पाकिस्तान का राष्ट्रगान दोबारा क्यों रिकॉर्ड किया गया?

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- Author, मुनीज़ा अनवार और मोहम्मद सुहैब
- पदनाम, बीबीसी उर्दू, इस्लामाबाद
पाकिस्तान के 76वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर दोबारा रिकॉर्ड किया गया राष्ट्रगान रिलीज़ कर दिया गया है. यह राष्ट्रगान 13 महीने में रिकॉर्ड किया गया है और इस बार इसे 155 गायकों ने गाया है.
पाकिस्तान के राष्ट्रगान को पहली बार 13 अगस्त 1954 को रेडियो पाकिस्तान पर प्रसारित किया गया था जिसके बोल हफ़ीज़ जालंधरी ने लिखे थे और धुन अहमद ग़ुलाम अली छागला ने तैयार की थी.
अब साल 2022 में दोबारा रिकॉर्ड किए गए राष्ट्रगान की ख़ास बात यह है कि 68 साल पहले पहली बार रिकॉर्ड की गई धुन और राष्ट्रगान के बोल में कोई बदलाव नहीं किया गया है और न ही वाद्ययंत्रों (म्यूज़िकल इंस्ट्रूमेंट्स) में कोई बदलाव किया गया है. हालांकि, इसमें अब पाकिस्तान में मौजूद सभी समुदायों और संगीत की सभी शैलियों के गायकों को जगह दी गई है और भाषाई, सांस्कृतिक, धार्मिक और लैंगिक विविधता पर विशेष ध्यान दिया गया है.
इसके अलावा इसे रिकॉर्ड करने के लिए नई टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया गया है.
इस धुन को दोबारा रिकॉर्ड करने के लिए जून 2021 में पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ की सरकार कि तरफ़ से एक स्टीयरिंग कमेटी का गठन किया गया था जिसके अध्यक्ष पूर्व सीनेटर जावेद जब्बार थे.
इस कमेटी के सदस्यों में प्रसिद्ध संगीतकार रूहैल हयात, अरशद महमूद, उस्ताद नफ़ीस अहमद, आईएसपीआर के डायरेक्टर (प्रोडक्शन) ब्रिगेडियर इमरान नक़वी और फ़िल्म उद्योग से जुड़े सतीश आनंद शामिल थे.
बीबीसी ने राष्ट्रगान की धुन और बोल दोबारा रिकॉर्ड कराने वाले इस प्रोजेक्ट में शामिल संगीतकारों और गायकों से बात करके यह जानने की कोशिश की है कि राष्ट्रगान को दोबारा रिकॉर्ड करने की ज़रूरत क्यों पड़ी, यह पुराने राष्ट्रगान से कैसे अलग है और उनके इस प्रोजेक्ट पर काम करने के अनुभव कैसे रहे. इसके अलावा, हमने अतीत के झरोखों में झांकते हुए पुराने राष्ट्रगान की धुन और इसके बोल तैयार करने के चरण पर भी एक नज़र डाली है.
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'नया रिकॉर्ड किया गया राष्ट्रगान एक तोहफ़ा'

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स्टीयरिंग कमेटी के अध्यक्ष जावेद जब्बार ने बीबीसी उर्दू से बात करते हुए कहा, "इस प्रोजेक्ट के जिस पहलू ने मुझे सबसे ज़्यादा प्रभावित किया, वह ये था कि इसमें भागीदारी के आधार पर न केवल विविध समाज के सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना था, बल्कि संगीत की सभी शैलियों को ध्यान में रखते हुए आवाज़ों को शामिल करना भी ज़रूरी था."
इसके लिए कमेटी ने प्रमुख समाचार पत्रों में विज्ञापन दिए जिसके बाद चयनित गायकों की ट्रेनिंग का काम शुरू हुआ.
जावेद जब्बार बताते हैं कि "साल 1954 में जब राष्ट्रगान रिकॉर्ड किया गया था तो उस समय इसे 10 गायकों ने गाया था, लेकिन 68 वर्षों में पाकिस्तान में एक विविधतापूर्ण समाज बन गया है और साथ ही संगीत रिकॉर्ड करने के तरीक़े में भी आधुनिकता आई है."
रेडियो पाकिस्तान के रिकॉर्ड के अनुसार, उस समय राष्ट्रगान गाने वाले गायकों में अहमद रुश्दी, ज़वार हुसैन, अख़्तर अब्बास, ग़ुलाम दस्तगीर, अनवर ज़हीर, अख़्तर वसी अली, नसीमा शाहीन, रशीदा बेगम, नज़्म आरा, कोकब जहां और शमीम बानो शामिल थे.

