नेपाल में निलंबित मुख्य न्यायाधीश का मामला बढ़ा रहा है सियासी सिरदर्द

नेपाल के मुख्य न्यायाधीश का आवास
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    • Author, टीम बीबीसी नेपाली
    • पदनाम, काठमांडू

नेपाल में निलंबित मुख्य न्यायाधीश का मामला इस समय सियासी सुर्ख़ियाँ बटोर रहा है. क्या सत्ताधारी दल, क्या विपक्ष और क्या विशेषज्ञ- सबकी राय इस मामले पर बँटी हुई है.

नेपाल में संविधान और क़ानून के विशेषज्ञों ने कहा है कि निलंबित मुख्य न्यायाधीश चोलेंद्र शमशेर जंग बहादुर राणा के सुप्रीम कोर्ट में अपने काम पर लौटने की कोशिश से पैदा हुए संकट के लिए "उपयुक्त समाधान खोजा जाना चाहिए."

इन विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि मौजूदा संकट के समाधान के लिए सरकार और नेपाल बार एसोसिएशन को क़दम उठाने चाहिए.

पिछले साल फ़रवरी में नेपाल की संसद में महाभियोग प्रस्ताव आने के बाद जंग बहादुर राणा को निलंबित कर दिया गया था.

शनिवार को वर्तमान संसद का कार्यकाल समाप्त हुआ है और इसी दिन संसद की महाभियोग सिफ़ारिश समिति ने उनके ख़िलाफ़ महाभियोग की सिफ़ारिश की.

फ़िलहाल महाभियोग को पारित करने के लिए संसद की बैठक नहीं हो सकती, ऐसे में जंग बहादुर राणा ने रविवार को सुप्रीम कोर्ट में अपनी ड्यूटी पर लौटने की तैयारी की थी.

लेकिन सरकार ने उनके प्रयासों को रोकने के लिए सर्वोच्च न्यायालय और उनके आवास पर भारी सुरक्षा बलों को तैनात किया.

मानवाधिकार आयोग

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मानवाधिकार आयोग का बयान

चोलेंद्र शमशेर जंग बहादुर राणा ने इसके बाद कहा था कि उन्हें नज़रबंद रखा जा रहा है.

उसके बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी जंग बहादुर राणा के आवास पर जाकर घटना की जानकारी ली.

आयोग ने उसके बाद एक बयान के माध्यम से कहा कि यह देश की ज़िम्मेदारी होगी कि वह संवैधानिक रूप से दी गई व्यक्तिगत स्वतंत्रता, कहीं आने-जाने की स्वतंत्रता और किसी भी व्यक्ति के निजता के अधिकार का सम्मान करे.

आयोग ने कहा, "आयोग का दृढ़ता से मानता है कि इस तरह के अधिकारों को किसी भी बहाने से बाधित नहीं किया जाना चाहिए. इसलिए यह आयोग से संबंधित सभी पक्षों से संविधान और क़ानून के आधार पर इस तरह के गतिरोध को समाप्त करने का आग्रह करता है."

निलंबन जारी रहना चाहिए या नहीं, इस बारे में विशेषज्ञों की राय अलग-अलग है. यह राय अलग-अलग इसलिए भी है क्योंकि मौजूदा संसद का कार्यकाल समाप्त हो गया है.

कुछ लोग कह रहे हैं कि जंग बहादुर राणा का निलंबन जारी है क्योंकि मौजूदा संसद ने जो प्रक्रिया शुरू की है, उस पर चुनाव के बाद बनने वाली संसद फ़ैसला लेगी.

हालांकि कई अन्य लोगों के अनुसार, संवैधानिक रूप से पिछली प्रतिनिधि सभा का ऐसा प्रस्ताव चुनाव के बाद बनने वाली प्रतिनिधि सभा में स्थानांतरित नहीं होता है.

