई थी. क़ानूनी विशेषज्ञों ने बीबीसी से कहा है कि ये देरी ग़ैर-ज़रूरी थी.
क़ानून विशेषज्ञों का कहना है कि भूकंप पीड़ितों को मदद पहुंचाने के लिए सीरिया में दाख़िल होने के लिए संयुक्त राष्ट्र को ना ही सीरिया की सरकार की अनुमति की ज़रूरत थी और ना ही सुरक्षा परिषद की. ऐसा करने के लिए वो अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों की विस्तृत व्याख़्या का सहारा ले सकते थे.
संयुक्त राष्ट्र को सीरिया में मदद पहुंचाने के लिए तुर्की के साथ बॉर्डर पर एक अतिरिक्त चौकी को खोलने के लिए सीरिया की सरकार से अनुमति मिलने का एक सप्ताह तक इंतेज़ार करना पड़ा था.
ये मदद तुर्की के रास्ते सीरिया के विद्रोहियों के क़ब्ज़े वाले इलाक़ों तक पहुंचनी थी.
संयुक्त राष्ट्र का स्वयं का मानना है कि भूकंप के बाद पीड़ितों को बचाने और मदद पहुंचाने के लिए पहले 72 घंटे बेहद अहम होते हैं. इस दौरान ही मदद पहुंच जानी चाहिए.
बीबीसी को पता चला है कि संयुक्त राष्ट्र इन परिस्थितियों में अलग तरह से काम कर सकता था. हालांकि संयुक्त राष्ट्र इस मामले में बीबीसी से सहमत नहीं है.

इमेज स्रोत, Getty Images
'समय और त्वरित प्रतिक्रिया'
अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार अधिवक्ता साराह कय्याली कहती हैं, "भूकंप के बाद सबसे अधिक महत्वपूर्ण ये होता है कि मदद तुरंत पहुंचाई जाए. लेकिन इस मामले में संयुक्त राष्ट्र शक्तिहीन बैठा देखता रहा."
संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक इस भूकंप की वजह से उत्तर-पश्चिम सीरिया में 4500 से अधिक लोग मारे गए हैं और 8700 से अधिक घायल हुए हैं.
इस भूकंप का केंद्र तुर्की के गज़ियनटेप के पास था. छह फ़रवरी को आए 7.8 तीव्रता के भूकंप और उसके बाद आए झटकों की वजह से तुर्की में 45968 लोग मारे गए हैं. वहीं अधिकारियों का अनुमान है कि इस भूकंप से सीरिया के भीतर भी 6 हज़ार के क़रीब लोग मारे गए होंगे.
साल 2014 में जब पहली बार सीरिया में विद्रोहियों के नियंत्रण वाले इलाक़े में मदद भेजने को लेकर चर्चाएं हुईं थीं तब एंड्रयू गिलमोर संयुक्त राष्ट्र के वरिष्ठ अधिकारी थे.
गिलोमोर बीबीसी से कहते हैं, "अगर क़ानून ये कहता है कि आप एक भूख से तड़पते बच्चे को इस वजह से दूध नहीं पहुंचा सकते क्योंकि वो सीमा को उस तरफ़ है तो ऐसे क़ानून का उल्लंघन करने की ज़रूरत है."
बीबीसी ने अंतरराष्ट्रीय क़ानून और मानवाधिकारों के एक दर्जन से अधिक विशेषज्ञों से बात की है. इनमें कई प्रमुख वकील, प्रोफ़ेसर और अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के रिटायर्ड जज भी शामिल हैं. इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र के पूर्व विधि अधिकारियों से भी बात की गई है.
ये सभी इस बात पर सहमत हैं कि अगर संयुक्त राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय क़ानून की व्याख्या को अलग तरह से लेता और तुरंत मदद भेज देता तो लोगों को मरने से बचाया जा सकता था

