जहां आरा: शानदार सराय और मस्जिदें बनवाने वाली दुनिया की सबसे अमीर शहज़ादी

जहां आरा

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इमेज कैप्शन, जहां आरा की एक पुरानी पेंटिंग
    • Author, अज़ीज़ुल्लाह ख़ान
    • पदनाम, बीबीसी उर्दू डॉट कॉम, पेशावर

जहां आरा एक सुंदर और प्रतिभाशाली राजकुमारी थीं जिन्हें कई इतिहासकार 'मुग़ल काल की सबसे असरदार शहज़ादी' और 'दुनिया की सबसे अमीर शहज़ादी' जैसी उपमा से याद करते हैं.

इतिहास के विवरणों में उनकी 'अमारत' यानी उनके शासन और मुग़ल दौर में उनके प्रभाव व प्रभुत्व के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है.

मगर पाकिस्तान के शहर पेशावर में शहज़ादी जहां आरा के आगमन और व्यापारियों की सुविधा के लिए अपने समय की आधुनिक सराय बनवाने का बहुत ज्यादा उल्लेख नहीं मिलता.

मुग़ल काल में पेशावर कारोबार का एक बड़ा केंद्र था. दिल्ली से मध्य एशिया तक व्यापार पेशावर के रास्ते होता था.

विभिन्न देशों से आने वाले व्यापारियों के क़ाफ़िले यहां पड़ाव डालते, यहां उनके कारोबारी मामले होते.

इसके बाद व्यापारी और उनके सामान ढोने वाले जानवर यहां तरोताज़ा होकर अगली मंज़िल की ओर बढ़ जाते.

पेशावर में व्यापारियों के लिए ये सुविधाएं जहां आरा के आगमन से पहले नहीं थीं.

जहां आरा सन 1638 में पेशावर पहुंचीं और अपने दौर में उन्होंने एक बड़ी घोषणा की.

मुग़ल इतिहास पेशावर सराय जहां आरा
इमेज कैप्शन, पेशावर का 'सराय जहां आरा बेगम'

सराय जहां आरा बेगम

जहां आरा ने यहां लोगों की परेशानियां देखीं. ख़ास तौर पर व्यापारियों के ठहरने की समस्याओं को देखते हुए उन्होंने यहां एक आधुनिक सराय बनवाने की घोषणा की. सराय का काम 1638 में शुरू हुआ. ये 1641 में बनकर तैयार हुई. इस इमारत को इतिहास की किताबों में 'कारवां सराय', 'सराय जहां बेगम' और 'सराय दो दर' के नाम से याद किया जाता है.

ख़ैबर पख़्तूनख़्वा में पुरातत्व विभाग के डायरेक्टर अब्दुस समद ख़ान ने बताया कि जहां आरा बेगम ने पेशावर शहर के एक अहम जगह पर यह सराय बनवाई जो बेहद सुरक्षित थी, क्योंकि यह शहर के क़िले के अंदर बनाई गई थी.

इसमें सिर्फ़ रिहायशी कमरे ही नहीं थे, बल्कि यहां व्यापारियों को हर प्रकार की सुविधाएं उपलब्ध कराई गई थीं.

यह सराय शहर के मध्य में सबसे ऊंचे स्थान 'गोर गठरी' में बनाई गई, जहां हर कमरे के आगे छोटा बरामदा और कमरों के साथ बड़ा हॉल बनाया गया था.

हॉल में बैठकर व्यापारी अपने सौदे तय करते थे. इसके अलावा क़ाफ़िलों के साथ चल रहे सामान ढोने वाले जानवरों के लिए अलग जगह बनाई गई थी. पानी की व्यवस्था के लिए एक कुआं था और उसके साथ एक ख़ूबसूरत मस्जिद.

गोर गठरी के इंचार्ज नूर ख़ान ने बीबीसी को बताया "इस सराय में वैसे तो बहुत कमरे थे, लेकिन इनमें से 140 ऐसे थे जो इस्तेमाल के लायक़ थे."

उन्होंने बताया कि पेशावर में उस दौर में यूं तो कुल आठ सरायें थीं जिनमें व्यापारी और दूसरे क्षेत्रों से आने वाले लोग ठहरते थे लेकिन उनमें सुविधाओं का स्तर वो नहीं था जो स्तर जहां आरा की ओर से बनाई गई सराय में था.

