अजित डोभाल के इस दौरे की पाकिस्तान में इतनी चर्चा क्यों

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भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल सात से नौ फ़रवरी तक रूस की राजधानी मॉस्को में थे.
वह आठ फ़रवरी को अफ़ग़ानिस्तान पर आयोजित एक बैठक में शामिल होने गए थे.
इस बैठक में अजित डोभाल के अलावा ईरान, कज़ाख़्स्तान, चीन, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, रूस और उज़्बेकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शामिल थे.
बैठक में अफ़ग़ानिस्तान में मानवीय चुनौतियों और सुरक्षा को लेकर बातचीत हुई थी.
अजित डोभाल की मुलाक़ात रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से भी हुई थी. पुतिन प्रोटोकॉल तोड़ इस बैठक में शामिल राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों से मिलने आए थे.
ऐसा विरले ही होता है कि राष्ट्रपति पुतिन कभी किसी देश के एनएसए या कैबिनेट मंत्रियों से मिलते हों. वो भी तब जब अजित डोभाल अमेरिका और ब्रिटेन से होते हुए रूस पहुँचे थे.
अमेरिका और ब्रिटेन यूक्रेन के साथ हैं और रूस के ख़िलाफ़ लगातार फ़ैसले ले रहे हैं. लेकिन भारत यूक्रेन संकट में किसी खेमे में नहीं है. भारत यूक्रेन संकट में लगातार इस बात पर ज़ोर देता रहा है कि बातचीत के ज़रिए इस जंग को तत्काल रोकना चाहिए.
भारत इस साल जी-20 और एससीओ समिट के आयोजन की तैयारी कर रहा है. कहा जा रहा है कि भारत की कोशिश है कि जी-20 की बैठक में रूस और पश्चिम के बीच कोई संवाद हो सके.
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भारत के साथ मुश्किल यह है कि 2020 से चीन के साथ सीमा पर तनाव चल रहा है. दूसरी तरफ़ रूस ने पिछले साल ही 'चीन के साथ दोस्ती सीमाओं से परे है' की घोषणा की थी.
भारत की अमेरिका से बढ़ती क़रीबी को चीन के साथ बढ़ती तनातनी से जोड़कर देखा जाता है.
भारत की पश्चिम से बढ़ती क़रीबी और इंडो-पैसिफिक के लिए क्वॉड गुट को लेकर रूस अपनी असहजता ज़ाहिर कर चुका है. इसके बावजूद रूस और चीन की बढ़ती क़रीब पर न भारत कोई आपत्ति जताता है और न ही अमेरिका के साथ भारत की बढ़ती नज़दीकी पर रूस नाराज़ होता है.
अजित डोभाल की चार फ़रवरी को लंदन में ब्रिटेन के सुरक्षा सलाहकार टिम बैरो से मुलाक़ात हुई थी. इस बैठक में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ऋषि सुनक भी शामिल हुए थे. इसके अलावा दो फ़रवरी को वॉशिंगटन में अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने भी अजित डोभाल से मुलाक़ात की थी.
अजित डोभाल से मुलाक़ात के बाद एंटनी ब्लिंकन ने कहा था, ''वैश्विक चुनौतियों के समाधान के लिए अमेरिका भारत के साथ सहयोग बढ़ा रहा है. भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल के साथ रणनीतिक साझेदारी और मज़बूत करने के लिए अच्छी बातचीत हुई है.''
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अजित डोभाल की पुतिन से मुलाक़ात की चर्चा पाकिस्तान में ख़ूब हो रही है. कहा जा रहा है कि कहाँ अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के आने को भारत के लिए झटके के तौर पर देखा जा रहा था लेकिन धीरे-धीरे पाकिस्तान की पकड़ अफ़ग़ानिस्तान में कमज़ोर पड़ रही है.
पाकिस्तानी अमेरिकी कारोबारी और चेयर मुस्लिम ऑफ अमेरिका साजिद एन. तरार ने ट्वीट कर कहा है, ''अजित डोभाल अंतरराष्ट्रीय दौर पर थे. अमेरिका से उन्हें सैन्य तकनीक मिल रहा है, ब्रिटेन में आतंकवाद पर बात की और रूस में अफ़ग़ानिस्तान समिट में शामिल हुए. पाकिस्तान में अभी कोई एनएसए नहीं है और उसने अफ़ग़ानिस्तान समिट में शामिल होने से इनकार कर दिया था. पाकिस्तान का यही भविष्य है?''
जब अजित डोभाल ब्रिटेन में थे तो पाकिस्तान के सेना प्रमुख भी ब्रिटेन में ही थे.
साजिद तरार ने लिखा है, ''एक डॉलर के बदले 89.84 अफ़ग़ानी देने पड़ रहे हैं जबकि पाकिस्तान में एक डॉलर की क़ीमत 271.24 पाकिस्तानी रुपए हैं. पाकिस्तान के वित्त मंत्रियों को तालिबान इंस्टीट्यूट ऑफ इकोनॉमिक्स से सीखने की ज़रूरत है.''