इमेज स्रोत, Getty Images
सरकार की सहमति
संयुक्त राष्ट्र की प्रवक्ता स्टीफ़ेन दुख़ारिच ने बीबीसी से कहा, "किसी अंतरराष्ट्रीय सीमा के पार मानवीय मदद पहुंचाने के लिए हमें सरकार की अनुमति, और यहां सीरिया के मामले में संयुक्त राष्ट्र का प्रभावशाली प्रस्ताव लाना ज़रूरी है."
"हम कई सप्ताह तक अंतरराष्ट्रीय क़ानून पर अकादमिक बहस कर सकते हैं, इसमें महीने, साल लग सकते हैं. हमारा मानना ये है कि अंतरराष्ट्रीय क़ानून की वजह से हमारे काम में देरी नहीं हुई है."
किसी प्राकृतिक आपदा के बाद संयुक्त राष्ट्र अपनी मदद पहुंचाने में ही अहम भूमिका नहीं निभाता है बल्कि जो देश मदद के लिए आगे आते हैं उनके साथ समन्वय करने में भी संयुक्त राष्ट्र की अहम भूमिका होती है.
संयुक्त राष्ट्र अपने डिज़ास्टर असेसमेंट एंड को-ऑर्डिनेशन (यूएनडैक) कार्यक्रम के तहत राहत और बचाव अभियानों की व्यवस्था करता है.
गुज़ारिश किए जाने के 12 से 48 घंटों के भीतर यूएनडैक की टीमों को दुनियाभर में कहीं भी तैनात किया जा सकता है. तुर्की में भी ऐसा ही हुआ था.
लेकिन संयुक्त राष्ट्र ने उत्तर-पश्चिम सीरिया में स्वास्थ्य टीमों को भेजने के लिए किसी तरह की कोई आपात गुज़ारिश नहीं की थी.
संयुक्त राष्ट्र ने बीबीसी को भी सीरिया में राहत-बचाव दल भेजने की गुज़ारिश करने के बारे में कोई जानकारी नहीं दी है.
तुर्की-सीरिया भूकंप के बाद राहत और बचाव कार्य में लगे अंतरराष्ट्रीय राहत विशेषज्ञों ने बीबीसी को बताया है कि संयुक्त राष्ट्र की तरफ़ से ये मांग किए जाने के अलावा टीमों को आपात स्थिति में वहां भेजना का कोई दूसरा स्पष्ट रास्ता नहीं था.
संयुक्त राष्ट्र की प्रवक्ता स्टीफ़ेन दुख़ारिच कहती हैं कि आपात टीमों की कमी की वजह देशों की सरकारों के फ़ैसले लेने में विलंब है.
वो कहत हैं, "सुरक्षा को लेकर चिंताएं हैं, राजनीतिक चिंताएं हैं, हर तरह के कारणों ने इसे प्रभावित किया होगा."
इंटरनेशनल क्रिमिनल कोर्ट में अभियोजक के विशेष सलाहाकार मार्को सासोली कहते हैं कि जेनेवा कन्वेंशन के तहत, जो अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों का आधार है, के तहत संयुक्त राष्ट्र को सरकार की अनुमति लिए बिने सीरिया में मदद भेजने का फ्रेमवर्क था.
वो बीबीसी से कहते हैं, "सीरिया भी जेनेवा कन्वेंशन का हिस्सा है. ये कहता है कि कोई निष्पक्ष मानवीय समूह किसी भी संघर्ष के किसी भी पक्ष को अपनी राहत सेवाएं दे सकता है."
पीड़ितों की शिकायतें
भूकंप के पीड़ितों ने संयुक्त राष्ट्र की प्रतिक्रिया को लेकर शिकायतें की हैं.
ओमर हाजी ने इस आपदा में अपनी पत्नी और पांच बच्चों को खो दिया.

ओमर हाजी अपने लापता बचे बेटे 14 वर्षीय अब्दुर्रहमान को मलबे में खोज रहे थे, जब उन्होंने बीबीसी से बात की. तीन तक खोजने के बाद आख़िरकार वो अपने बेटे से मिल सके.
अपने नंगे हाथों से परिजनों और दोस्तों की तलाश में मलबा खोदने वाले ओमर हाजी कहते हैं, "संयुक्त राष्ट्र की मदद काफ़ी नहीं थी. सबसे अहम मदद जो हमें मिल पाई वो स्थानीय लोगों ने की. अगर संयुक्त राष्ट्र की मदद कुछ पहले पहुंच जाती तो हालात अलग हो सकते थे."
भूकंप के एक सप्ताह बाद संयुक्त राष्ट्र की आपात राहत के प्रमुख मार्टिन ग्रिफ़िथ बाब-अल-हवा बॉर्डर क्रासिंग पर पहुंचे थे. उन्होंने ट्विटर पर लिखा था, "संयुक्त राष्ट्र अभी तक उत्तर-पश्चिम सीरिया के लोगों तक मदद पहुंचाने में नाकाम रहा है. उन्हें लगता है कि उन्हें अकेला छोड़ दिया गया है और उनकी ये भावना सही है. वो उस अंतरराष्ट्रीय मदद की राह देख रहे हैं जो पहुंची ही नहीं है."
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक,ट्विटर,इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)
















