पाकिस्तान सियासी संकट: सुप्रीम कोर्ट में संसद और संसद में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका पर बहस, किसने क्या कहा?

इमरान ख़ान

इमेज स्रोत, Getty Images

    • Author, हुमैरा कंवल
    • पदनाम, बीबीसी उर्दू डॉट कॉम, इस्लामाबाद

पाकिस्तान में नए प्रधानमंत्री का चुनाव सोमवार को होगा. संयुक्त विपक्ष ने शहबाज़ शरीफ़ को उम्मीदवार बनाया है, वहीं पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ की ओर से शाह महमूद कुरैशी उम्मीदवार हैं.

इसके पहले पाकिस्तान की नेशनल असेंबली में अविश्वास प्रस्ताव की वोटिंग में इमरान ख़ान सरकार सत्ता से बाहर हो गई. इमरान के खिलाफ 174 वोट पड़े.

पाकिस्तान की नेशनल असेंबली (संसद) में शनिवार की सुबह प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के ख़िलाफ़ पेश किये गए अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान के बजाय अदालत की कार्यवाही और उस फ़ैसले पर बहस शुरू हुई जिसमें संसद को अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान करने के लिए कहा गया था.

नेशनल असेंबली के स्पीकर ने शनिवार को घोषणा की कि वो सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का पालन करेंगे लेकिन नेशनल असेंबली में कोर्ट के फ़ैसले को लेकर असहमति पर बहस शुरू हो गई.

आइए हम भी देखते हैं कि सुप्रीम कोर्ट में पांच दिन तक चली कार्यवाही में क्या उतार-चढ़ाव आये और ये भी समझने का प्रयास करते हैं कि किस पक्ष के वकील ने कोर्ट के सामने किस तरह अपना पक्ष रखा.

सुप्रीम कोर्ट में पांच दिन तक चली सुनवाई के दौरान सरकार और विपक्ष के वकीलों ने अपनी दलीलों से कोर्ट को समझाने की कोशिश की.

लेकिन यह केस कैसे लड़ा गया? सुप्रीम कोर्ट के रूम नंबर एक में सरकार और विपक्ष के वकीलों की टीमें कितनी तैयारी के साथ गईं?

बीबीसी ने इस मुक़दमे की रिपोर्टिंग करने वाले कुछ पत्रकारों से अदालत के माहौल से लेकर वकीलों की दलीलों तक पर बात की है.

पाकिस्तान की असेंबली

पहले दिन मुश्किल में दिखे विपक्ष के वकील

जियो न्यूज़ के वरिष्ठ पत्रकार अब्दुल क़य्यूम सिद्दीक़ी ने बताया, "बुनियादी तौर पर विपक्ष का केस बहुत मज़बूत था लेकिन दूसरी ओर मुश्किल ये थी कि अदालत को कैसे संतुष्ट किया जाये कि वो संसद की कार्रवाई को असंवैधानिक क़रार दे दे."

पहले दिन कोर्ट की पांच सदस्यीय बेंच के सामने विपक्ष की ओर से फ़ारूक़ एच नाइक पेश हुए.

क़य्यूम सिद्दीक़ी ने बताया, "फ़ारूक़ एच नाइक एक अच्छे वकील हैं लेकिन पहले दिन वो बहुत कमज़ोर दिखाई दिए. वो समझ नहीं पाए कि अदालत उनसे क्या पूछना चाह रही है? वह क़ानून के सवाल पर नहीं गए और रूल और प्रोसीज़र में उलझते दिखाई दिए. ऐसा लग रहा था कि वो बहुत अच्छी तरह से तैयार नहीं थे."

क़य्यूम सिद्दीक़ी ने बताया कि कोर्ट ने भी उनसे सवाल पूछे. जस्टिस मुनीब ने प्रोसीज़र से जुड़े सवाल किए लेकिन जस्टिस मंदोखेल ने हस्तक्षेप किया और कहा, "हमें नियमों को विस्तार से नहीं देखना, हमें यह देखना है कि क्या स्पीकर की रूलिंग संविधान के अनुसार है या नहीं, क्या स्पीकर ऐसी रूलिंग दे सकते हैं? हमें इसे संवैधानिक तौर पर देखना है."

