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पाकिस्तान के वज़ीरिस्तान में चल रहा धरना 'ओलसी पासून' क्या है
- Author, अज़ीज़ुल्लाह ख़ान
- पदनाम, बीबीसी उर्दू
"हमारी आंखों के सामने ऐसी कितनी ही घटनाएं हुईं, आरिफ़ वज़ीर को मारा गया, हमारे गांव के एक युवा छात्र जमशेद को हथियारबंद लोगों ने अगवा कर लिया, पेट्रोल पंपों और पुलिस थानों पर हमले किए गए. वज़ीरिस्तान में बहुत बुरे हालात हैं और कोई सुरक्षा नहीं है."
अहमद हसन पिछले पांच दिनों से दक्षिण वज़ीरिस्तान में चल रहे 'ओलसी पासून' में बैठे हैं. उन्हीं की तरह वज़ीरिस्तान के दूसरे लोग भी बड़ी संख्या में इसमें शामिल हो रहे हैं और उनकी प्रमुख मांग है कि क्षेत्र में शांति स्थापित करायी जाए.
अहमद हसन वज़ीर ने दावा किया है कि जमशेद एक युवा छात्र हैं और उनके पिता एक व्यापारी हैं.
जमशेद अपने पिता की देखभाल करने के लिए आए थे तभी काले शीशों वाली एक कार में हथियारबंद लोग आए और जमशेद को बंदूक की नोक पर कार में बिठा कर ले गए. इस घटना को क़रीब डेढ़ महीना हो गया है, लेकिन जमशेद कहां हैं, इसका कोई पता नहीं है.
उन्होंने बताया कि इस तरह की कई घटनाएं यहां हो चुकी हैं. दक्षिण वज़ीरिस्तान में धरना क्यों हो रहा है और प्रदर्शनकारियों की क्या मांगें हैं? यह जानने से पहले ये समझना ज़रूरी है कि असल में 'ओलसी पासून' क्या है?
ओलसी पासून क्या है?
ओलसी पासून मूल रूप से एक पश्तो शब्द है जिसका अर्थ है 'सार्वजनिक जागरूकता'.
ख़ैबर पख़्तूनख़्वा में 'ओलसी पासून' का सिलसिला स्वात से उस समय शुरू हुआ था जब सरकार और तहरीक-ए-तालिबान संगठन की बातचीत के दौरान स्वात के मट्टा इलाक़े में हथियारबंद लोग घुस गए थे.
सोशल मीडिया पर कुछ ऐसे वीडियो सामने आए थे जिसमें टीटीपी के चरमपंथियों ने पुलिस और सुरक्षाकर्मियों को बंधक बना लिया था और एक डीएसपी घायल हो गए थे.
इस घटना के बाद अधिकारियों को तो बचा लिया गया था लेकिन स्वात के स्थानीय लोग नाराज़ हो गए थे. स्वात में लोग बड़ी संख्या में 'ओलसी पसून' नामक धरने के मंच पर जमा हुए और जिसमें सभी राजनीतिक दल भी शामिल थे.
लेकिन किसी भी राजनीतिक दल का कोई झंडा या निशान सामने नहीं लाया गया, जिसकी वजह से स्थानीय स्तर पर आंदोलन को आम नागरिकों का भी सहयोग मिला.
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उत्तरी वज़ीरिस्तान
याद रहे कि 'ओलसी पासून' धरना स्वात से अन्य क्षेत्रों में भी फैल गया लेकिन इस धरने का कोई भी केंद्रीय नेता नहीं है बल्कि यह स्थानीय स्तर पर विरोध का एक तरीक़ा है.
ओलसी पासून के तहत बाज़ौर, उत्तरी वज़ीरिस्तान, बन्नू के पास जानी खेल, लक्की मरवत और अब दक्षिण वज़ीरिस्तान में धरना जारी है. आंदोलन में शामिल लोगों ने ख़ैबर पख़्तूनख़्वा के शहरों में शांति स्थापित करने की मांग की है.
