ग्लोबलाइजेशन के दौर में आत्मनिर्भरता पर दांव लगाना कितना बड़ा जोखिम है?

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- Author, ड्राफ्टिंग
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़ वर्ल्ड
साल 1989 में बर्लिन की दीवार गिरने और दो साल बाद सोवियत संघ के बिखराव के साथ शीतयुद्ध खत्म हो गया. इसके बाद ग्लोबलाइजेशन का युग शुरू हुआ जिसने मार्केट इकोनॉमी को जन्म दिया. ये एक नए आधुनिक दौर की शुरुआत थी.
लेकिन 21वीं सदी में सामने आए कई संकटों ने आपस में जुड़ी इस दुनिया के सामने नई चुनौतियां भी पेश कीं. वॉलस्ट्रीट से शुरू हुए 2008 के वित्तीय संकट ने पूरी दुनिया में उथल-पुथल मचा दी थी. इससे एक दूसरे पर आर्थिक निर्भरता के मॉडल पर सवाल उठने शुरू हुए.
अब अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप और भारत में नरेंद्र मोदी समेत कई नेताओं ने अपने-अपने देश की ज़रूरतों और प्राथमिकताओं के हिसाब से आत्मनिर्भरता का नारा बुलंद करना शुरू किया है. यूरोप में भी ब्रिटेन ने यूरोपियन यूनियन से अलग होने के लिए ब्रेग्ज़िट के समर्थन में वोट दिया.
लेकिन हाल के दिनों में ग्लोबलाइज़ेशन को सबसे बड़ा झटका कोरोना वायरस से फैली महामारी से लगा. इसने न सिर्फ़ कुछ देशों को अपनी सीमा बंद करने पर मजबूर किया बल्कि उन्होंने वायरस से लड़ने के लिए सबसे ज़रूरी मास्क से लेकर वैक्सीन तक को बाहर भेजने से इनकार कर दिया.
रूस-यूक्रेन युद्ध की वजह से रूसी गैस पर निर्भर यूरोपीय देशों के सामने भी संकट खड़ा हुआ. दूसरी ओर जो देश यूक्रेन की अनाज सप्लाई पर निर्भर थे उन्हें भी झटका लगा.
गैस और अनाज की सप्लाई में अड़चन की वजह से पूरी दुनिया में खाद्यान्न और ईंधन कीमतों में आग लग गई. इस असर से लगभग पूरी दुनिया में महंगाई का संकट छाया हुआ है. यह ग्लोबल हो चुकी दुनिया की एक और मुसीबत है.
इन हालातों ने कई देशों को 'अटॉर्की' का नारा बुलंद करने को मजबूर किया है. प्राचीन ग्रीक में 'अटॉर्की' को परिभाषित किया गया है. इसका मतलब है कि आत्मनिर्भर व्यवस्था. लेकिन बड़ा सवाल ये है कि कोई देश सिर्फ़ खुद पर निर्भर रह कर इस दुनिया में टिका रह सकता है.
साथ में यह सवाल भी है कि क्या अपनी ज़रूरत की सारी चीजें खुद पैदा करना आयात करने की तुलना में सुविधाजनक होगा.
क्या अटॉर्की का दौर शुरू हो सकता है?

