हाइपरसोनिक मिसाइल क्या हैं, जिन्हें लेकर चीन अमेरिकी मीडिया के दावों को कर रहा है ख़ारिज

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- Author, अनंत प्रकाश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
"चीन ने लगभग दो महीने पहले (अगस्त में) परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम अत्याधुनिक हाइपरसोनिक मिसाइल का परीक्षण किया है जिससे अमेरिकी ख़ुफिया तंत्र सकते में आ गया है."
अंतरराष्ट्रीय अख़बार फाइनेंशियल टाइम्स ने अपनी ताज़ा रिपोर्ट में ये दावा किया है.
अख़बार ने पांच अलग-अलग अनाम सूत्रों के आधार पर ये ख़बर दी है.
हालांकि, चीन ने आधिकारिक तौर पर इस ख़बर का खंडन किया है. चीन ने दावा किया है कि यह (परीक्षण) एक मिसाइल नहीं बल्कि स्पेस क्राफ़्ट का था.
हालांकि, चीन के खंडन के बावजूद इस ख़बर ने दुनिया भर में हलचल मचा दी है.
अमेरिका, रूस और चीन एक लंबे समय से हाइपरसोनिक हथियार बनाने की कोशिश कर रहे हैं.
इसमें एक ग्लाइड व्हीकल को बनाया जाना भी शामिल है जिसे अंतरिक्ष में एक रॉकेट के साथ छोड़ा जाता है. इसके बाद वो पृथ्वी का चक्कर लगाते हुए अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता है.
चीन की परमाणु हथियार नीति के विशेषज्ञ एमआईटी प्रोफेसर टेलर फ्रेवल ने 'फाइनेंशियल टाइम्स' को बताया है कि परमाणु हथियारों से लैस हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल अमेरिकी मिसाइल डिफेंस सिस्टम को चकमा देने में चीन की मदद कर सकता है.
फ्रेवल के साथ-साथ दुनिया भर में कई जानकार इस ख़बर पर अपनी प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं. कुछ विशेषज्ञ इसे भविष्य के लिए एक चेतावनी के रूप में देख रहे हैं.
वहीं, कुछ अन्य विशेषज्ञों का मानना है कि इसे ज़्यादा गंभीरता से लेने की आवश्यकता नहीं है.
बीबीसी हिंदी ने परमाणु हथियारों एवं रक्षा क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों से बात करके इस तकनीक और इसके असर को समझने की कोशिश की है.

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आख़िर क्या होती है हाइपरसोनिक मिसाइल
हाइपरसोनिक मिसाइल से आशय उन मिसाइलों से है जो आवाज़ की गति से पांच गुना तेज रफ़्तार से उड़ते हुए अपने लक्ष्य की ओर बढ़ती हैं.
लेकिन हाइपरसोनिक हथियारों को उनका विशेष दर्जा उनकी स्पीड से नहीं मिलता है.
सेंटर फॉर एयरपॉवर स्टडीज़ से जुड़ीं परमाणु हथियारों की विशेषज्ञ मनप्रीत सेठी बताती हैं, "हाइपरसोनिक एक काफ़ी पुरानी तकनीक है. बैलिस्टिक मिसाइलें भी ध्वनि की गति से तेज चलती हैं."
ऐसे में सवाल उठता है कि हाइपरसोनिक मिसाइल का एक्स फैक्टर या ख़ास बात क्या है.
रक्षा क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञ राहुल बेदी इस मिसाइल की मारक क्षमता को समझाते हुए कहते हैं, "हाइपरसोनिक मिसाइल पिछले 30-35 सालों की सबसे आधुनिक मिसाइल तकनीक है. इसके तहत पहले एक व्हीकल मिसाइल को अंतरिक्ष में लेकर जाता है. इसके बाद मिसाइल इतनी तेजी से लक्ष्य की ओर बढ़ती हैं कि एंटी मिसाइल सिस्टम इन्हें ट्रैक करके नष्ट नहीं कर पाते."

