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पाकिस्तान को आतंक के सवाल पर यूएन में सीधे घेरने से क्यों बचते रहे विदेश मंत्री जयशंकर
- Author, दीपक मंडल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने शुक्रवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने भाषण के दौरान रूस-यूक्रेन युद्ध से पैदा हालात को शांति से सुलझाने और भारत को सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता देने की मांग की. लेकिन जयशंकर के इस भाषण की ज़्यादा चर्चा आतंकवाद के सवाल पर बिना नाम लिए पाकिस्तान और चीन को उनकी कथित भूमिकाओं के लिए ज़िम्मेदार ठहराने की वजह से हो रही है.
जयशंकर ने चीन का नाम लिए बग़ैर उस पर संयुक्त राष्ट्र की प्रस्ताव संख्या 1267 की राजनीति करने का आरोप लगाया.
उन्होंने कहा, "संयुक्त राष्ट्र की प्रस्ताव संख्या 1267 का राजनीतिकरण करने वाले कभी-कभी आतंकवादियों का बचाव करने की हद तक चले जाते हैं. लेकिन वो अपने खतरे पर इसे करते हैं. विश्वास करें, ऐसा करके न तो वो अपने हितों को आगे बढ़ाते हैं न अपनी प्रतिष्ठा को."
यूएन का 1267 प्रस्ताव क्या है?
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने प्रस्ताव संख्या 1267 को 15 अक्टूबर 1999 को सर्वसम्मति से स्वीकार किया था. इस प्रस्ताव के तहत संयुक्त राष्ट्र का कोई भी सदस्य देश किसी आंतकवादी को ग्लोबल टेररिस्ट की लिस्ट में शामिल करने की मांग कर सकता है. लेकिन इस पर सुरक्षा परिषद की स्थायी समिति की मंजूरी ज़रूरी है. अगर सुरक्षा परिषद का कोई एक स्थायी सदस्य देश इस प्रस्ताव का वीटो करता है तो मांग नामंजूर हो जाएगी.
जयशंकर ने सीमा पार से आतंकवाद को बढ़ावा देने में पाकिस्तान की कथित भूमिका का भी ज़िक्र किया. उन्होंने कहा, "कोई भी बयानबाजी चाहे कितनी भी दिखावटी हो, ख़ून के धब्बों को छिपा नहीं सकती."
भारतीय विदेश मंत्री ने इस मंच से चीन और पाकिस्तान दोनों को 'चरमपंथ को बढ़ावा देने' की उनकी कथित भूमिका के लिए घेरा. हाल के कुछ महीनों में चीन ने पाकिस्तान से ऑपरेट कर रहे कई चरमपंथियों के ख़िलाफ़ प्रस्तावों पर रोक लगाने के लिए संयुक्त राष्ट्र में अपने विशेषाधिकार का इस्तेमाल किया है. भारत का इशारा इसी ओर था.
लेकिन भारतीय विदेश मंत्री ने अपने भाषण के दौरान सीधे तौर पर न तो पाकिस्तान और न ही चीन का नाम लिया. हालांकि आतंकवाद के मामले में पाकिस्तान की कथित भूमिका को लेकर संयुक्त राष्ट्र में भारत का अब तक का रुख़ काफ़ी आक्रामक रहा है.
जयशंकर के भाषण की ख़ास बातें
- संयुक्त राष्ट्र महासभा में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने 16 मिनट का बेहद कसा हुआ भाषण दिया.
- भाषण में जयशंकर ने रूस-यूक्रेन युद्ध से लेकर चरमपंथ और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भारत का पक्ष रखा.
- विदेश मंत्री ने इशारों-इशारों में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता की दावेदारी की.
- रूस के विदेश मंत्री ने भी अपने संयुक्त राष्ट्र में दिए गए भाषण में भारत को सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनाने की वकालत की.
- संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता बढ़ाने का समर्थन अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन भी कर चुके हैं.
क्या ये भारत की सोची-समझी रणनीति है?
इसके पहले पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान का सीधे तौर पर नाम लेकर उसे भारत में आतंकवाद को बढ़ावा देने का दोषी ठहराया था.