वहीं, बीबीसी के शहज़ाद मलिक ने बताया, "फ़ारूक़ एच नाइक कुछ कन्फ्यूज़न में थे. जजों ने उनसे बार-बार कहा कि हमें वो बताओ जो हम तुमसे पूछ रहे हैं. कोर्ट रूम में बैठे वकील भी यही कह रहे थे कि शायद फ़ारूक़ एच नाइक जो कहना चाह रहे थे उस पर फ़ोकस नहीं कर पा रहे थे."

पत्रकार हसन अयूब ख़ान ने बताया, "फ़ारूक़ एच नाइक शुरुआत में विपक्ष की ओर से केस को जितना ख़राब कर सकते थे उन्होंने किया."

उन्होंने कहा, "ऐसा लग रहा था जैसे कि वो विपक्ष का नहीं बल्कि सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे हों. वो अदालत को ये बताने में असमर्थ रहे कि अविश्वास प्रस्ताव लाने के लिए 20 प्रतिशत सदस्यों की आवश्यकता क्यों होती है?"

ख़ान के मुताबिक जस्टिस मंदोखेल के स्पष्टीकरण के बाद, फ़ारूक़ एच नाइक "संभले और उन्हें समझ आया."

शहज़ाद मलिक के मुताबिक रज़ा रब्बानी एक सांसद के तौर पर आए थे. उन्होंने संक्षेप में और तार्किक बात की.

सुप्रीम कोर्ट

इमेज स्रोत, Radio Pakistan

मख़दूम अली ख़ान की रणनीति

शहज़ाद मलिक के अनुसार रज़ा रब्बानी ने इस बात पर तर्क दिए कि डिप्टी स्पीकर के पास इस तरह की रूलिंग देने का अधिकार ही नहीं है.

पत्रकार क़य्यूम सिद्दीक़ी के मुताबिक, "विपक्ष का केस असल में मख़दूम अली ख़ान ने बनाया." उनके मुताबिक़ उन्होंने कोर्ट को समझाने के लिए "तीन बहुत अच्छी दलीलें" दीं.

पत्रकार क़य्यूम सिद्दीक़ी ने आगे कहा, "उनकी रणनीति सबसे बेहतरीन थी."

उनके अनुसार, "उन्होंने संसदीय लोकतंत्र, संवैधानिक प्रक्रिया और बेईमानी से जुडे प्वाइंट को बहुत ही सावधानी से बताया."

क़य्यूम सिद्दीक़ी ने बताया, "मख़दूम अली ख़ान ने जब हाजी सैफ़ुल्लाह केस की बात की और कहा कि यह इस केस पर लागू ही नहीं होता है, वो केस का टर्निंग पॉइंट था."

हसन अयूब कहते हैं, "मख़दूम अली ख़ान की दलीलों के बारे में केवल इतना ही कहूंगा कि उनसे बेहतर दलील कोई नहीं दे सकता. उन्होंने अनुच्छेद 69 के तहत संसद को दी गई छूट के बारे में विस्तार से बताया और ये भी कहा कि अगर संसद कोई असंवैधानिक कार्य करती है तो अदालत उसे देख सकती है."

वीडियो कैप्शन, COVER STORY: पाकिस्तान में सुप्रीम कोर्ट से इमरान ख़ान को झटका

वो बताते हैं, "उन्होंने अदालत के सामने दलीलें दी और कहा कि अविश्वास प्रस्ताव आ जाए तो वोटिंग ज़रूरी है या फिर प्रस्ताव पेश करने वाले उसे वापस ले लें इसके अलावा कोई रास्ता नहीं है."

उनके अनुसार, "मख़दूम अली ख़ान का सबसे अच्छा पॉइंट यह था कि जब स्पीकर की रूलिंग को असंवैधानिक घोषित कर दिया जाए तो संविधान के अनुच्छेद 58 बी का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता और अगर अदालत इस निष्कर्ष पर पहुंचती है कि रूलिंग असंवैधानिक थी, तो अविश्वास प्रस्ताव का अनुच्छेद 254 बचाव करेगा. अनुच्छेद 95 के तहत अविश्वास प्रस्ताव सात दिनों के भीतर पूरा किया जाना चाहिए और वे सात दिन पहले ही बीत चुके हैं, लेकिन अनुच्छेद 254 के जरिए इसे वापस उसी स्थिति में लिया जाएगा जो स्पीकर की रूलिंग से पहले थी."

शहज़ाद मलिक कहते हैं कि मख़दूम अली ख़ान की दलीलें बहुत सधी हुई थीं. "उन्होंने केवल इतना कहा कि अगर ऐसी कोई कार्रवाई हुई है जो संविधान के ख़िलाफ़ है तो अदालत हस्तक्षेप कर सकती है क्योंकि केवल अदालत ही संविधान की व्याख्या कर सकती है."

