सऊदी अरब जाएंगे तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोआन, पश्चिम एशिया में हलचल

सऊदी अरब

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    • Author, रजनीश कुमार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

ऑटोमन साम्राज्य के सैनिकों ने पहले सऊदी स्टेट की राजधानी दिरिया और रियाद के बाहरी इलाक़ों पर हमला कर ध्वस्त कर दिया था.

इसी दौरान इस्तांबुल में 1818 में सऊदी अरब के किंग अब्दुल्लाह बिन सऊद का सिर कलम किया गया था. सऊदी स्टेट को ऑटोमन साम्राज्य ने पहली बार 1818 में तबाह किया और दूसरी बार 1871 में. सऊदी अरब की तीसरी कोशिश तब सफल रही जब पहले विश्व युद्ध में उसने ब्रिटेन का साथ दिया और ऑटोमन साम्राज्य को मुँह की खानी पड़ी.

ऑटोमन साम्राज्‍य ही 1924 में सिमटकर आधुनिक तुर्की बना और वहाँ के वर्तमान राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन के बारे में कहा जाता है कि वो उसी साम्राज्य से प्रेरणा लेते हैं. लेकिन अब ज़माना ऑटोमन काल का नहीं है. सऊदी और तुर्की अपने रिश्तो पर हाल के वर्षों में जमी धूल झाड़ने की कोशिश कर रहे हैं.

तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप अर्दोआन ने अगले महीने सऊदी अरब के दौरे पर जाने की घोषणा की है. तुर्की और सऊदी अरब के रिश्ते हाल के वर्षों में तनाव से भरे रहे हैं.

अर्दोआन की अगले महीने संयुक्त अरब अमीरात जाने की भी योजना है. कहा जा रहा है कि अर्दोआन अब खाड़ी के देशों से संबंधों में भरी कड़वाहट ख़त्म करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं.

अर्दोआन ने संकेत दिया है कि वो सऊदी अरब से निर्यात बढ़ाना चाहते हैं. सऊदी अरब परस्त अशराक़ न्यूज़ समेत अरब के अन्य मीडिया आउटलेट्स ने अर्दोआन के सऊदी अरब जाने की घोषणा के वीडियो को प्रमुखता से साझा किया है. अर्दोआन ने इस्तांबुल में तीन जनवरी को यह घोषणा की थी.

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वीडियो में दिख रहा है कि अर्दोआन से पत्रकार हाल के वर्षों में सऊदी अरब में तुर्की से निर्यात कम होने को लेकर सवाल पूछ रहे हैं. इसी सवाल के जवाब में अर्दोआन ने कहा, ''सऊदी के अधिकारी मेरा इंतज़ार कर रहे हैं. वे उम्मीद कर रहे हैं कि मैं सऊदी अरब जाऊं. फ़रवरी महीने में मैं सऊदी अरब जाऊंगा.''

अमेरिका में जो बाइडन के आने के बाद से पश्चिम एशिया में भारी उथल-पुथल है. इस इलाक़े के देश अपनी दुश्मनी भुला रहे हैं. सऊदी और ईरान के बीच बात चल रही है. नवंबर में अबूधाबी के क्राउन प्रिंस इस्तांबुल गए और तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोआन सऊदी अरब जाने की घोषणा कर रहे हैं. ये सारा घटनाक्रम किस ओर संकेत कर रहा है?

तुर्की

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पश्चिम एशिया में उथल-पुथल

खाड़ी के देशों में भारत के राजदूत रहे तलमीज़ अहमद कहते हैं, ''अमेरिका को लेकर अविश्वास बढ़ा है. पश्चिम एशिया अब अमेरिका की रणनीति से बाहर है. बाइडन का पूरा ध्यान इंडो-पैसिफिक में चीन को लेकर है. दूसरी तरफ़ जिस तरह से अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान तो तालिबान के हवाले कर दिया और अपना बोरिया-बिस्तर समेट लिया, उससे एक संदेश ये भी गया कि अमेरिका कोई काम तार्किक अंत तक नहीं पहुँचाता है. अमेरिका से संबंध को लेकर अविश्वास का माहौल बना है.''

तलमीज़ अहमद कहते हैं, ''पश्चिम एशिया में अजीब तरह से गतिविधियां हो रही हैं. नए गठबंधन बन रहे हैं. बाइडन के आने के बाद से बहुत कुछ बदला है. ट्रंप जब थे तो इसकी ज़रूरत नहीं थी. बाइडन के आने के बाद मध्य-पूर्व में हलचल है. बाइडन कह रहे हैं कि उनकी दिलचस्पी वेस्ट एशिया में नहीं है.''