भारत में पाकिस्तान के उच्चायुक्त रहे अब्दुल बासित का कहना है कि पाकिस्तान का एनएसए इसलिए नहीं है कि विदेश मंत्रालय नहीं चाहता होगा. पाकिस्तान में अभी गठबंधन सरकार है. इसमें पीएमएल (एन) और पाकिस्तान पीपल्स पार्टी साथ में हैं. विदेश मंत्रालय पीपीपी के चेयरमैन बिलावल भुट्टो के पास है.
अफ़ग़ानिस्तान को लेकर मॉस्को समिट में अजित डोभाल की मौजूदगी को लेकर पाकिस्तानी पत्रकार आलिया शाह का कहना है कि तालिबान के आने के बावजूद अफ़ग़ानिस्तान में भारत की मौजूदगी कम नहीं हुई है.
पाकिस्तान में अंतरराष्ट्रीय राजनीति के विश्लेषक डॉ क़मर चीमा ने अमेरिका की डेलावेयर यूनिवर्सिटी में भारतीय मूल के अमेरिकी प्रोफ़ेसर मुक़्तदर ख़ान से अजित डोभाल के दौरे के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा, ''अमेरिका, ब्रिटेन और रूस तीनों परमाणु शक्ति संपन्न देश हैं और तीनों सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य हैं. अजित डोभाल का इन तीनों देशों का दौरा बहुत ही सफल रहा है."
"इंडिया में डिप्लोमैसी के तीन लेवल हैं. एक तो प्रधानमंत्री मोदी ख़ुद ही डिप्लोमैसी करते हैं. मोदी जब ट्रैवेल करते हैं तो डिप्लोमैसी उनके दिमाग़ में होती है. मई में नरेंद्र मोदी मेहमान बनकर अमेरिका जाने वाले हैं. दूसरे लेवल की डिप्लोमैसी के सेंटर जयशंकर हैं और तीसरे नंबर पर अजित डोभाल हैं.''
मुक़्तदर ख़ान ने कहा, ''डोभाल और जयशंकर पर प्रधानमंत्री मोदी ख़ासा भरोसा करते हैं. डोभाल तो 2014 से ही सुरक्षा सलाहकार हैं. डोभाल के साथ अमेरिका में जो बैठक हुई, वह व्हाइट हाउस में हुई थी. डोभाल के साथ अमेरिका के एनएसए और विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने बैठक की. बिलावल भुट्टो भी डोभाल के पहले अमेरिका आए थे लेकिन ब्लिकंन उनसे नहीं मिले थे. यूक्रेन भारत से ख़ुश नहीं है लेकिन अमेरिका भारत के ख़िलाफ़ किसी भी तरह के प्रतिबंध नहीं लगाना चाहता है.''
मुक़्तदर ख़ान का कहना है कि ब्रिटेन के एनएसए के साथ बैठक के दौरान ऋषि सुनक का आना भी एक अहम घटना है. उसी तरह से रूस में हुआ कि पुतिन ने भी अजित डोभाल से मुलाक़ात की.
मुक़्तदर ख़ान ने पाकिस्तान की बेचैनी को लेकर कहा, ''पाकिस्तान के पास अभी कोई एनएसए नहीं है. पाकिस्तान को आमंत्रित किया गया था लेकिन नहीं गया. इस बैठक में एससीओ के ही सारे एनएसए थे. मॉस्को में जिस तरह से डोभाल को तवज्जो मिली, वह काफ़ी मायने रखती है. अफ़ग़ानिस्तान ने भारत में निवेश बंद नहीं किया है. भारत बल्कि अफ़ग़ानिस्तान में भारत मानवीय मदद भी पहुँचा रहा है. अभी अफ़ग़ानिस्तान से सबसे ज़्यादा किसी को नुक़सान हो रहा है, तो वह पाकिस्तान है.''
क़मर चीमा ने पूछा कि क्या अमेरिका को बुरा नहीं लगता है कि भारत चीन के साथ भी अच्छा बनना चाहता है, ईरान के साथ भी रहना चाहता है और रूस के साथ तो खुलकर है ही. मुक़्तदर ख़ान ने जवाब में कहा, ''अमेरिका एशिया में बिना इंडिया के अपना पैर नहीं जमा सकता है. मुझे नहीं पता है अनौपचारिक बातचीत क्या होती है. मेरा मानना है कि मॉस्को में अमेरिका की आवाज़ भी इंडिया है. अमेरिका के ग्लोबल एजेंडा और इंडिया एजेंडा में फ़र्क़ कम होता जा रहा है.''
क़मर चीमा कहते हैं कि हालात अब बदल गए हैं. वह कहते हैं, ''पहले इंडिया कहता था कि अफ़ग़ानिस्तान की ज़मीन का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए और अब यह बात पाकिस्तान कह रहा है कि अफ़ग़ानिस्तान की ज़मीन का इस्तेमाल उसके ख़िलाफ़ नहीं होना चाहिए.''
कॉपी - रजनीश कुमार
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