बीबीसी न्यूज़नाइट के आर्थिक संपादक वेन चु ने रेडियो 4 की एक सिरीज़ के लिए इस सवाल की पड़ताल की. सिरीज़ का नाम था,'' द न्यू एज़ ऑफ अटॉर्की''.
चु ने इस बात की ओर ध्यान दिलाया है कि दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं अमेरिका और चीन ने इस बात के साफ़ संकेत दिए हैं कि वे इस दिशा (आत्मनिर्भर व्यवस्था) में आगे बढ़ रहे हैं.
अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने कहा,''हमारी मैन्युफैक्चरिंग का भविष्य, हमारा आर्थिक भविष्य और जलवायु परिवर्तन के संकट का समाधान सब कुछ अमेरिकी होगा.''
राष्ट्रपति बनते ही उन्होंने ''मेड इन अमेरिका'' का नारा बुलंद किया.
इस बीच चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने अपनी 'मेड इन चाइना' स्ट्रेटजी को उतारा. इसका लक्ष्य टेक्नोलॉजी में निवेश बढ़ाना था. चीन लगातार अपनी 'ज़िली गेंगसेंग' नीति पर जोर देता रहा है. इसका मतलब है कि 'आत्मनिर्भरता' वाली नीति.
पॉडकास्ट ''चाइनीज व्हिसपर्स'' की होस्ट सिंडी यु का कहना है,'' ट्रंप प्रशासन के दौरान छिड़े ट्रेड वॉर ने चीन को यह अहसास कराया कि अगर दुनिया ने राजनीतिक और आर्थिक वजहों से उससे मुंह मोड़ा तो उसके सामने भारी संकट पैदा हो सकता है. ''
अब एक और सवाल पैदा होता है कि आत्मनिर्भरता के फैलाव और ग्लोबाइजेशन के सिकुड़न वाली स्थिति कैसी होगी.क्या इससे समृद्धि बढ़ेगी?
इस सवाल का जवाब जानने के लिए चु ने आत्मनिर्भरता के दो मुख्य क्षेत्र- भोजन और ईंधन से जुड़े सवालों की पड़ताल की.

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खाद्य आत्मनिर्भरता

आज पूरी दुनिया के लगभग सारे देश अपने भोजन का एक हिस्सा आयात करते हैं. लेकिन अब अधिकतर देश इस बात की पैरवी करने लगे हैं कि उनके लोग वहीं खाएं जो स्थानीय स्तर पर पैदा होता है.
खाद्य आत्मनिर्भरता से गैस उत्सर्जन में कमी आएगी. ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन जलवायु परिवर्तन के संकट को बढ़ा देता है.
इन देशों का तर्क है कि अगर सिर्फ़ अपने ही यहां पैदा किए जाने वाले खाद्यान्न का इस्तेमाल किया जाए तो बाहर से भोजन नहीं मंगाना पड़ेगा. इससे ट्रांसपोर्ट से होने वाला उत्सर्जन घट जाएगा, जो पर्यावरण को बेहतर करेगा.
एक दूसरा तर्क ये है कि अगर खाद्यान्न आत्मनिर्भरता की नीति अपनाई जाए तो अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन पर निर्भरता घटेगी. लिहाज़ा खराब मौसम,युद्ध या दुर्घटना जैसे हालात में किसी देश को अंतरराष्ट्रीय सप्लाई चेन पर निर्भर रहना नहीं पड़ेगा. 2021 के शुरुआती दिनों में स्वेज़ नहर में रास्ता बंद हो जाने के वजह से सप्लाई का संकट खड़ा हो गया था.
लंदन यूनिवर्सिटी में फूड पॉलिसी के प्रोफेसर टीम लांग कहते हैं. ''इस वक्त दुनिया भर में जो नीतियां बन रही हैं उनमें अटॉर्की या आत्मनिर्भरता और खाद्य आत्मनिर्भरता प्राथमिकता में सबसे ऊपर है.''
लेकिन क्या अपनी ज़रूरत से ज़्यादा भोजन बाहर से मंगाने वाला देश इस मामले में आत्मनिर्भर हो सकता है.
इसके लिए चु ने इंग्लैंड में डेवोन का दौरा किया. इस इलाके में ब्रिटेन के लोगों की ओर से इस्तेमाल ज़्यादातर अनाजों की पैदावार ली जाती है.

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खाद्य आत्मनिर्भरता के लिए क्या करना होगा?