बीबीसी से बात करते हुए वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक अली अकबर ने बताया कि बुनियादी तौर पर 'ओलसी पासून' का सिलसिला तीन साल पहले शुरू हुआ था.
यह कुछ हद तक पश्तून संरक्षण आंदोलन (पीटीएम) की सफलता पर आधारित है, क्योंकि कबीलाई क्षेत्रों में पीटीएम मंच से जो समस्याएं उठाई गईं, उनकी तरफ न केवल तवज्जो दी गई बल्कि कुछ समस्याओं का समाधान भी किया गया.
उन्होंने कहा कि कुछ हद तक पीटीएम की सफलता को देखते हुए चरमपंथ प्रभावित इलाक़ों में 'ओलसी पासून' का सिलसिला शुरू किया गया.
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ओलसी पासून की सफलता
इसमें सभी राजनीतिक दलों और विभिन्न वर्गों के लोगों के संगठन शामिल हैं, लेकिन आंदोलन के दौरान किसी भी राजनीतिक दल की पहचान यानी झंडे, किसी भी प्रकार के रंग या नारे का उपयोग नहीं किया जाता है, जिसके कारण बड़ी संख्या में लोग इसमें शामिल हुए हैं.
पार्टी पॉलिटिक्स और राजनीति से ऊपर उठकर सभी लोगों ने एकजुट होकर आवाज़ उठाई है. स्वात में ओलसी पासून की सफलता इसका एक बड़ा उदाहरण है.
अली अकबर के मुताबिक़, दक्षिण वज़ीरिस्तान में चल रहा ओलसी पासून धरना भी उसी सिलसिले की एक कड़ी है और उनकी मुख्य मांग यह है कि ये लोग अपने क्षेत्र में शांति चाहते हैं.
वज़ीरिस्तान में चल रहे धरने में शामिल एक व्यक्ति ने बीबीसी को बताया कि वो क्षेत्र में फिर से किसी भी तरह के सशस्त्र जत्थे नहीं चाहते हैं. वो चाहते हैं कि देश में सभी लोग क़ानून और संविधान के तहत जीवन गुज़ारें और शांति से रहें.
वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक मुश्ताक़ यूसुफ़ज़ई का कहना है कि ओलसी पासून का एक उद्देश्य यह भी है कि इन इलाक़ों में किसी भी राजनीतिक दल या संगठन में चरमपंथियों का सामना करने की हिम्मत तक नहीं है.
"पूर्व में यह देखा गया है कि जिस संगठन या राजनीतिक दल ने चरमपंथियों का विरोध किया है, उस पर हमला किया गया है."
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ओलसी पासून धरना
दक्षिण वज़ीरिस्तान में राजनीतिक नेताओं और विभिन्न संगठनों सहित स्थानीय लोग पांच दिनों से धरने पर बैठे हैं.
इस धरने में 11 सदस्यीय समिति का गठन किया गया, जो सभी 11 दलों और संगठनों की प्रतिनिधि समिति है. इसमें जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम (एफ़) शामिल नहीं है. बाकी सभी पार्टियां एकजुट हैं.
मंगलवार को धरने में शामिल प्रदर्शनकारियों ने शहर के विभिन्न इलाक़ों की ओर जाने वाली सड़कों को हर तरह के यातायात के लिए बंद कर दिया था और कहा था कि जब तक उनकी मांगें पूरी नहीं होतीं, तब तक उनका विरोध जारी रहेगा.
उन्होंने कहा कि स्थानीय प्रशासन से उनकी बातचीत हुई है लेकिन अभी तक उन्हें टाला जा रहा है.
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प्रदर्शनकारियों की मांगें क्या हैं?