नेपाल की संसद

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तर्क

जंग बहादुर राणा पर महाभियोग चलाने की वकालत करने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता पूर्णमन शाक्य ने कहा, "जब महाभियोग सिफ़ारिश समिति ने संसद में रिपोर्ट दे दी है तो अगली संसद का इस रिपोर्ट पर अधिकार रहेगा."

इसलिए शाक्य का तर्क है कि उनका निलंबन जारी है और वह अपनी नौकरी पर वापस नहीं आ सकते हैं.

लेकिन संवैधानिक क़ानून के एक अन्य विशेषज्ञ, बिपिन अधिकारी का कहना है कि नई संसद के लिए "सामान्य महाभियोग समिति की सिफ़ारिश के आधार पर इसे स्वीकार करने के लिए कोई क़ानूनी आधार और संवैधानिक प्रावधान मौजूद नहीं है.

उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि महाभियोग पर कोई अलग क़ानून नहीं है और प्रतिनिधि सभा के नियमों में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है.

पूर्व महान्यायवादी रमेश बडाल का भी मानना है कि मौजूदा संसद की ओर से चलाई जा रही प्रक्रिया को नई संसद से जोड़ने का कोई आधार नहीं है.

वहीं पूर्व न्यायाधीश, बलराम केसी का कहना है कि भले ही जंग बहादुर राणा के ख़िलाफ़ आरोपों की पुष्टि नहीं हुई हो, उन्हें काम पर लौटने की कोशिश नहीं करनी चाहिए क्योंकि संसदीय समिति ने नौ आरोप लगाए हैं.

उन्होंने कहा, "संसद ने उन्हें स्पष्टीकरण नहीं दिया है. नौ-नौ आरोप लगाए गए हैं, इसलिए संसद सत्र समाप्त हो गया है तो भी वे आरोप जारी रहेंगे."

सर्वोच्च अदालत

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बलराम केसी ने बताया, "उन पर लगाए गए आरोपों के चलते माना गया है कि उन पर महाभियोग चलाया जा सकता है. उन्हें सर्वोच्च अदालत नहीं जाना चाहिए क्योंकि उन्होंने अपने साथी न्यायाधीशों, वकीलों और नेपाली लोगों का विश्वास खो दिया है."

बलराम केसी के मुताबिक़, चोलेंद्र शमशेर जंग बहादुर राणा के लिए सर्वोच्च न्यायालय में लौटने की मांग करना उचित नहीं है क्योंकि पद जितना बड़ा होता है, ज़िम्मेदारी उतनी ही अधिक होती है.

हालांकि, उनकी राय है कि तत्काल समाधान मांगा जाना चाहिए क्योंकि इस मामले ने नेपाल के संविधान और न्यायिक प्रणाली को कमज़ोर कर दिया है.

चोलेंद्र शमशेर जंग बहादुर राणा

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क्या हो सकता है समाधान

संवैधानिक क़ानून के जानकारों के मुताबिक़, मौजूदा स्थिति को सुलझाने में सरकार, बार एसोसिएशन या स्पीकर की भूमिका हो सकती है.

विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार या फिर बार एसोसिएशन कुछ उपायों पर विचार कर सकते हैं. कुछ का कहना है कि जंग बहादुर राणा और सरकार के लिए यह उचित होगा कि मध्यस्थ के ज़रिए समाधान निकाला जाए. हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि हाल की गतिविधियों से ऐसी संभावना कम है.

ऐसे में पूर्व न्यायाधीश बलराम केसी तीन तरीक़े सुझा रहे हैं.

पहला तरीका - सरकार यह सुनिश्चित करने के लिए अध्यादेश के माध्यम से एक क़ानून पेश करेगी कि एक व्यक्ति जिसे संसदीय प्रक्रिया से निलंबित कर दिया गया है, वह काम पर नहीं लौट सकता है.

दूसरा तरीक़ा - बार एसोसिएशन इस मामले में अपील करके स्पष्टीकरण मांग सकता है.