''अफगानिस्तान का मसला हुआ तो इसे लेकर भ्रम और बढ़ा और इससे पश्चिम एशिया में अमेरिका को लेकर अविश्वास बढ़ा है. खाड़ी के देशों को लग रहा है कि इस इलाक़े में अपनी डिप्लोमैसी ख़ुद ही चलानी होगी. सऊदी अरब ख़ुद ईरान से बात कर रहा है. यूएई ख़ुद तुर्की जा रहा है. नया माहौल शुरू हुआ है.''

तलमीज़ अहमद कहते हैं, ''पुतिन और शी जिनपिंग के सामने बाइडन की समझदारी नाकाफ़ी लग रही है. ट्रंप ने जो इसराइल की स्वीकार्यता को लेकर अभियान शुरू किया था वो थम चुका था. बाइडन ने इसे आगे बढ़ाने की कोशिश की लेकिन इंडोनेशिया ने नकार दिया. यमन को लेकर कोई नतीजा नहीं निकला है.''

''तुर्की का जो दृष्टिकोण है, वो स्ट्रैटिजिक ऑटोनमी है. वो किसी के साथ स्थायी गठबंधन में नहीं जाना चाहता है. उनका प्रिंसिपल है कि तुर्की का एक रोल होना चाहिए. अर्दोआन ऑटोमन ट्रेडिशन से प्रेरणा ले रहे हैं. ये जो रिश्ते अब बन रहे हैं, वे मुद्दे आधारित हैं. कोई गठबंधन नहीं है. इसमें कोई बाध्यता नहीं है. प्रतिस्पर्धा भी है और सहयोग भी है. नेटो इनके लिए बाध्यता नहीं है. तुर्की ने अमेरिका से पेट्रीअट मिसाइल मांगी, उसने नहीं दी तो अर्दोआन ने रूस से एस-400 ले लिया.''

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सऊदी में अर्दोआन की घोषणा को लेकर हलचल

सऊदी अरब ने इस दौरे के बारे में कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है. लेकिन सऊदी अरब के मीडिया में अर्दोआन की घोषणा की कवरेज प्रमुखता से की गई है. ओकाज़ और अल-मार्सद ने अर्दोआन की घोषणा को काफ़ी तवज्जो दी है. सऊदी अरब को कुछ राष्ट्रवादियों ने यह भी कहा है कि अर्दोआन की सऊदी अरब के नेतृत्व के साथ बैठक इस क्षेत्र में सऊदी के दबदबे को दिखाता है.

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सऊदी अरब के राजनीतिक टिप्पणीकार तुर्की अल-फ़ैसल अल-रशीद ने कहा है, ''हमारे नेतृत्व की बुद्धिमानी से कई चीज़ें हमारे पक्ष में हो रही हैं. यह इस क्षेत्र के लिए भी अच्छा है.''

सऊदी अरब के एक राष्ट्रवादी ट्विटर यूज़र ने अर्दोआन के सऊदी आने की घोषणा का मज़ाक उड़ाते हुए लिखा है, ''मैंने सऊदी अरब से अपॉइंटमेंट के लिए अनुरोध किया था और उन्होंने फ़रवरी में आने की अनुमति दी है.''

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इसके अलावा सऊदी अरब के कई राजनीतिक कार्यकर्ताओं ने अर्दोआन के आगामी दौरे का विरोध किया है. डेमोक्रेसी फॉर द अरब वर्ल्ड नाउ (DAWN) के निदेशक अब्दुल्लाह अलाउध ने ट्वीट कर कहा है, ''सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान अल साउद ने अर्दोआन से बस एक अनुरोध किया था कि वे 2018 में सऊदी के पत्रकार जमाल ख़ाशोज्जी की हत्या मामले में तुर्की के मीडिया में सऊदी अरब के नाम का ज़िक्र नहीं होने दें. यह अनुरोध सऊदी अरब की सुरक्षा और अर्थव्यवस्था से जुड़ा था.''

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सऊदी अरब के एक्टिविस्ट लोउजाइन अल-हाथलोउल को हाल ही में रिहा किया गया था. इनकी बहन लिना हाथलोउल ने अर्दोआन के आगामी सऊदी दौरे पर एक वीडियो ट्वीट किया है. इस वीडियो में दिख रहा है कि सऊदी अरब का एक व्यक्ति तुर्की में बने म्यूज़िक उपकरण को जला रहा है. 2020 से सऊदी के लोग तुर्की में बने सामानों का बड़े स्तर पर बहिष्कार कर रहे हैं.

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सऊदी अरब के साथ यूएई, अर्दोआन और उनकी जस्टिस एंड डिवेलपमेंट पार्टी (एकेपी) पर मुस्लिम ब्रदरहुड से रिश्ता रखने के तोहमत लगाते रहे हैं. इसे लेकर दोनों देश अर्दोआन का तिरस्कार करते रहे हैं.