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जावेद जब्बार ने बताया कि जब अप्रैल में तहरीक-ए-इंसाफ़ की सरकार गिर गई तो उन्होंने नई सरकार को अपना इस्तीफ़ा सौंप दिया, लेकिन नई सरकार ने उनसे इस प्रोजेक्ट को जारी रखने का अनुरोध किया.
उन्होंने कहा कि क्योंकि दुनिया के अन्य देशों कि तरह पाकिस्तान में कोई स्टैंडिंग आर्केस्ट्रा नहीं है, इसलिए हमें पाकिस्तान आर्मी, एयरफ़ोर्स और नेवी के बैंड्स की मदद लेनी पड़ी.
वो कहते हैं, "पाकिस्तान के 76वें स्थापना दिवस पर रिकॉर्ड किया गया नया राष्ट्रगान एक उपहार भी है और इस महत्वपूर्ण अवसर पर जश्न मनाने का एक शानदार ज़रिया भी है."
रिकॉर्डिंग में जिन बातों का ध्यान रखा गया
जावेद जब्बार ने राष्ट्रगान को दोबारा रिकॉर्ड करने के चरणों के बारे में विस्तार से बताते हुए कहा कि रिकॉर्डिंग से पहले सभी 155 गायकों से रिहर्सल कराई गई और तैयारी में उनकी मदद की गई.
"इस बात का भी विशेष ध्यान रखा गया कि धुन को उसी तरह से और उन्हीं वाद्ययंत्रों की मदद से बजाया जाए जिस तरह से अहमद ग़ुलाम अली छागला ने कंपोज़ किया था. शब्दों के उच्चारण का भी ख़ास ध्यान रखा गया है."
राष्ट्रगान को रिकॉर्ड करने के लिए आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया गया जिससे विभिन्न ट्रैक्स को रिकॉर्ड करने के बाद उन्हें मिक्स करने में मदद मिली.
इसके अलावा नेशनल एकेडमी ऑफ़ परफ़ॉर्मिंग आर्ट्स से 30 गायकों के एक समूह को भी ट्रेनिंग दी गई और वे भी इस राष्ट्रगान का हिस्सा बने.

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इस्लामाबाद के प्रसिद्ध गायक उमैर जसवाल भी उन गायकों में शामिल हैं जिन्होंने मिलकर नया राष्ट्रगान गाया है. बीबीसी से बात करते हुए उमैर ने कहा कि देश भर से इतने प्रतिभाशाली संगीतकारों और गायकों के इतनी विविधता वाले ग्रुप के साथ काम करने और राष्ट्रगान को रिकॉर्ड करने का अनुभव बहुत ही शानदार रहा.
उनका कहना है कि ''ऐसे कई संगीतकार हैं जिनका मैंने नाम सुन रखा था और उन्हें बस दूर-दूर से ही सुना था... लेकिन इस नए राष्ट्रगान की बदौलत मुझे न केवल उन सभी से मिलने का मौक़ा मिला, बल्कि हमने साथ मिलकर अपने देश के लिए एक नए राष्ट्रगान पर काम किया.''
उमैर का कहना है कि इस राष्ट्रगान की रिकॉर्डिंग के दौरान सभागार में जो माहौल था, उसमे हर गायक, हर संगीतकार ने देश के लिए अपने प्यार को महसूस किया. "रुहैल हयात ने यह सुनिश्चित किया कि हम सभी राष्ट्रगान के लिए एक ही जैसा ख़ास जज़्बा महसूस करें. शायद इसीलिए उन्हें जादुई संगीतकार कहा जाता है क्योंकि बस वो ही इसे संभव बना सकते थे."
उन्होंने कहा कि सबसे दिलचस्प बात यह है कि कई संगीतकार ऐसे भी थे जो इस राष्ट्रगान का हिस्सा तो नहीं थे, लेकिन फिर भी वे सिर्फ़ यह देखने आते थे कि राष्ट्रगान कैसा बन रहा है. उनका कहना है कि इस राष्ट्रगान का हिस्सा बनना इतना दिल को छू लेने वाला अनुभव था कि वो इसे जीवन भर नहीं भूल सकेंगे.
'डी-ट्यून' हो गया था पुराना राष्ट्रगान