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कहते हैं कि किसी भी हथियार की उपयोगिता उस वक़्त तक बनी रहती है जब तक मुकाबले में उससे उन्नत हथियार न आ जाए.
ये बात बैलिस्टिक मिसाइल और हायपरसोनिक मिसाइल पर भी लागू होती दिखती है.
सेठी बताती हैं, "बैलिस्टिक मिसाइल भी हायपरसोनिक गति से चलती है लेकिन जब उसे एक जगह से लॉन्च किया जाता है तो पता चल जाता है कि वह कहां गिरेगी. ऐसे में इन मिसाइलों को ट्रैक करना आसान होता है. इसके साथ ही लॉन्चिंग के बाद इन मिसाइलों की दिशा में परिवर्तन नहीं किया जा सकता है.
लेकिन हाइपरसोनिक मिसाइल के साथ लॉन्चिंग के बाद दिशा परिवर्तन संभव है. ये मिसाइल वायुमंडल में हाइपरसोनिक स्पीड से ग्लाइड करती हैं और अपने लक्ष्य की ओर बढ़ती हैं. चूंकि ये बैलिस्टिक मिसाइलों की तरह आर्क और प्रॉजेक्टाइल नहीं बनाती हैं, इस वजह से इनके लक्ष्य का पता लगाना काफ़ी मुश्किल होता है. ऐसे में ये एंटी मिसाइल डिफेंस सिस्टम की पकड़ में नहीं आती हैं."
सरल शब्दों में कहें तो अगर कोई मुल्क हाइपरसोनिक मिसाइल लॉन्च करता है तो उसे एंटी डिफेंस मिसाइल सिस्टम की मदद से रोकना लगभग नामुमकिन होगा.
क्योंकि इस तकनीक से लैस मिसाइलों की दिशा को लॉन्चिंग के बाद निर्देशित किया जा सकता है. ये मिसाइल राडार की पकड़ में भी नहीं आती हैं. इससे इन मिसाइलों के लक्ष्य को लेकर एक भ्रम की स्थिति पैदा होती है.

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अमेरिका के लिए चुनौती?
कथित मिसाइल लॉन्च की ख़बर आने के बाद कहा जा रहा है कि इसने अमेरिकी ख़ुफिया तंत्र को चौंका दिया है. चीन ने ऐसे किसी परीक्षण का खंडन किया है लेकिन मीडिया रिपोर्टों में किए गए दावों को लेकर कई विशेषज्ञ इस पर बात कर रहे हैं.
राहुल बेदी कहते हैं, "अमेरिका ने कभी ये नहीं सोचा होगा कि चीन अपने दम पर अपने टेक्नॉलॉजी बेस को इतना मजबूत कर लेगा कि वह ऐसी तकनीक विकसित कर सके. क्योंकि चीन ने पिछले 25-30 सालों में रिवर्स इंजीनियरिंग करके अपने मिसाइल सिस्टम से लेकर सैन्य साजो-सामान विकसित किए हैं. ऐसे में अमेरिका के लिए ये एक चौंकाने वाली बात रही होगी."
लेकिन क्या इसे अमेरिका के लिए एक चुनौती के रूप में देखे जाने की ज़रूरत है.
इस सवाल पर राहुल बेदी कहते हैं, "ये ख़बर सामने आने के बाद अमेरिका और चीन के बीच बराबरी का रिश्ता बन गया है.
इस टेस्ट से जुड़ी जानकारियां अब तक बाहर नहीं आई हैं. लेकिन फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट में जो कुछ सामने आया है, उसमें कह रहे हैं कि ये काफ़ी सफल रहा है.
हालांकि, वो कह रहे हैं कि चीनी मिसाइल लगभग 32 किलोमीटर की दूरी से पहले मिसाइल हिट कर गयी. मगर ये काफ़ी छोटी सी बात है.
ऐसे में इस टेस्ट से चीन की काउंटरिंग कैपेबिलिटी बढ़ गयी है. और अमेरिका के वन अपमैनशिप यानी दुनिया में नंबर वन मुल्क होने के दर्ज को चुनौती मिली है."
हालांकि, भारतीय सेना के पूर्व डायरेक्टर जनरल ऑफ़ आर्टिलरी पीआर शंकर मानते हैं, "फिलहाल इस ख़बर को ज़्यादा महत्व देने की ज़रूरत नहीं है. क्योंकि जिस भी मुल्क के पास स्पेस कार्यक्रम है, उसके पास हाइपरसोनिक तकनीक होती है. लेकिन इसे हथियार में बदलने के लिए ग्राउंड कंट्रोल सिस्टम के साथ - साथ सैटेलाइट, इंटीग्रेशन, और वॉरहेड के साथ - साथ एक पूरा सिस्टम चाहिए. और चीन अभी इससे काफ़ी दूर है."

