यूक्रेन: जब कीएव में बीबीसी संवाददाता से बोले होटलकर्मी- 'सर जागिए, बमबारी हो सकती है'

- Author, इल्या बाराबनोव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
"सर, सर...जागिए," तेज़ी से मेरे कमरे का दरवाजा पीटते हुए होटल के कर्मचारी ने कहा.
इसके बाद वह बोला, "आपके साथियों ने मुझे आपसे ये बताने के लिए कहा है कि हम पर शायद बमबारी हो सकती है."
मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं कीएव में ये सब कुछ सुनूंगा.
तमाम दूसरे लोगों की तरह मैंने भी हालिया महीनों में अमेरिका की ओर से जारी की गयी उन चेतावनियों को सुना था जिनमें वे कह रहे थे कि रूस हमला करेगा.
लेकिन मैं इस बात की कल्पना नहीं कर सकता था कि ये हमला असल में हो जाएगा.
जब मैं यूक्रेन आया
मैं साल 2014 में एक पत्रकार के रूप में विरोध प्रदर्शन की कवरेज के लिए यूक्रेन आया था.
ये आंदोलन तब हुआ था जब तत्कालीन राष्ट्रपति विक्टर यानुकोविख को उनके यूक्रेन को यूरोप से दूर हटाकर रूस के क़रीब ले जाने वाले फ़ैसले की वजह से अपदस्थ कर दिया गया.
मैंने क्राइमिया में उन तमाम घटनाओं को कवर किया जब रूस ने अवैध ढंग से यूक्रेन के प्रायद्वीप पर कब्जा लिया था.

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जब रूस समर्थित अलगाववादियों ने अपने 'पीपल्स रिपब्लिक' की घोषणा की तब भी मैं पूर्वी यूक्रेन में ही था.
पूर्वी यूक्रेन में संघर्ष शुरू होने के पहले दिन से ही रूस वहां अपनी मौजूदगी से इनकार करता रहा है.
लेकिन मुझे साल 2014 का सितंबर महीना अच्छी तरह याद है, जब रूसी टैंक सीमा पर स्थित एक छोटे से यूक्रेनी कस्बे पर कब्जा कर रहे थे.
मैंने इन टैंकों को अपनी आंखों से देखा था, फिर भी जब मैंने मॉस्को रेडियो स्टेशन के कार्यक्रम में शामिल होते हुए इस स्थिति का वर्णन किया तो उन्होंने मुझसे कहा कि "ऐसा नहीं हो सकता. आपसे ज़रूर कोई ग़लती हुई है."
मैंने साल 2015 के फरवरी महीने में दोनेत्स्क सूबे के रणनीतिक शहर डेबालत्सीव के लिए हुए भीषण संघर्ष को भी देखा है जिसमें सूदूर पूर्वी बूर्यातिया सूबे की रूसी सैन्य टुकड़ियों ने अलगाववादियों का समर्थन किया.
मुझे इन सभी वाक्यों के साथ-साथ रूस के विपक्षी नेता एलेक्सी नवेलनी को ज़हर दिए जाने की घटना, पिछले रूसी चुनावों में भयानक धोखाधड़ी और व्लादिमीर पुतिन को 2036 तक सत्ता में रहने की इजाजत देने के लिए संविधान में किए गए बदलाव जैसी तमाम घटनाएं याद थीं.
इसके बावजूद मैं इस बात पर यकीन नहीं कर सका कि रूसी राष्ट्रपति यूक्रेन पर पूरी तरह से हमला करेंगे.
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'सब कुछ बदल गया'
मुझे तब तक यकीन नहीं हुआ जब तक होटल के कर्मचारी ने मेरे बिस्तर के पास खड़े होकर मुझसे ये नहीं कहा कि युद्ध शुरू हो चुका है. और इस एक पल के बाद सब कुछ बदल गया.
होटल की लॉबी में मैंने अपना भुगतान किया. लेकिन मुझसे पैसे ले रही रिसेप्शनिस्ट के हाथ कांप रहे थे. और वह रसीद पर हस्ताक्षर नहीं कर सकी.
इसके साथ ही मेरा फोन बजने लगा. कीएव से फोन कर रहे मेरे दोस्त ने पूछा कि क्या मैं ओडेसा में किसी टैक्सी ड्राइवर को जानता हूं जो उसकी गर्लफ्रेंड को वहां से सुरक्षित निकालकर पड़ोसी देश मोलडोवा ला सके.
एक घंटे के अंदर हमें एक व्यक्ति मिला जिसने सामान्य दिनों की अपेक्षा इस काम के लिए दोगुने पैसे लिए.
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बाहर निकलेंया जहां हैं वहीं रहें?
इसके बाद लिवीव से एक अन्य दोस्त का फोन आया जो कि वहां एक जॉब इंटरव्यू के लिए गया हुआ था.
हमारे सामने एक सवाल था कि क्या उसे ट्रेन से कीएव आना चाहिए?
हमने तय किया कि हमला करने वाली सेना रेलवे लाइन और स्टेशन पर हमला कर सकती है.
ऐसे में उसी जगह पर रुकना सबसे ठीक था.
इसके बाद अगला फोन उस शख़्स का आया जो साल 2014 में दोनेत्स्क की जंग में लड़ चुका था. मैंने कुछ दिन पहले इस शख़्स का इंटरव्यू लिया था.
वह अपनी पूर्व पत्नी और बच्चे को रूसी सीमा से मात्र आधे घंटे की दूरी पर स्थित खारकीव से किसी भी तरह निकालना चाहते थे.
उन्होंने बताया कि आने वाले दिन के लिए ट्रेन टिकट उपलब्ध थे, लेकिन शहर के बाहरी इलाके में लड़ाई शुरू हो चुकी थी. क्या वे तब तक प्रतीक्षा करने का जोखिम उठा सकते थे?