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उमैर जसवाल बताते हैं, ''पुराने राष्ट्रगान से उन्हें हमेशा एक ख़ास लगाव रहा है, लेकिन दुर्भाग्य से, चूंकि इसे टेप पर रिकॉर्ड किया गया था और बाद में जब इसे डिजिटल में कन्वर्ट किया गया, तो इस प्रक्रिया के दौरान यह 'डी-ट्यून' भी हो गया था यानी इसकी धुन बदल गई थी और मेरे जैसे किसी भी संगीतकार के लिए, यह बहुत ही महत्वपूर्ण है कि आप कुछ सुन रहे हैं और अगर वह डी-ट्यून है, तो बतौर संगीतकार यह आपको परेशान करता है क्योंकि आपको समझ में आ जाता है कि इसमें क्या ग़लत है."
हालांकि, उनका कहना है कि ''अपने समय के हिसाब से यह एक बहुत ही ख़ूबसूरत राष्ट्रगान था और इसने भावनाओं को बहुत अच्छी तरह से दर्शाया था. लेकिन हम चाहते थे कि इसका एक नया वर्ज़न हो. और जब हम नए वर्ज़न के बारे में बात करते हैं, तो इससे हमारा मतलब राष्ट्रगान का एक बेहतर तरीक़े से रिकॉर्ड किया गया वर्ज़न है जो आज के समय के लिए प्रासंगिक है और इस समय की फ्रीक्वेंसी को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है."
नये राष्ट्रगान को नई पीढ़ी और भविष्य को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है, लेकिन इसकी मूल भावना वही है
उमैर जसवाल इसे सरकार की ओर से उठाया गया बेहद अहम क़दम बताते हैं. वो कहते हैं कि नई पीढ़ी को इस राष्ट्रगान से जोड़ने के लिए भी यह बहुत ज़रूरी था, "जब मैंने कई युवा गायकों को यह नया राष्ट्रगान गाते हुए सुना, तो मुझे महसूस हुआ कि जब वे इसे गाते हैं, तो उन्हें भी इस देश से वैसा ही मज़बूत रिश्ता महसूस होता है."
उनका मानना है कि "इस राष्ट्रगान को सुनकर बाक़ी लोगों की भी भावनाएं वैसी ही होंगी जैसी हमने उस कमरे में इसे रिकॉर्ड करते हुए महसूस की थीं."
उमैर का कहना है कि ''इस नए राष्ट्रगान को सुनते हुए भी आपको देश के लिए उसी प्यार, जोश और उम्मीद का एहसास होगा जो आप पुराने राष्ट्रगान को सुनते समय महसूस करते थे. फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि इसे अलग तरह से रिकॉर्ड किया गया है, इस राष्ट्रगान में संगीत वाद्ययंत्रों का अलग तरह से इस्तेमाल किया गया है और इसे जिस तरह से नई पीढ़ी और भविष्य को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है, ये चीज़ें इसे पुराने राष्ट्रगान से अलग बनाती हैं.''
उनका कहना है कि इस नए राष्ट्रगान को सुनकर एक ताज़गी का एहसास होगा, लेकिन इसका जज़्बा वही रहेगा और इसे कोई बदल नहीं सकता.
"मेरा मानना है कि इसे दोबारा से रिकॉर्ड करने से इसका हाई क्वालिटी वाला वर्ज़न मिल गया है और सबसे महत्वपूर्ण और सुंदर बात यह है कि देश भर के संगीतकारों और गायकों के एक बहुत ही विविधतापूर्ण समूह ने इस पर एक साथ मिलकर काम किया है."
उमैर का यह भी मानना है कि 150 से अधिक संगीतकारों द्वारा मिलकर राष्ट्रगान गाने से इसे एक नए तरह की 'फ़ील' मिली है. उनका कहना है कि इस राष्ट्रगान का उद्देश्य देश के सभी वर्गों और क्षेत्रों का बड़े पैमाने पर प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना था. और यह इतनी सुंदर अवधारणा है कि इससे एक बहुत ही सकारात्मक संदेश जाता है.
रिकॉर्डिंग के वक़्त का मंज़र