आज का तारीख में ब्रिटेन अपनी ज़रूरत का 50 फ़ीसदी भोजन खुद पैदा करता है और आधा बाहर से मंगाता है. क्या ब्रिटेन अपनी ज़रूरत का पूरा अनाज, फल और सब्ज़ियां समेत तमाम खाने की चीजें खुद पैदा कर सकता है?
रिवरसाइ़ड ऑर्गेनिक के संस्थापक और दो बार बीबीसी रेडियो4 के 'फार्मर ऑफ द ईयर' रह चुके गाय सिंह वॉटसन कहते हैं, '' हां, हम ये कर सकते हैं. लेकिन हमें अपने आहार में ज़बरदस्त बदलाव करना होगा'' .
वो कहते हैं,'' लोगों को सिर्फ़ वही खाना होगा जो हम यहां हर सीज़न में पैदा कर सकते हैं. इसका मतलब है कि उन चीज़ों को छोड़ना होगा जो आम खान-पान का हिस्सा है. जैसे केला.''
'' हमें कम एनिमल प्रोटीन खाना होगा. यानी डेयरी उत्पादों, अंडों और मांस की खपत कम करनी होगी. ''
'' हमें उन फसलों की खेती के लिए जानवरों की चारागाहों में कटौती करनी होगी, जो कभी यहां बाहर से लाए गए थे. ''
अर्थशास्त्री ब्रैड डी लॉन्ग ने अपनी किताब '' स्लाउचिंग टुवर्ड्स यूटोपिया: एन इकोनॉमिक हिस्ट्री इन ट्वेन्टिंथ सेंचुरी'' में लिखा है कि इस तरह की सीमाओं की वजह से आत्मनिर्भरता का रास्ता कठिन साबित होगा.
मुक्त व्यापार के समर्थक इस अर्थशास्त्री का कहना है,''आप अपनी ही धरती पर हर चीज़ नहीं उगा सकते हैं. या हर चीज़ का खनन नहीं कर सकते.और सबसे बड़ी बात ये है कि आप सस्ते और कारगर तरीके से हर कुछ नहीं कर सकते''.
डी लॉन्ग का कहना है कि सब कुछ खुद बनाने की कोशिश करके आप ''कारोबार के ज़रिये होने वाले बहुत बड़े फायदों'' को खो देते हैं. अगर कोई देश किसी खास चीज़ का उत्पादन करता है तो उसके पक्ष में कई चीजे़ं होती हैं.
दूसरे विशेषज्ञों का कहना है कि अतीत में खाद्य आत्मनिर्भरता हासिल करने की कोशिश हुई है लेकिन इसके घातक नतीजे भी हुए हैं.
कम से कम दो उदाहरण तो काफी जाने-पहचाने हैं. 1950 के दशक के आखिर में चीन में माओत्से तुंग के ''ग्रेट लीप फॉरवर्ड'' की वजह से वहां भयानक अकाल पड़ा और करोड़ों लोगों की मौत हो गई.
दूसरा उदाहरण उत्तर कोरिया का है, जिसकी बंद अर्थव्यवस्था की वजह से 1990 के दशक में भारी खाद्य संकट पैदा हुआ और इससे लगभग 20 लाख मौत के मुंह में चले गए.