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लड़ाकू विमान और एयर सायरन
होटल छोड़कर मैं अपने दोस्त के घर गया ताकि कुछ काम कर सकूं.
होटल से मेरे दोस्त के घर के बीच मात्र दो ब्लॉक की दूरी है लेकिन इस रास्ते पर मैंने जो सन्नाटा पसरा हुआ देखा वैसा पहले नहीं देखा था.
न लोग, न कारें. मैंने इस इलाके को कभी भी इस हालत में नहीं देखा था. कीएव का ये हिस्सा सामान्य तौर पर युवाओं और पर्यटकों से भरा रहता है.
बादल इतने नीचे थे कि उन्होंने सिर्फ सूरज को ही अपनी ओट में नहीं छिपाया, बल्कि उन लड़ाकू विमानों को भी छिपा लिया जो कि हमारे ऊपर आसमान में उड़ रहे थे.
क्या वे यूक्रेन के विमान थे या रूसी विमान थे?
क्या मुझे दौड़कर एक बेसमेंट छुप जाना चाहिए या सबसे ऊपर वाली मंजिल के कमरे में रहना चाहिए ताकि मैं कुछ बड़ा शुरू होने पर सबसे पहले रिपोर्ट दे सकूं.
मैं जब ये सब कुछ सोच रहा था तब हवाई हमले की चेतावनियों ने कई बार सन्नाटे को तोड़ा.
मैंने अपने फोन पर उसे रिकॉर्ड किया लेकिन उसे ट्विटर पर अपलोड करने में 20 मिनट लग गए क्योंकि मोबाइल इंटरनेट सिग्नल लगातार टूटते रहे.
जब मैं यूक्रेन की राजधानी में अपने रूसी पासपोर्ट के साथ चल रहा था तब मेरे ज़हन में उस दिन का ख्याल आया जब हिटलर ने 1941 में सोवियत संघ पर हमला किया था.
मुझे नहीं पता है कि उन दिनों कीएव में कोई जर्मन रहता था या नहीं. लेकिन अगर कोई जर्मन मौजूद होता तो वह वैसा ही महसूस करता, जैसा कि मैं कीएव में एक रूसी व्यक्ति के रूप में कर रहा हूं.
उस दिन जब रूसी विमानों ने एक के बाद एक यूक्रेन के कई शहरों पर बम बरसाए तब मेरे यूक्रेन के तमाम दोस्तों में से किसी ने भी मुझसे कड़वे शब्द नहीं कहे. हालांकि, उन्हें ऐसा करने का पूरा अधिकार था.
लेकिन इस सब ने मुझे एक बड़ी नैतिक दुविधा में डाल दिया: मैं रिपोर्टिंग करने और युद्ध की भयावहता कम होने के बाद अपने घर, अपने देश रूस कैसे लौट पाऊंगा जिसने यूक्रेन के साथ आज ये व्यवहार किया है.
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