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ऐतिहासिक रूप से इस तरह के महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट का हिस्सा बनने के बारे में उमैर कहते हैं, ''मैं इस एहसास को शब्दों में बयान नहीं कर सकता. उस कमरे में सभी के साथ नए राष्ट्रगान को रिकॉर्ड करते हुए महसूस की गई भावनाओं के साथ शब्द न्याय नहीं कर सकते.''
उनका कहना है कि ''हम में से किसी की आंखों में आंसू थे तो किसी के चेहरे पर मुस्कान... जबकि कुछ दिल खोलकर हंस रहे थे... उस कमरे में हर तरह के जज़्बात दिख रहे थे..."
उमैर का कहना है कि दुनिया के दूसरे देशों से विपरीत हमारा राष्ट्रगान भावनाओं से भरा हुआ है. यह इतनी सुंदर कंपोज़ीशन है कि इसमें भाव और नोट्स ऊपर-नीचे चलते हैं... और "युवा संगीतकारों और गायकों के तौर पर बड़े होते हुए, हमने अपने देश को बहुत से संकटों में घिरा, और अँधेरे से गुज़रते हुए देखा है... हमें बहुत मुश्किल से देश में कोई अच्छा समय याद आता है... लेकिन यह एक ऐसी चीज़ है जो हमें उम्मीद दिलाती है और चारों प्रांतों के लोगों को एक साथ लाकर जोड़ती है."
वो कहते हैं कि "मैंने ख़ुद को एक बहुत ही स्पेशल चीज़ का हिस्सा समझा जिसके लिए मैं बहुत शुक्रगुज़ार हूं.'' उमैर को उस समय का इंतज़ार है, जब उनके बच्चे और उनके साथी युवा पीछे मुड़कर इतिहास में देखेंगे और इस राष्ट्रगान में उनकी आवाज़ को पहचानेंगे.
वे कहते हैं, "उस समय मेरे चेहरे पर एक असली मुस्कान होगी,"
कहानी नई रिकॉर्डिंग की

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अपने अनुभव के बारे में बात करते हुए, एक मशहूर रैपर और पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत के रहने वाले आबिद ब्रोही ने बीबीसी से बात करते हुए कहा, "इस ऐतिहासिक रिकॉर्डिंग का हिस्सा बनना मेरे लिए सम्मान की बात है. राष्ट्रगान की दोबारा की गई रिकॉर्डिंग आपके रोंगटे खड़े कर देगी."
आबिद ब्रोही ने आगे कहा, "क्योंकि हमारी युवा पीढ़ी संगीत से प्यार करती है और पाकिस्तान की आबादी का एक बड़ा हिस्सा युवाओं का है, इसलिए यह पाकिस्तान सरकार का एक अच्छा क़दम है."
कराची की रहने वाली बिस्मा अब्दुल्लाह के लिए एक छत के नीचे 150 से अधिक गायकों के साथ मिलकर राष्ट्रगान गाने का अनुभव बहुत ही अप्रत्याशित था, लेकिन वह इसे अपने जीवन का एक महान आध्यात्मिक अनुभव भी बताती हैं.
वह कहती हैं, ''राष्ट्रगान गाते हुए मैंने वहां खड़े हर कलाकार की आवाज़ में वो सच्चाई महसूस की जो आपकी आत्मा से निकलती है... वो एक रोंगटे खड़े कर देने वाला अनुभव था.''
नई पीढ़ी के लिए संदेश