- क्षेत्र से सशस्त्र जत्थों को हटाना. पुलिस को शक्तियां, सुविधाएं और प्रशिक्षण का प्रावधान
- ज़रूरत पड़ने पर सेना और एफसी को तैनात करना.अंगूर अड्डे पर व्यापार की बाधाओं को दूर करना
- पाकिस्तानी आईडी कार्ड और अफ़ग़ान नागरिकता कार्ड धारकों को यात्रा करने की अनुमति हो
- वांछित व्यक्तियों की गिरफ्तारी के लिए क़ानून के अनुसार कार्यवाही
- काले शीशों वाली सरकारी और गैर सरकारी गाड़ियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई
- शांति समितियों, कौमी लश्कर या 2007 के समझौते जैसी व्यवस्थाओं को समाप्त करना
- प्रदर्शनकारियों का कहना है कि संविधान के तहत पूर्व फाटा (एफएटीए) अब बाकी पाकिस्तान की तरह है.
अशांति के ख़िलाफ़
जब स्थानीय नेताओं से पूछा गया कि क्या अधिकारी एक बार फिर स्थानीय लोगों से शांति समितियों या शांति सेनाओं की स्थापना करने के लिए कह रहे हैं, तो इन राजनीतिक नेताओं ने कहा कि ऐसी कोई बात नहीं है और न ही किसी ने कहा है कि शांति समितियां या अमन लश्कर फिर से स्थापित किए जाएं.
एक स्थानीय व्यवसायी उमर शाह कोटी ने कहा कि पश्तून बेल्ट में जो अशांति है उसके ख़िलाफ़ धरने तो हर जगह हो रहे हैं, लेकिन वज़ीरिस्तान में रंगदारी और अन्य गंभीर वारदातें भी हो रही हैं. क्षेत्र में व्यापार बर्बाद हो गया है और इस धरने में कहा गया है कि दक्षिण वज़ीरिस्तान सहित पूरे प्रांत में निश्चित तौर पर शांति स्थापित की जाए.
स्थानीय सूत्रों ने बताया कि जब से सरकार और तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के बीच बातचीत शुरू हुई थी, तब से इस इलाक़े में हथियारबंद लोग नज़र आने लगे थे. वो किन रास्तों से और कहां से आये इसका नहीं पता है उस दौरान उनकी गतिविधियां बढ़ने लगीं थीं.
स्थानीय लोगों ने बताया कि थानों पर हमलों के दौरान पुलिस इन चरमपंथियों का मुक़ाबला नहीं कर पाती थी और न ही उन अधिकारियों के पास अपनी रक्षा के लिए हथियार थे, जिसके कारण अक्सर इलाक़ों में पुलिस अधिकारियों ने या तो छुट्टी लेनी शुरू कर दी थी या थाने छोड़ने शुरू कर दिए थे.
आधिकारिक तौर पर इसकी पुष्टि नहीं की गई है, लेकिन पुलिस सूत्रों के अनुसार, सुरक्षा अधिकारियों पर कई बार हमले किए गए और कहा गया कि वे कोई प्रतिरोध न करें, नहीं तो उनके ख़िलाफ़ बड़ी कार्रवाई की जा सकती है.
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प्रशासन का क्या पक्ष है?
धरने में शामिल प्रदर्शनकारियों ने बताया कि प्रशासन के साथ उनकी वार्ता हुई है, लेकिन अब तक इसमें कोई प्रगति नहीं हुई है.
लोअर दक्षिण वज़ीरिस्तान के डिप्टी कमिश्नर नासिर ख़ान ने मंगलवार को स्थानीय पत्रकारों से बातचीत में कहा कि प्रशासन ने प्रदर्शनकारियों से बात की है, उन्हें सुना है. प्रदर्शनकारियों ने शांति स्थापना के अलावा अन्य मांगें भी रखी हैं.
डिप्टी कमिश्नर ने कहा कि वह भी क्षेत्र में शांति स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं और अधिकारी इस संबंध में दिन-रात प्रयास कर रहे हैं.
उन्होंने कहा कि प्रदर्शनकारियों की मांगों पर विचार किया जा रहा है और उम्मीद है कि बहुत जल्द बातचीत के ज़रिए समस्याओं को सुलझा लिया जाएगा.
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