तुर्की की क़तर से कई स्तरों पर साझेदारी रही है. यह साझेदारी भी 2017 से 21 के बीच सऊदी, मिस्र, यूएई और बहरीन के लिए असहज करने वाली रही. 2017 से 21 के बीच सऊदी ने क़तर के ख़िलाफ़ नाकाबंदी लगा रखी थी.

2018 में सऊदी के पत्रकार जमाल ख़ाशोज्जी की इस्तांबुल स्थित सऊदी के वाणिज्य दूतावास में हत्या के बाद दोनों देशों के संबंध पटरी से उतर गए थे. उस वक़्त अर्दोआन ने पूरे मामले पर सऊदी के क्राउन प्रिंस को जमकर घेरा था.

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सऊदी की अहमियत

उसी दौरान सऊदी सरकार ने अपने नागरिकों के तुर्की जाने और वहाँ के बने सामान के इस्तेमाल को रोकने को लेकर काम किया. हालांकि पिछले साल दोनों देशों के बीच राजनयिक स्तर पर कई तरह की पहल शुरू की गई.

तुर्की के विदेश मंत्री मेवलुत चाउसोलो ने पिछले साल अक्टूबर में सऊदी अरब का दौरा किया था. इसके अलावा अर्दोआन ने फ़ोन पर सऊदी के किंग सलमान बिन अब्दुलाज़ीज़ अल साऊद से बात की थी.

तुर्की और यूएई में बढ़ती क़रीबी के बीच सऊदी अरब ने अर्दोआन सरकार से बातचीत बढ़ाई है. अबूधाबी के क्राउन प्रिंस और यूएई के असली शासक के रूप में देखे जाने वाले मोहम्मद बिन ज़ायद अल नाह्यान ने पिछले साल नवंबर में तुर्की का दौरा किया था. यह दौरा हैरान करने वाला था. सऊदी अरब और यूएई मध्य-पूर्व में भविष्य में अमेरिकी मौजूदगी को लेकर आशंकित हैं और इस वजह से क्षेत्रीय साझेदारी बढ़ाने में लगे हुए हैं.

हाल के वर्षों में विदेश नीति में सऊदी अरब और यूएई के बीच भी प्रतिद्वंद्विता बढ़ी है. तुर्की में यूएई के बढ़ते प्रभाव के बीच सऊदी अरब भी अंकारा से रिश्ते ठीक कर मौजूदगी को संतुलित रखने की कोशिश कर रहा है. तुर्की के साथ संयुक्त अरब अमीरात ने निवेश को लेकर समझौता किया है. यह समझौता तब हुआ है, जब तुर्की की अर्थव्यवस्था कई मोर्चों पर बदहाली से जूझ रही है.

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अर्दोआन की मजबूरी

तुर्की की मुद्रा लीरा ऐतिहासिक रूप से कमज़ोर हुई है. आयात और निर्यात का अंतर भी लगातार बढ़ रहा है. पिछले महीने तुर्की में महंगाई दर 36.1 % पहुँच गई थी. 2021 में लीरा में 44 फ़ीसदी की गिरावट आई. सऊदी अरब से कम होते निर्यात का असर तुर्की की अर्थव्यवस्था पर सीधा पड़ा है.

ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक़ तुर्की के कारोबारियों ने शिकायत की थी कि वे सऊदी अरब में अनाधिकारिक बहिष्कार का सामना कर रहे हैं. दिसंबर, 2019 में तुर्की का सऊदी में निर्यात 1.02 अरब रियाल से घटकर 50.6 करोड़ रियाल हो गया था. 95 फ़ीसदी की गिरावट आई थी.

टर्किश स्टैटिस्टिक्स एजेंसी के आँकड़े के अनुसार, 2020 में सऊदी में तुर्की का निर्यात 78 फ़ीसदी कम हुआ था. सऊदी सबसे ज़्यादा आयात चीन, जापान और भारत से करता है. तुर्की में अगले साल चुनाव है और वहां की अर्थव्यवस्था में जारी गिरावट अर्दोआन के लिए चिंतित करने वाला है. अर्दोआन चाहते हैं कि सऊदी के साथ रिश्ते सुधार निर्यात को बढ़ाया जाए.

सऊदी अरब का तुर्की से रिश्ता ठीक होता है तो उसे सुरक्षा में साझेदारी बढ़ाने में मदद मिल सकती है. सऊदी अरब को तुर्की सैन्य उपकरण और ड्रोन मुहैया करा सकता है. लेकिन पश्चिम एशिया में आजकल जो कुछ भी असामान्य हो रहा है उसकी सीधा रिश्ता मध्य-पूर्व की राजनीति में आई तब्दीली के तौर पर देखा जा रहा है.

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