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बिस्मा का कहना है कि ''अपने देश के राष्ट्रगान का महत्व, उसमें छिपी सच्चाई, उस देश के बनने के पीछे की कड़ी मेहनत, जो जानें और कुर्बानी दी गई, इन सभी बातों की पीढ़ी दर पीढ़ी जानकारी दी जानी चाहिए और इन्हें महसूस किया जाना चाहिए, इसीलिए ऐसे प्रोजेक्ट्स में नई पीढ़ी को ज़्यादा शामिल किए जाने की ज़रूरत है.
बिस्मा बताती हैं कि जब वह छोटी थी और स्कूल की असेंबली में राष्ट्रगान गाया जाता था तो उनके रोंगटे खड़े हो जाते थे और राष्ट्रगान के बोल और कंपोज़ीशन उन्हें झिंझोड़ कर रख देते थे... "मैंने उस समय कभी सोचा भी नहीं था कि मैं इतनी ख़ुशक़िस्मत होऊंगी कि आगे जाकर राष्ट्रगान की दोबारा रिकॉर्डिंग किए जाने का हिस्सा बनूंगी. इस राष्ट्रगान की रिकॉर्डिंग के दौरान भी मेरे रोंगटे वैसे ही खड़े हो गए थे जैसे स्कूल की असेंबली में होते थे."
वह कहती हैं कि पुराने और नए राष्ट्रगान की भावना एक ही है.
बिस्मा ख़ुद को बहुत ख़ुशक़िस्मत मानती हैं कि "100 साल, 200 साल बाद तक... जब तक कोई और नया राष्ट्रगान नहीं बनता, पता नहीं कब तक लोग मेरी आवाज़ को पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनेंगे... और मैं अपनी आने वाली पीढ़ियों को बता सकती हूं कि देखो पाकिस्तान के राष्ट्रगान में मेरी भी आवाज़ है. मैं भी इस जज़्बे और जुनून का हिस्सा थी."

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इसी बारे में बात करते हुए, पाकिस्तान के प्रसिद्ध गायक और कई लोकप्रिय गीतों को आवाज़ देने वाले साहिर अली बग्गा ने कहा कि "ये बहुत ही रोमांचक क्षण थे जिसमें पाकिस्तान के प्रसिद्ध गायक देशभक्ति के साथ ये जश्न मना रहे थे. यह मेरे लिए एक बड़ा सम्मान था और मुझे यक़ीन है कि यह हमारी नई पीढ़ी को पाकिस्तान के इतिहास से ख़ुद को जोड़ने में मदद करेगा."
पाकिस्तान के पुराने राष्ट्रगान का इतिहास

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13 अगस्त 1954 को पाकिस्तान के राष्ट्रगान को पहली बार रेडियो पाकिस्तान पर प्रसारित किया गया था जिसके बोल हफ़ीज़ जालंधरी ने लिखे थे जबकि धुन अहमद ग़ुलाम अली छागला ने तैयार की थी.
राष्ट्रगान की धुन और इसके बोल तैयार करने की प्रक्रिया बहुत लंबी थी और पाकिस्तान बनने के तुरंत बाद से ही इस पर काम शुरू हो गया था.
लेकिन आम तौर पर लोग यह नहीं जानते कि एक समय सूरह फ़ातिहा को भी राष्ट्रगान बनाने का प्रस्ताव पेश किया गया था जिसे बाद में ख़ारिज कर दिया गया था.
आख़िरकार, दिसंबर 1948 में पाकिस्तान सरकार ने एसएम इकराम की निगरानी और सरदार अब्दुल रब नश्तर की अध्यक्षता में एक नौ सदस्यीय राष्ट्रगान कमेटी की स्थापना की घोषणा की.
राष्ट्रगान कमेटी के पास 200 से अधिक गीत और लगभग 63 धुन आई.

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इस कमेटी के सदस्यों में सरदार अब्दुल रब नश्तर, पीरज़ादा अब्दुल सत्तार, प्रोफ़ेसर राजकुमार चक्रवर्ती, चौधरी नज़ीर अहमद ख़ान, सैयद ज़ुल्फ़िकार अली बुख़ारी, एडी अज़हर, कवी जसीमुद्दीन, हफ़ीज़ जालंधरी और एसएम इकराम शामिल थे.
राष्ट्रगान कमेटी को देश के कोने-कोने से धुन और गीत मिलने शुरू हो गए थे. हफ़ीज़ जालंधरी ने महानामा (मासिक) अफ़कार के हफ़ीज़ नंबर में प्रकाशित अपने लेख 'क़ौमी तराने का अफ़साना' में लिखा है कि राष्ट्रगान कमेटी को कुल 200 से ज़्यादा गीत और क़रीब 63 धुन मिली.
इन धुनों और गीतों की समीक्षा के लिए, 4 जुलाई, 1949 को सूचना मंत्री सरदार अब्दुल रब नश्तर की अध्यक्षता में कमेटी के छह घंटे के दो सत्र आयोजित हुए जिसके बाद पाकिस्तान सरकार ने विशेषज्ञों की दो उप-समितियाँ नियुक्त कीं.
बैठक के दौरान, कमेटी को राष्ट्रगान के विभिन्न पाकिस्तानी, ईरानी और पश्चिमी धुनों की रिकॉर्डिंग सुनाई गई, जिसके बाद यह निर्णय लिया गया कि विशेषज्ञों की उप-समितियां उन नियमों को तय करें जिनके आधार पर राष्ट्रगान का अंतिम चयन होगा.
लंबे समय से, राष्ट्रगान के विशेषज्ञ यह कोशिश कर रहे थे कि राष्ट्रगान की सभी विशेषताएं पाकिस्तानी राष्ट्रगान में मौजूद हों, इन विशेषताओं में इस बात के अलावा कि गीत और धुन लोकप्रिय हों और राष्ट्रीय मानकों पर पूरे उतरें. साथ ही गुणवत्ता, गीत, भाषा, लय, धुन और संगीत के मामले में मुस्लिम राष्ट्र की परंपराओं का भी उसमें ख्याल रखा जाए.
ईरान के शाह की पाकिस्तान यात्रा