पाकिस्तान

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इमेज कैप्शन, इस तस्वीर में शाहजहाँ अपनी बीमार बेगम मुमताज महल को गोद में लिए, जहाँ आरा भी संभवत: इस तस्वीर में मौजूद हैं

जहां आरा कौन थीं?

मुग़ल दौर की महत्वपूर्ण महिलाओं में जहां आरा बेगम को शीर्ष स्थान प्राप्त रहा है. वह शहाबुद्दीन मोहम्मद ख़ुर्रम, जिन्हें बाद में शाहजहां के नाम से जाना गया, की बड़ी बेटी थीं.

उनकी मां का नाम अर्जुमंद बानो बेगम था जो 'मुमताज़ महल' के नाम से जानी जाती हैं. जहां आरा शाहजहां की बड़ी और 'लाडली बेटी' थीं. उन्हें 'बादशाह बेगम' और 'फ़ातिमा ज़मां बेगम' जैसे सम्मानित नाम भी दिए गए.

प्रसिद्ध इतिहासकार और पुरातत्व विशेषज्ञ अली जान ने बीबीसी को बताया "वैसे तो जहां आरा बेगम के पेशावर या उससे आगे के दौर का बहुत उल्लेख कहीं सामने नहीं आया, लेकिन मुग़ल काल में पेशावर व्यापारिक दृष्टि से एक महत्वपूर्ण शहर था और जहां आरा उस दौर की प्रभावशाली व्यक्तित्व थीं."

इतिहास की पुस्तकों में अक्सर जहां आरा बेगम के बारे में उल्लेख मिलता है कि वह लोक कल्याणकारी कामों पर ज़्यादा ध्यान देती थीं.

उन्होंने दिल्ली में भी बड़े पैमाने पर जन कल्याण के काम किए. मस्जिदें बनवाईं और उनके लिए संसाधनों की भी व्यवस्था की थी. उनके लिए वक़्फ़ क़ायम किए और उसके लिए पैसे मस्जिद के साथ लगे बाज़ार की दुकानों से आते थे.

इसी आमद से मस्जिद के इमाम, मुअज़्ज़िन (अज़ान देने वाले), ख़तीब (प्रवचन देने वाले) और दूसरे सेवकों को वेतन दिए जाते. वही पैसा मस्जिद की मरम्मत और दूसरे कामों पर ख़र्च किया जाता था.

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शहज़ादी जो व्यापार भी करती थीं

जहां आरा को अपनी मां मुमताज़ महल और पिता शाहजहां की ओर से जायदाद में बड़ा हिस्सा दिया गया. इनमें नक़द रक़म के अलावा बाग़ों से होने वाली आमदनी भी शामिल थी.

माता-पिता की जायदाद में अपने भाई-बहनों में सबसे बड़ा हिस्सा उन्हें मिला था. मां की मौत के बाद जहां आरा ने अपने भाई बहनों की देखभाल की. लेकिन बाद में सत्ता के संघर्ष में भाइयों में विवाद पैदा हो गया.

इतिहास के विवरणों के अनुसार जहां आरा बड़े भाई दारा शिकोह के समर्थन में थीं, जबकि औरंगज़ेब ताक़त के ज़ोर पर सत्ता पर क़ाबिज़ हो गए थे. इसे लेकर कई युद्ध भी हुए.

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गोर गठरी क्या है?

गोर गठरी पेशावर के अंदरूनी हिस्से में सबसे ऊंचे स्थान पर है. अली जान के अनुसार इस शब्द का अर्थ 'लड़ाकों की क़ब्र' है.

इस स्थान का इतिहास उतना ही पुराना है, जितना प्राचीन पेशावर का इतिहास है. यह शहर ईसा पूर्व से आबाद था और कुछ विशेषज्ञों के अनुसार पेशावर में सात हज़ार साल पहले की सभ्यता के पुरातात्विक अवशेष मिल चुके हैं.

गोर गठरी के बारे में अली जान ने बताया "यहां बौद्ध धर्म के पुरातात्विक अवशेष भी मिले हैं. इतिहास की किताबों से मालूम होता है कि यहां महात्मा बुद्ध का 'भिक्षा पात्र' भी रखा था."

बौद्ध धर्म के अलावा यहां प्राचीन हिंदू सभ्यता के भग्नावशेष भी मिले हैं. यहां विभिन्न सभ्यताओं के लोग आबाद रहे और मुग़ल दौर में इस जगह पर शासकों का विशेष ध्यान रहा.