वो बताते हैं, " हमने देखा कि अदालत उनकी दलीलों से बहुत हद तक सहमत भी लग रही थी और चीफ़ जस्टिस ने ये टिप्पणी की कि हम जानते हैं कि हम हस्तक्षेप नहीं कर सकते हैं लेकिन जब संविधान की बात आती है तो नेशनल असेंबली का रूल अपनी जगह लेकिन रूल भी संविधान ही बनाता है..."

ध्यान रहे कि पांच जजों की पीठ ने सर्वसम्मति से फ़ैसला सुनाया. जबकि वकीलों और पत्रकारों को इस बात की बहुत कम उम्मीद थी कि बेंच सर्वसम्मति से फ़ैसला सुनाएगी.

सुरक्षाकर्मी

सरकारी वकीलों ने क्या कहा?

शहज़ाद मलिक के मुताबिक़ सुनवाई के दौरान सिंध हाईकोर्ट बार के वकील सलाहुद्दीन ने बहुत खुलकर बात की और इस युवा वकील की दलीलों के दौरान कोर्ट में पूरी तरह से ख़ामोशी रही.

उन्होंने बताया, "मुझे लगता है कि वकील सलाहुद्दीन ने पांच से सात मिनट में सब कुछ खोल कर रख दिया और वहां ऐसा लग रहा था कि अदालत उनके बाद विपक्ष की तरफ़ से शायद किसी की दलीलें न सुने और जजों के हाव-भाव, हिलते हुए सिर और कोई सवाल न पूछने से पता चल रहा था कि वे संतुष्ट हैं."

हसन अयूब ने बताया, "बाबर अवान इमरान ख़ान का प्रतिनिधित्व कर रहे थे और उन्होंने 'लेटर गेट' को छूने की कोशिश की लेकिन अदालत ने उन्हें उस तरफ़ नहीं जाने दिया, इसलिए उनके पास और कुछ था ही नहीं. इसलिए शायद उनकी दलीलें उतनी अच्छी नहीं थी. कोर्ट ने डॉक्टर बाबर अवान से कहा कि मुद्दे पर बात करें."

बीबीसी के संवादाता शहज़ाद मलिक कहते हैं, "अगर मैं सरकारी वकीलों की दलीलों की बात करूं तो उनका फ़ोकस केवल अनुच्छेद 69 पर ही था. उनकी दलील थी कि नेशनल असेंबली में चाहे कुछ भी हो जाए, अदालत हस्तक्षेप नहीं कर सकती."

उन्होंने बताया, "सरकार की टीम में बड़े-बड़े वकील थे लेकिन वे एक भी बात पर कोर्ट को सहमत नहीं कर पाए."

इमरान ख़ान

इमेज स्रोत, DREW ANGERER

वकीलों की दलील

शहज़ाद मलिक ने बताया, "अदालत अली ज़फ़र, (जो राष्ट्रपति के वकील थे) सहित हर वकील को सुन रही थी, लेकिन संतुष्ट नहीं हो रही थी. उन्होंने कोर्ट के सामने जुनेजो के दौर और सुप्रीम कोर्ट के पिछले फ़ैसले का भी हवाला दिया, इस समय की स्थिति के बारे में भी बताया और कहा कि चूंकि चुनाव की तैयारी हो चुकी है, इसलिए चुनाव की तरफ़ जाना चाहिए."

"सरकारी वकीलों को पूरी उम्मीद थी, कि अगर स्पीकर की रूलिंग को समाप्त भी कर दिया गया, तो कम से कम आम चुनाव के बारे में, शायद अदालत कोई रूलिंग दे दे. वो अदालत को लंबी कहानियां भी सुनाना शुरू कर देते थे, जिस पर अदालत कहती थी, कि आप पॉइंट पर बात करें, यस या नो. "

क़य्यूम सिद्दीक़ी के मुताबिक, "केस वाक़ई बहुत मुश्किल था. अली ज़फ़र राष्ट्रपति की तरफ़ से वकील थे. उन्होंने बहुत अच्छी दलीलें दी, लेकिन जब उन्होंने 16वीं सदी की ब्रिटिश संसद का ज़िक्र किया और कहा कि स्पीकर ने उस समय दो जजों की गिरफ्तारी का आदेश दिया था, तो उनके भाषण में एक छुपी हुई सी धमकी दिखाई दी थी."