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दुनिया के लिए ख़तरे की घंटी
अब से लगभग साठ साल पहले भी विश्व इतिहास में एक ऐसा मौका आया था जब 'अमेरिकी प्रभुत्व' को चुनौती दी गयी थी.
उस मौके को क्यूबा मिसाइल संकट के नाम से जाना जाता है जब अमेरिका और सोवियत संघ के बीच परमाणु युद्ध जैसे हालात पैदा हो गए थे.
लेकिन आख़िरकार दोनों देशों की ओर से रिश्तों में तनाव कम करने की कोशिश की गयी. और तमाम संधियां की गयीं जिससे परमाणु युद्ध के हालात बनने से रोके जा सकें.
मनप्रीत सेठी मानती हैं कि इन संधियों की बदौलत परमाणु युद्ध जैसे हालात को रोका जा सका था.
वह कहती हैं, "क्यूबा मिसाइल संकट के बाद दुनिया को ये समझ आया कि परमाणु हथियार अगर एक देश चलाएगा तो दूसरा देश भी चला सकता है जिसकी वजह से दोनों की तबाही हो सकती है. इसकी वजह से कई संधियां हुईं और परमाणु युद्ध टाले जा सके.
लेकिन साल 2001 में अमेरिका ने एबीएम ट्रीटी से खुद को बाहर करके एंटी मिसाइल डिफेंस सिस्टम बनाने शुरू किए. उसने तर्क दिया कि वह उत्तर कोरिया जैसे छोटे देशों से अपनी रक्षा करने के लिए डिफेंस सिस्टम बना रहा है.
लेकिन हुआ ये कि चीन और रूस भी इससे घबरा गए क्योंकि अगर अमेरिका ऐसा मिसाइल डिफेंस सिस्टम बना लेता है तो हमारी मिसाइल भी उन्हें तबाह नहीं कर सकती हैं. ऐसे में चीन और रूस ने हाइपरसोनिक मिसाइल पर काम शुरू किया. उन्होंने ये कदम ये मानते हुए उठाया कि अगर अमेरिका मिसाइल सिस्टम से अपनी रक्षा कर सकता है तो हमारी मिसाइल ऐसी होगी कि वह इंटरसेप्टर को चकमा देकर निशाने तक पहुंच जाएगी."
लेकिन सवाल ये उठता है कि इस मिसाइल से दुनिया के लिए किस तरह के ख़तरे पैदा होंगे.
मनप्रीत सेठी इसके जवाब में कहती हैं, "पहले ये व्यवस्था थी कि हम जब परमाणु युद्ध करना चाहेंगे तब ही युद्ध करेंगे. युद्ध शुरू करने का फैसला हमारे नियंत्रण में होता था. लेकिन मौजूदा तकनीक की वजह से एक भ्रमपूर्ण स्थिति पैदा हो जाती है. ये भ्रमपूर्ण स्थिति इस हथियार का एक्स फैक्टर भी है. और यही इसे दुनिया के लिए ख़तरनाक भी बनाता है.
क्योंकि हाइपरसोनिक मिसाइल परमाणु बम के साथ-साथ परंपरागत बम लॉन्च करने की क्षमता भी देता है. लेकिन आपने क्या लॉन्च किया है, ये सिर्फ आपको पता होगा. और क्राइसिस के दौर में व्यक्ति बुरे परिणाम की ही अपेक्षा करता है.
ऐसे में अगर दो देशों के बीच तनातनी बेहद गंभीर स्तर पर है, सेनाएं ट्रिगर रेडी मोड में हैं. और एक मुल्क हाइपरसोनिक मिसाइल लॉन्च करता है तो भ्रमपूर्ण स्थिति में परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र हाइपरसोनिक मिसाइल को परमाणु बम से लैस मानकर अपनी ओर से परमाणु बम लॉन्च कर सकता है जिससे आख़िर दोनों मुल्कों की ओर से न चाहते हुए भी परमाणु युद्ध शुरू हो सकता है."
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