अली जान ने बताया "मुग़ल सम्राट ज़हीरूद्दीन बाबर ने अपनी जीवनी 'बाबरनामा' में लिखा है- 17 नवंबर 1525 को मैंने यह सोच कर अपना क़ाफ़िला बढ़ाया कि हिंदुस्तान को फ़तह किया जाए."

अली जान के अनुसार पेशावर पहुंचने पर बाबर ने भी गोर गठरी का दौरा किया.

उन्होंने लिखा,"दुनिया में कहीं भी इबादत करने वालों के लिए इतनी अंधेरी और तंग चिल्लागाहें (साधना स्थल) नहीं होंगी जो यहां (गोर गठरी में) पाई जाती हैं. दरवाज़े से दाख़िल होने के बाद जब सीढ़ियों से एक या दो क़दम नीचे उतरते हैं तो आपको पहले झुक कर और फिर रेंग कर आगे बढ़ना पड़ता है. ''

'' यहां आप बिना किसी रोशनी के अंदर नहीं जा सकते. इसके अलावा ज़यारत (तीर्थ) के लिए आने वाले या इबादत करने वाले अक्सर लोग ऐसे देखे जा सकते हैं जिनके सिर और दाढ़ियों के बाल लंबे होते हैं."

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इमेज कैप्शन, गोर गठरी के अंदर जाने के दो बड़े दरवाज़े हैं

गोर गोठरी और गोरखनाथ का रिश्ता

ऐतिहासिक विवरण में यह भी बताया गया है कि गोरखनाथ नामक एक हिंदू वैद्य इस स्थान पर बैठते थे, जिनके पास इलाज के लिए दूर-दूर से लोग आते थे.

यहां एक मंदिर भी गोरखनाथ के नाम से स्थापित था. कुछ स्थानीय चर्चाओं के अनुसार गोर गठरी का नाम वैद्य गोरखनाथ की वजह से पड़ा.

गोर गठरी के अंदर जाने के दो बड़े दरवाज़े हैं.

अब्दुस समद ने बताया "उन दरवाज़ों के कारण जहां आरा की सराय को 'सराय दो दर' भी कहा जाता है. इस इलाक़े में जब रणजीत सिंह का दौर आया तो उन्होंने भी शहर की व्यवस्था चलाने के लिए इसी जगह को चुना और यहां म्युनिसिपल दफ़्तर बनाए गए."

इसके अलावा शहर का व्यवस्थापक भी उसी जगह बैठता था. यह गेट बहुत ऊंचा है. गेट के ऊपर कमरे थे जहां ठहरा जा सकता था.

यहां मौजूद सराय के कमरे काफी अच्छे हैं. एक क्रम से चारों ओर फैले ये कमरे एक ख़ूबसूरत नज़ारा पेश करते हैं. बीच में मंदिर है जहां बड़े पेड़ और बाग़ भी हैं.

ब्रिटिश काल में यहां तहसील कमेटी के दफ़्तर और फ़ायर ब्रिगेड केंद्र बनाए गए थे. फ़ायर ब्रिगेड की गाड़ियां आज भी यहां मौजूद हैं.

पाकिस्तान

सन 2000 के बाद यहां पर्यटन को बढ़ावा देने और पुरातत्व की सुरक्षा के लिए एक दस वर्षीय योजना शुरू की गई थी, जिसमें इन इमारतों और दूसरे पुरातात्विक भग्नावशेषों को सुरक्षित करना था.

सराय के उन कमरों को दुकानों में बदल दिया गया और यहां पारंपरिक हस्तकला और कारीगरी के हुनरमंद लोगों को आमंत्रित किया गया.

इसके अलावा यहां पुरातात्विक महत्व के कुछ स्थानों पर खुदाई की गई, जहां से विभिन्न ऐतिहासिक वस्तुएं भी मिलीं. इन सभी को गोर गठरी में स्थित एक छोटे अजायबघर में रखा गया है.

समय बीतने के साथ ये हुनरमंद लोग उन दुकानों से चले गए हैं. अब एक बार फिर ये कमरे या दुकानें टूट-फूट की शिकार हैं. यहां के कमरे एक बार फिर खंडहरों में बदलने लगे हैं. इसलिए इन इमारतों को सुरक्षित करने के लिए लगातार कोशिश करनी होगी.

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