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ऊर्जा आत्मनिर्भरता

ऊर्जा की बात करें तो इस बात पर विशेषज्ञों में काफी हद तक सहमति है कि ज़रूरत का ज़्यादा से ज़्यादा ऊर्जा उत्पादन देश के भीतर ही किया जाए.
ये न सिर्फ़ देश की सुरक्षा के लिहाज़ से अच्छा है बल्कि आधुनिक ऊर्जा उत्पादक संसाधन जैसे सौर और रिन्युबल ऊर्जा से नाम मात्र का ही कार्बन उत्सर्जन होता है.
कोरोना महामारी और रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद अगर दुनिया आत्मनिर्भरता की बात कर रही है तो इससे कार्बन उत्सर्जन कम करने और ग्लोबल वॉर्मिंग घटाने में मदद मिल सकती है.
लेकिन क्या ऊर्जा आत्मनिर्भरता हासिल करना संभव है?
इस सवाल का जवाब जानने के लिए चु ने ऊर्जा आत्मनिर्भरता हासिल करने की ब्रिटेन का क्षमता का जायजा लिया.
इस क्रम में पारंपरिक और रिन्युबल एनर्जी बनाने वाली कंपनी ऑक्टोपस एनर्जी के सीईओ ग्रेग जैकसन ने कहा कि ब्रिटेन पवन और सौर ऊर्जा पर निर्भर रह सकता है. दूसरे विशेषज्ञ भी इस बात पर सहमत हैं.
हालांकि इसके लिए विंड टरबाइन और सोलर पैनल लगे बड़े इलाकों की जरूरत होगी. लेकिन इसका ग्रामीण इलाकों में विरोध हो सकता है. यहां के लोग कह सकते हैं कि ये उनकी धरती बर्बाद कर देंगे.
सोलर पैनल फार्म वाले कारोबारी समूह जेएम स्ट्रेटन एंड कंपनी के जोश स्ट्रेटन का कहना है कि सोलर पैनल कहां लगाने हैं इसके लिए काफ़ी सतर्क रहने की ज़रूरत है.
वो कहते हैं,''1950 और 1960 के दशक में इसके लिए बड़े-बडे़ खंभे लगाए गए और लेकिन आज तक उन्हें धरती की सुंदरता नष्ट करने वालों के तौर पर देखा जाता है''.

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लेकिन सवाल है कि क्या ब्रिटेन ऊर्जा आत्मनिर्भरता के लिए अपनी धरती की सुंदरता को नष्ट करने देगा?
हालांकि पत्रकार और अमेरिकी सरकार में काम कर चुके ग्लोबलाइजेशन के विशेषज्ञ स्कॉट मैलकमसन का कहना है अगर देशों ने ऊर्जा उत्पादन के अपने स्रोत विकसित नहीं किए तो ऊर्जा आत्मनिर्भरता का उनका सपना पूरा नहीं होगा.
दूसरे देशों से ऊर्जा का आयात राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा पैदा कर सकता है. लेकिन ऊर्जा आत्मनिर्भरता की गारंटी देना भी ख़तरे से खाली नहीं है.
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में स्ट्रेटजी डायरेक्टर सेला पज़ारबासिओगलु का कहना है, '' अगर सारे देशों ने चीजें बंद दरवाज़ों के अंदर करने की कोशिश की तो इसके अपने जोखिम है. इससे देश के अंदर ही ज़्यादा उथल-पुथल होगी.''
उनका कहना है,''दरअसल सप्लाई चेन को डाइवर्सिफाई करने और देश के भीतर पैदा होने वाली चीजों के बीच संतुलन बनाना होगा. लेकिन कहीं न कहीं कुछ चीजें तो घर में पैदा करनी ही होगी. ''

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विशेषज्ञों का कहना है कि ग्लोबलाइजेशन और अंतरराष्ट्रीय सहयोग का मॉडल छोड़ देने से भारी गड़बड़ी हो सकती है. क्योंकि जलवायु परिवर्तन और महामारी जैसी समस्या सभी देशों के सामने है. अगर इस मामले पर तमाम देशों के बीच सहयोग नहीं हुआ तो बड़ा संकट खड़ा हो सकता है.
उनका कहना है कि इस तरह की आत्मनिर्भरता के आर्थिक नतीजे गंभीर हो सकते हैं. आत्मनिर्भरता पर बहुत ज्यादा जोर नकारात्मक नतीजे दे सकता है.
उनका कहना है, ''इससे उत्पादकता घट सकती है. आर्थिक विकास में गिरावट आ सकती है और जीवनस्तर भी नीचे जा सकता है. '' यह ग्लोबलाइजेशन से हासिल फायदों को खत्म कर सकती है. ''
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