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राष्ट्रगान समिति के सामने एक समस्या यह भी थी कि कुछ महीनों के बाद ईरान के शाह पाकिस्तान की यात्रा करने वाले थे. कमेटी का मानना था कि इस अवसर पर पाकिस्तान के राष्ट्रगान की धुन ज़रूर बजनी चाहिए. इसलिए उसने 21 अगस्त 1949 को अहमद ग़ुलाम अली छगला द्वारा तैयार की गई धुन को पाकिस्तान के राष्ट्रगान की अस्थायी धुन के रूप में स्वीकृत करने की घोषणा कर दी.
राष्ट्रगान की इस धुन को रेडियो पाकिस्तान में बहराम सोहराब रुस्तमजी ने अपने पियानो पर बजा कर रिकॉर्ड कराया था. इस धुन की अवधि 80 सेकंड थी और इसे बजाने के लिए 21 वाद्ययंत्र और 38 साज़ इस्तेमाल किए गए थे.
अहमद ग़ुलाम अली छागला ने इंग्लैंड में ट्रिनिटी कॉलेज ऑफ़ म्यूज़िक से भी शिक्षा प्राप्त की थी. पाकिस्तान के बनने से पहले उन्होंने बॉम्बे में एक फ़िल्म कंपनी 'अजंता' में संगीतकार के रूप में काम किया था और पाकिस्तान बनने के बाद, पाकिस्तान सरकार ने उन्हें राष्ट्रगान के लिए संगीत तैयार करने वाली कमेटी के सदस्य के रूप में नियुक्त किया, लेकिन ये धुन तैयार करने का सम्मान उनकी ही क़िस्मत में लिखा था.
10 अगस्त 1950 को इस कमेटी ने अहमद ग़ुलाम अली छागला की धुन को पाकिस्तान के राष्ट्रगान कि स्थायी धुन के रूप में मंज़ूरी दे दी, जबकि संघीय कैबिनेट ने साल 1954 में इस धुन को राष्ट्रगान की धुन के रूप में मंज़ूरी देने की घोषणा की.
जब इस कमिटी ने पाकिस्तान के राष्ट्रगान की धुन के रूप में अहमद ग़ुलाम अली छागला की धुन को मंज़ूरी दी, तो फिर इस धुन से मेल खाने वाले शब्दों की खोज का काम शुरू हुआ.
देश के सभी प्रमुख शायरों को इस राष्ट्रगान के ग्रामोफ़ोन रिकॉर्ड भी भेजे गए थे और हर रात एक निश्चित समय पर इस धुन को रेडियो पाकिस्तान पर प्रसारित करने की भी व्यवस्था की गई थी ताकि वे इस धुन से मिलता हुआ गीत लिख सकें.
5 अगस्त, 1954 को एक और कैबिनेट बैठक हुई, जिसमें हफ़ीज़ जालंधरी द्वारा लिखे गए राष्ट्रगान को बिना किसी बदलाव के मंज़ूरी देने की घोषणा कर दी गई. इस बैठक में कैबिनेट ने यह भी निर्णय लिया कि इस राष्ट्रगान के होते हुए उर्दू और बंगाली के दो राष्ट्र गीतों की कोई ज़रूरत नहीं है, इसलिए इस प्रस्ताव को रद्द माना जाए.
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