लेकिन मौजूदा विदेश मंत्री एस जयशंकर अपने पूरे भाषण में चीन और पाकिस्तान का नाम लेने से बचते रहे. क्या ये भारतीय विदेश नीति में किसी बदलाव का संकेत है या फिर पाकिस्तान को नज़रअंदाज करने की उसकी सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है? क्या भारतीय विदेश मंत्रालय में स्ट्रैटेजी तय करने वालों ने इस वक़्त पाकिस्तान को ज़्यादा तवज्जो न देने की पॉलिसी तय की है?
इस सवाल पर 'द प्रिंट' की डिप्लोमेसी एडिटर नयनिमा बासु बीबीसी से कहती हैं, "ये बात बिल्कुल सही है. भारतीय विदेश मंत्रालय में अभी यही माइंडसेट और स्ट्रैटेजी है कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय बहुपक्षीय फोरम में उसका नाम तक न लिया जाए. पाकिस्तान को अभी इतनी तवज्जो देनी ही नहीं है."
नयनिमा भारत की रणनीति की वजह भी बताती हैं.
वे कहती हैं, "भारत का एक और मक़सद है. वह चाहता है कि जब वो सीमा पार से आतंकवाद को बढ़ावा देने की बात रहा है तो अमेरिका और उस जैसे दुनिया के दूसरे ताक़तवर देशों को यह समझना चाहिए कि इशारा सीधा पाकिस्तान की ओर है. भारत बार-बार पाकिस्तान का नाम लेकर उसे अहमियत नहीं देना चाहता."
"पाकिस्तान से बात करनी ही होगी"
सवाल ये भी है कि आख़िर पाकिस्तान को तवज्जो न देने की अपनी रणनीति पर भारत कहां तक कायम रह सकता है?
नयनिमा कहती हैं, "मेरी राय में ये स्ट्रैटेजी ज़्यादा वक़्त तक नहीं चल सकती. क्योंकि पाकिस्तान, भारत का अहम पड़ोसी देश है. यूएन में भारत दशकों से सीमा पार से आतंकवाद को बढ़ावा देने की बात करता रहा है. लेकिन अगर वो चाहता है कि अंतररराष्ट्रीय समुदाय इस मुद्दे पर कार्रवाई करे और इसे गंभीरता से ले तो उसे पाकिस्तान से बातचीत करनी ही होगी."
आखिर पाकिस्तान में किससे बात की जाए. क्या वहां की राजनीतिक अस्थिरता को देखते हुए ऐसा करना संभव है?
नयनिमा कहती हैं, "पाकिस्तान में भले ही राजनीतिक अस्थिरता हो लेकिन वहां की सरकार से भारत को बात करनी ही होगी. वहां सेना काफ़ी ताक़तवर है. बात नहीं करेंगे तो आपको कुछ पता नहीं चलेगा. जब आप कहते हैं कि कश्मीर द्विपक्षीय मामला है तो फिर बातचीत करने में क्या दिक्कत है?"
पाकिस्तान की स्थिति
ऐसे वक़्त में जब अफ़ग़ानिस्तान में हालात बहुत अच्छे नहीं है और चीन से भी रिश्ते अच्छे नहीं चल रहे हैं तब भारत के लिए पाकिस्तान को नज़रअंदाज करना कितना मुफ़ीद है?
क्या भारत की ओर से पाकिस्तान को तवज्जो न देना उचित रणनीति है.
इस सवाल के जवाब में 'इंडिपेंडेंट उर्दू' के संपादक हारुन रशीद ने कहा, "देखिए पाकिस्तान में भी ऐसे हालात नहीं हैं कि भारत के बारे में बहुत ज़्यादा बात हो रही है. भारत में लोगों को लग सकता है कि पाकिस्तान को कड़ा संदेश दिया गया है लेकिन पाकिस्तान में इस वक़्त अंतरराष्ट्रीय मामलों, ख़ास कर भारत के बारे में न तो सिविल सोसाइटी में बात हो रही है और न ही राजनेताओं के बीच."