तीसरा तरीक़ा - जंग बहादुर राणा निलंबित रह कर अदालत में मौजूद न रहते हुए अपना कार्यकाल पूरा कर सकते हैं.

हालांकि बलराम केसी यह भी मानते हैं कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में अध्यादेश लाना उचित नहीं है, लेकिन चूंकि संसद के कार्यकाल के दौरान कई अध्यादेश लाया जा चुका है, इसलिए इस विशेष स्थिति को हल करने के लिए एक अध्यादेश लाया जा सकता है.

अग्नि प्रसाद सापकोटा

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संवैधानिक क़ानून के एक अन्य विशेषज्ञ बिपिन अधिकारी की दृष्टि में अध्यादेश लाना उचित नहीं है. उन्होंने कहा, "अगर किसी व्यक्ति को रोकने के लिए अध्यादेश लाया जाता है तो देश की न्याय प्रणाली की स्थिति क्या होगी?"

बिपिन अधिकारी के मुताबिक़, चोलेंद्र शमशेर जंग बहादुर राणा सुप्रीम कोर्ट में लौटेंगे या नहीं, यह तय करने में संसद के स्पीकर की भूमिका अहम होगी.

उनका कहना है कि मौजूदा हालात इसलिए पैदा हुए हैं क्योंकि पार्टियों और संसद ने समय पर फ़ैसला नहीं दिया.

अधिकारी के मुताबिक़ संकट का एक ही समाधान हो सकता है. वे कहते हैं, "ससंद सचिवालय चोलेंद्र पर से निलंबन हटा सकता है और वे सुप्रीम कोर्ट में अपनी ड्यूटी पर लौट सकते हैं. अगली संसद, इस संसद की रिपोर्ट का संज्ञान नहीं लेगी, जो काम अभी आधा ही हुआ है, उसका संज्ञान क्यों लेगी?"

अधिकारी यह भी बताते हैं कि अगली संसद के गठन तक चोलेंद्र का कार्यकाल पूरा हो जाएगा, इसलिए संसद के स्पीकर की भूमिका अहम हो जाती है.

उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि जंग बहादुर राणा निलंबन ख़त्म हुए बिना काम पर नहीं लौट सकते. हालांकि वे यह भी मानते हैं कि किसी के कहीं आने-जाने पर पाबंदी भी उस शख्स के मौलिक अधिकार का हनन है.

निलंबित मुख्य न्यायाधीश चोलेंद्र शमशेर जंग बहादुर राणा

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सरकार का क्या कहना है?

जंग बहादुर राणा ने जब ख़ुद के नज़रबंद किए जाने की बात कही तो नेपाल के क़ानून मंत्री गोबिंद प्रसाद शर्मा कोइराला ने रविवार को बीबीसी की नेपाली सेवा से कहा, "उन्हें सुरक्षा दी गई है, उन्हें नज़रबंद नहीं रखा गया है."

उन्होंने यह भी कहा, "जब तक महाभियोग का संवैधानिक रूप से निपटारा नहीं हो जाता, जंग बहादुर राणा सुप्रीम कोर्ट में वापस नहीं आ सकते."

जंग बहादुर राणा का कहना है कि ''चूँकि संसद का कार्यकाल पूरा हो चुका है, लिहाज़ा यह महाभियोग भी ख़त्म हो गया है.'' इस तर्क पर कोइराला ने कहा, "भले ही इस संसद का कार्यकाल समाप्त हो गया हो, नई संसद महाभियोग का स्वामित्व लेगी और इस पर चर्चा होगी."

हालांकि, विपक्षी दल सीपीएन-यूएमएल के नेता केपी शर्मा ओली ने रविवार को मीडिया से बात करते हुए कहा कि जंग बहादुर राणा के ख़िलाफ़ महाभियोग का कोई मतलब नहीं है क्योंकि यह पंजीकृत और पारित नहीं हुआ था.

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