डिप्टी स्पीकर

इमेज स्रोत, NATIONAL ASSEMBLY

नईम बुख़ारी की दलीलें

शहज़ाद मलिक के मुताबिक, "नईम बुख़ारी ने बुधवार को अदालत को बताया कि वो गुरुवार को विस्तृत दलीलें देंगे, लेकिन जब उन्होंने दलीलें देना शुरू किया तो अदालत ने कुछ सवाल पूछे, जिससे वो थोड़ा नाराज़ हुए, कि पहले मुझे अपनी बात काने दी जाए. उसके बाद मैं आपके सभी सवालों के जवाब दूंगा, जिस पर जजों ने उनसे कहा, "आज तुम बहुत प्यारे लग रहे हो, हम तुम्हें सुनना चाहते हैं."

क़य्यूम सिद्दीक़ी ने बताया "नईम बुख़ारी डिप्टी स्पीकर की तरफ़ से वकील थे. जब संसदीय समिति का रिकॉर्ड पेश किया गया तो वो लाजवाब हो गए थे, लेकिन समिति में न तो विदेश मंत्री थे और न ही राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार. वो ख़ुद तो उनका नाम नहीं डाल सकते थे."

शहज़ाद मलिक के मुताबिक "नईम बुख़ारी ने कोर्ट से कहा कि अगर वो अनुमति दें तो इन कैमरा दस्तावेज़ पेश किए जाएंगे, लेकिन कोर्ट ने कहा कि हम इन मामलों में नहीं पड़ना चाहते और आप हमें केवल इतना बताएं कि डिप्टी स्पीकर ने जो कार्रवाई की है, हम उसमें दख़ल दे सकते हैं, तो उनका जवाब था कि पार्लियामेंट सुप्रीम है, जिसके जवाब में उन्हें कहा गया कि संविधान सुप्रीम है और संविधान से ऊपर कुछ नहीं है और संविधान के तहत ही सब कुछ बना है."

सुरक्षाकर्मी

सरकारी वकीलों की दलील में विरोधाभास

पत्रकार हसन अयूब कहते हैं, "फिर अटॉर्नी जनरल आए. उन्होंने कहा कि संसद में अनुच्छेद 69 की पूर्ण छूट नहीं है और ये स्पीकर की रूलिंग का बचाव नहीं करता है. इस मौक़े पर सरकारी वकीलों के पक्ष में विरोधाभास देखने को मिला. लेकिन अटॉर्नी जनरल ने अदालत से पैच का रास्ता मांगा. अटॉर्नी जनरल ने कहा कि चुनाव प्रक्रिया शुरू हो गई है लेकिन अदालत ने पक्षों को बुलाया, शहबाज़ शरीफ़ को बुलाया और बिलावल भुट्टो को बुलाया."

शहज़ाद मलिक के मुताबिक ऐसी कोई जांच या सबूत नहीं था जो सरकारी वकीलों द्वारा अदालत में पेश किया जा सकता.

शहज़ाद मलिक बताते हैं कि एक समय पर अली ज़फ़र ने कहा, "आज आपने उन्हें गिराया है, कल वो आपको गिराएंगे, इस पर विपक्ष के वकील मख़दूम अली ख़ान ने अदालत से कहा कि ये तो धमकी दे रहे हैं."

उनके अनुसार, "अली ज़फ़र कोशिश कर रहे थे कि अदालत इस मामले को आगे ले जाये कि असेंबली भंग हो चुकी है, लेकिन अदालत ने रूलिंग को देखा और रूलिंग से ही पूरे मामले को देखा और सभी को असंवैधानिक घोषित कर दिया."

क़य्यूम सिद्दीक़ी ने बताया, "सुप्रीम कोर्ट ने एक बहुत ही स्पष्ट फ़ैसला सुनाया."

शहज़ाद मलिक ने बताया, "कोर्ट की सुनवाई के दौरान तो टर्निंग प्वाइंट नहीं दिखाई दिया, लेकिन फ़ैसला सुनाए जाने से पहले अटॉर्नी जनरल का राष्ट्रपति को पत्र भेजना और फिर कोर्ट का मुख्य चुनाव आयोग को तलब करना एक टर्निंग प्वाइंट था."

"पहले कम लोगों को उम्मीद थी कि फ़ैसला सर्वसम्मति से आएगा, लेकिन फिर जब फ़ैसला आया तो यह एक बड़ा सरप्राइज़ था."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)