रशीद कहते हैं, "पाकिस्तान की ओर से इस वक़्त न तो कश्मीर में चरमपंथ को बढ़ावा मिल रहा है और न वह अभी इस हालत में है कि ऐसा कर सके. पाकिस्तान में घरेलू राजनीति की दिक्कतें ही काफी ज़्यादा बढ़ी हुई हैं. अगले साल चुनाव होने हैं. देश की आर्थिक स्थिति काफी ख़राब है और बाढ़ से हालात नाजुक हो गए हैं. इसके अलावा पाकिस्तान टेरर फंडिंग के मामले में अभी भी ग्रे लिस्ट में है. इसलिए भी वह जोखिम नहीं ले सकता."
तो क्या भारत का यूएन में पाकिस्तान का नाम न लेना एक सोची-समझी रणनीति है?
रशीद कहते हैं, ''भारतीय विदेश मंत्री ने पाकिस्तान का सीधे नाम लिए बगैर आतंकवाद पर बयान देकर अपने देश में लोगों को बता दिया कि उन्होंने एक पड़ोसी देश को चेतावनी दे दी है. यह दोहरा खेल है, उन्होंने बिना नाम लिए आतंकवाद पर बयान देकर पाकिस्तान की ओर से आने वाली कड़ी प्रतिक्रिया भी रोक ली और अपने लोगों को यह भी दिखा दिया कि हम उसका नाम लेकर उसे तवज्जो भी नहीं देना चाहते. यह एक तीर से दो शिकार है,''
क्या पाकिस्तान को कोई गंभीरता से नहीं लेता?
पूर्व राजनयिक और विदेश मामलों की टिप्पणीकार भास्वती मुखर्जी भारत के इस रुख को सही ठहराती हैं.
उनका कहना है, "कइयों की राय है कि इस समय पाकिस्तान की स्थिति ऐसी है कि दुनिया में कोई भी उसे गंभीरता से नहीं लेता. ये एक दिवालिया देश है. आतंकवाद की फंडिंग करता है. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ख़ुद कहते हैं कि उनके देश के मित्र राष्ट्रों ने भी उसका साथ छोड़ दिया है क्योंकि वो हर जगह उनसे मदद मांगने पहुंच जाता है. क्या भारत ऐसे देश को गंभीरता से ले सकता है. अब तो लोगों का कहना है कि क्या ज़रूरत है ऐसे देश को जवाब देने की. उसे इग्नोर करो."
भास्वती मुखर्जी कहती हैं, "पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लगातार झूठ बोलता रहा है. उसकी आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई प्रतिष्ठा नहीं है. पाकिस्तान भारत से कोई मदद नहीं चाहता है. वहां के नेता भारत से कारोबार नहीं करना चाहते. वो विकास में पैसा लगाने के बजाय सेना पर खर्च करना चाहता है. पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री जुल्फिकार भुट्टो ने कहा था कि उनका देश भले ही घास खाएगा लेकिन वो परमाणु बम बना कर रहेगा.''
वे कहती हैं, "ये तो पाकिस्तान का हाल है. उसके झूठ और अनाप-शनाप बोलने की वजह से ही हमने उनको जवाब देने की अपनी रणनीति तय की है. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री जब बोलते हैं तब भारत का सबसे जूनियर अफसर इसका जवाब देता है."
भास्वती कहती हैं, "पाकिस्तान के झूठ की वजह से ही वहां के पीएम के स्तर पर दिए गए बयान का जवाब भी भारत यूएन में अपने परमानेंट मिशन के सबसे जूनियर अफसर के ज़रिए देता है. जब मैं 1986-89 में दौरान न्यूयॉर्क में यूएन के परमानेंट मिशन में थी तो बतौर सबसे जूनियर अफसर मैंने पाकिस्तान के पीएम के बयान का जवाब दिया था. हम यह दिखाना चाहते हैं कि उनकी झूठी बातों पर हमारा क्या रुख़ है."
भास्वती कहती हैं कि पाकिस्तान अपनी प्रतिष्ठा खो चुका है और ऐसे में उसे तवज्जो न देना सही रणनीति है.
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