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साहित्य का नोबेल पुरस्कार तंज़ानिया के लेखक अब्दुलरज़ाक को दिया गया
तंज़ानिया के उपन्यासकार अब्दुलरज़ाक गुरनाह ने साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद कहा है कि वो अचंभित हैं और विनम्रता से इसे सम्मान को स्वीकार करते हैं.
अब्दुलरज़ाक को साल 2021 के लिए साहित्य का नोबल दिया गया है.
स्वीडिश अकादमी ने गुनराह की 'बिना समझौता किए और दयाभाव से की गई उपनिवेशवाद के प्रभावों की व्याख्या' के लिए तारीफ़ भी की है.
स्वीडिश अकादमी नोबल पुरस्कार में विजेता को एक करोड़ स्वीडिश क्राउन देती हैं जो करीब 11 लाख चालीस हज़ार डॉलर के बराबर होते हैं.
73 वर्षीय गुनराह ने दस उपन्यास लिखे हैं जिनमें 'पेरेडाइज़' और 'डेज़र्शन' भी शामिल है.
पुरस्कार की घोषणा पर प्रतिक्रिया देते हुए गुनराह ने कहा कि वो अकादमी के दिल से आभारी हैं. उन्होंने कहा, "ये एक बहुत-बहुत बड़ा पुरस्कार है, और शानदार लेखकों की लंबी सूची है. इसमें शामिल होने के भाव को मैं अभी स्वीकार ही कर पा रहा हूं."
उन्होंने कहा, "ये मेरे लिए बिलकुल अचंभे जैसा है, इस पर विश्वास करने के लिए मैंने इसकी घोषणा हो जाने का इंतेज़ार किया."
गुनराह ने अपने नोबेल पुरस्कार को अफ़्रीकी लोगों, अफ़्रीका और अपने सभी पाठकों को समर्पित किया है.
'सच के लिए प्रतिबद्धता'
गुनराह का उपन्यास 'पेरेडाइज़' साल 1994 में प्रकाशित हुआ था. ये उपन्यास बीसवीं सदी की शुरुआत में तंज़ानिया में पल-बढ़ रहे एक लड़के की कहानी कहता है.
इससे पहले इस उपन्यास को बुकर पुरस्कार के लिए भी नामित किया गया था जिसके बाद लेखन गुनराह चर्चा में आ गए थे.
नोबेल पुरस्कारों की साहित्य समिति ने एक बयान में कहा है, "सच के लिए अब्दुलरज़ाक गुनराह की प्रतिबद्धता और सरलीकरण का उनका विरोध, दिल को छू जाता है."
"उनका उपन्यास रूढ़िवादी विवरण से विपरीत है और सांस्कृतिक विविधता वाले पूर्वी अफ़्रीका की तरफ हमारा ध्यान खींचता है, जहां से दुनिया के कई हिस्सों में रहने वाले लोग अपरिचित हैं. "
"उनके पात्र अपने आप को संस्कृतियों और महाद्वीपों में घिरा पाते हैं. वो अपनी मौजूदा ज़िंदगी और नया रूप लेते जीवन के बीच फंसे होते हैं. वो एक ऐसी असुरक्षित स्थिति में हैं जो कभी नहीं बदलती है."
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1948 में जांज़ीबार में पैदा हुए गुनराह 1960 के दशक में एक शरणार्थी के रूप इंग्लैंड पहुंचे थे.
हाल ही में रिटायर होने से पहले तक वो कैंटरबरी की यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैंट में इंग्लिश और उपनिवेशवाद के बाद के साहित्य के प्रोफ़ेसर थे.
गुनराह से पहले 1986 में अफ्रीकी मूल के अश्वेत लेखक वूले सोयिंका ने नोबल पुरस्कार जीता था. उनके बाद से ये पुरस्कार जीतने वाले गुनराह पहले अफ़्रीकी लेखक हैं.
उन्होंने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि ये पुरस्कार मिलने के बाद शरणार्थी संकट और उपनिवेशवाद जैसे मुद्दे पर चर्चा होगी. गुनराह ने अपने जीवन में इससे जुड़ी मुश्किलों का सामना किया है.
वो कहते हैं, "ये वो चीज़ें हैं जो रोज़ हमारे साथ रहती हैं. लोग मर रहे हैं, दुनिया भर में लोगों को तकलीफ़ पहुंचाई जा रही है- हमें सबसे संवेदनशील तरीके से इन मुद्दों से निपटना होगा."
'कहीं ज़्यादा हिंसक'
गुनराह कहते हैं, "मैं ऐसे समय इंग्लैंड आया जब ये शब्द- शरण मांगने वाला- के मायने आज जैसे नहीं थे. आज पहले से कहीं अधिक संख्या में लोग जीवन के लिए संघर्ष कर रहे हैं और आतंकवाद में घिरे देशों से भाग रहे हैं."
"आज दुनिया 1960 के दशक से कहीं ज़्यादा हिंसक है, ऐसे में अब उन देशों पर अधिक दबाव है जो सुरक्षित हैं, अधिक संख्या में लोग उनकी तरफ़ आ रहे हैं."
2016 में जब एक साक्षात्कार में उनसे पूछा गया था कि क्या वो खुद को उपनिवेशवाद के बाद का लेखक कहेंगे या विश्व साहित्य का लेखक कहेंगे. इसके जवाब में गुनराह ने कहा था कि, "मैं दोनों में से किसी का भी इस्तेमाल नहीं करूंगा, मैं अपने आप को किसी तरह का लेखक नहीं कहूंगा."
"वास्तव में, मैं इस बात को लेकर निश्चिंत नहीं हूं कि मैं अपने आपको अपने नाम के अलावा और कुछ कहूंगा. यदि कोई इस मामले में चुनौती देता है तो ये भी ये कहने का एक और तरीका ही होगा कि क्या आप इन सबमें से एक हैं. मैं संभवत कहूंगा कि नहीं."
साल 1901 से दिए जा रहे नोबेल पुरस्कार साहित्य, विज्ञान, शांति और अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में उपलब्धियों का सम्मान करते हैं.
इससे पहले अर्नेस्ट हेमिंग्वे, गैबरिएल गार्सिया मार्केज़ और टोनी मॉरिसन जैसे लेखकों को साहित्या का नोबल पुरस्कार मिल चुका है. इनके अलावा पाब्लो नेरूदा, जोसेफ़ ब्रॉड्स्की और रविंद्रनाथ टैगोर जैसे कवियों और हैरॉल्ड पिंट और यूजीन ओनील जैसे नाटककारों को भी ये पुरस्कार दिया गया है.
वहीं पूर्व ब्रितानी प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल को उनके संस्मरणों, बॉब डिलन को उनके गीतों और बर्ट्रांड रसेल को उनके दर्शन के लिए ये पुरस्कार मिल चुका है.
पिछले साल साहित्य का नोबेल पुरस्कार अमेरिकी कवि लुइस ग्लक को मिला था.
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