यूक्रेन-पोलैंड सीमा पर शरणार्थियों की मदद में जुटे भारतीय: ग्राउंड रिपोर्ट

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- Author, दिव्या आर्य
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, यूक्रेन-पोलैंड सीमा से
संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक रूसी हमले से बचने के लिए अब तक दो लाख से ज़्यादा लोग यूक्रेन छोड़ चुके हैं. पड़ोसी देशों में सबसे ज़्यादा, करीब पंद्रह लाख शरणार्थी पोलैंड पहुंचे हैं.
सीमा पर बने नाकों पर पोलैंड के कर्मचारियों की मदद के लिए सबसे आगे तैनात हैं अलग-अलग देशों से आए कार्यकर्ता.
बीते दिनों में ऑपरेशन गंगा के तहत ज़्यादातर भारतीयों को यूक्रेन से वापस भारत पहुंचा दिया गया है. इसके बावजूद यूक्रेन-पोलैंड बॉर्डर पर कई भारतीय स्वयंसेवक यूक्रेनी शरणार्थियों की मदद करने के लिए तैनात हैं.
यूक्रेन और पोलैंड की सीमा पर स्थित मेडिका चेकप्वाइंट पर ऐसे ही कार्यकर्ताओं से बीबीसी संवाददाता ने बातचीत की.
पूरे इलाक़े में इस समय काफ़ी ठंड पड़ रही है, कई इलाकों में अब भी बर्फ़ है और रात में तापमान शून्य से नीचे चला जाता है. यूक्रेन-पोलैंड सीमा पर कड़कड़ाती ठंड में ठिठुरते बच्चे, उनकी माता-पिता, बुज़ुर्ग सब किसी तरह सुरक्षित पोलैंड में पहुँच जाने की कोशिश में हैं.
यहाँ मददगार कार्यकर्ताओं की सख़्त ज़रूरत है. ओक्साना अपनी दो बेटियों के साथ राजधानी किएव में रूसी बमबारी से भागकर आई हैं. वे बताती हैं, "हमारे साथ बहुत बुरा हुआ. घर पर बमबारी हुई, हमारा घर नहीं बचा. बच्चे थोड़ा ठीक हैं. पर बहुत डरे हुए हैं. मैं उनसे कहती हूं कि हम मेरी नानी के पास फिनलैंड जाएँगे."
ओक्साना जैसे लोगों की मदद करने के लिए कई भारतीय आगे आए हैं.
दो बच्चों और दो सूटकेसों में अपनी पूरी ज़िंदगी समेटे ओक्साना पनाह की तलाश में तलाश में भटकर रही हैं. फ़िनलैंड तक पहुँचने का उनका सफ़र आसान नहीं होगा, लेकिन बीच राह में उनकी मदद करने दुनिया भर के लोग पहुँच रहे हैं, जिनमें न्यूयॉर्क में रहने वाले हरदयाल सिंह भी शामिल हैं.

हरदयाल सिंह बताते हैं, "हमारे एक तरफ़ यूक्रेन है, दूसरी तरफ़ पोलैंड है. ये ग्रीन ज़ोन है. इसे डीमिलटराइज़ड ज़ोन कहते हैं, यहाँ सैनिक नहीं हैं. और यहाँ पर जो शरणार्थी आ रहे हैं हम उनको लंगर खिला रहे हैं. गरम कपड़े और जो भी इनको तत्काल मदद चाहिए वो हम दे रहे हैं. इसके अलावा हम फूड यूक्रेन भी ले कर जाते हैं. सोलह-सत्रह घंटे लोग शहरों से घूमकर पैदल लोग वहाँ पर कलेक्ट होते हैं. वहां पर खाने के लिए कुछ नहीं है. सब कुछ बंद है वहां पर, सो वहां पर भी हम लंगर लगाते हैं.
ये फूड ट्रक है. इस फूड ट्रक में दो हज़ार से ज़्यादा लोगों का खाना हर रोज़ बनता है."
जो मानवतावादी संगठन यूक्रेन में काम कर रहे हैं उनमें यूनाइटेड सिख्स भी है. इस संगठन से जुड़ी हैं कमनीव कौर जो सीमा पर मुश्किल झेल रहे लोगों की मदद कर रही हैं. वे कहती हैं, "मेरे पास थोड़ा चावल और दाल है, थोड़ी सी सूप भी है. हम लोगों को चाय और कॉफ़ी पिलाने की कोशिश कर रहे हैं."
कुछ फूड ट्रक वाले लोग भी सीमा पर स्थित नाके के करीब पहुंचे हैं और उनकी कोशिश ठंड से कांपते लोगों को कुछ खाना देने की है. ऐसे ही एक ट्रक के मालिक निकुल बताते हैं, "मेरा छोटा सा बिजनेस है, हमारे दो रेस्तराँ हैं और एक फूड ट्रक है. मेरी पत्नी पोलिश हैं, मेरे दो छोटे बच्चे हैं, भगवान न करे कल को इधर कुछ हो गया, तो हमारे जैसे ही दूसरे लोग होंगे जो हमारी मदद करने के लिए तैयार होंगे."
ठंड और भूख की वजह से शरणार्थियों की हालत बहुत ही ख़राब है.
गुरदयाल बताते हैं, "हमारे सामने पिछले तीन-चार दिन में सात-आठ उम्रदराज़ महिलाएँ बेहोश होकर गिर चुकी हैं उनको हमने उठाया और किसी तरह संभाला है. जो बच्चे हैं वे इतनी ठंड में उल्टियाँ कर रहे हैं, बहुत बुरी हालत हो गई है. सो जब हमें पता चला तो हमने यहां टेंट लगाया. ये अब तकरीबन तैयार है. इसमें हीटर लगाने हैं. इसमें हम टेबल और कुर्सी भी लगाएँगे ताकि लोग थोड़ी देर के लिए बैठ सकें."

मानवीय सहायता देने के इरादे से यहाँ गुजराती मूल की ब्रितानी दिशिता सोलंकी भी पहुँची हैं.
दिशिता बीबीसी से बातचीत में कहती हैं, "हम छोटी-मोटी मदद कर रहे हैं, जैसे यहां पर कोई बूढ़ा जो आ रहा है तो उसका सामान पकड़कर हम कतार तक ले जा रहे हैं. किसी के एक हाथ में बच्चा है, दूसरे हाथ में कंबल है.. पंद्रह-बीस घंटे ठंड में चलकर आ रहे हैं. यहाँ सामान की कमी नहीं है, खाना लोगों को मिल रहा है, लेकिन जिस चीज़ की कमी है वह मददगार लोगों की जो इन सामानों को जो कई स्रोतों से आ रहे हैं, लोगों में ठीक से बाँट सकें."
हज़ारों-हज़ार लोगों का लंबा और तकलीफ़देह सफ़र अभी जारी है, भयानक ठंड और अपने घर से उजड़कर नई पनाहगाह तक की कठिन यात्रा कुछ हद तक आसान हो गई है इन भारतीय मानवतावादी कार्यकर्ताओं की मदद से.
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