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नौरा की कहानी: बलात्कार, पति की हत्या और माफ़ी
- Author, मोहम्मद उस्मान
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, अरबी सेवा (सूडान से)
19 साल की नौरा हुसैन की ज़िंदगी में आख़िरकार वो 'चमत्कार' हुआ, जिसकी आस उनके माता-पिता लगाए बैठे थे. अब नौरा को फांसी नहीं होगी.
नौरा वही लड़की हैं जिन्होंने बलात्कार की कोशिश करने वाले अपने पति को जान से मार दिया था. पति की जान लेने के जुर्म में सूडान की एक इस्लामिक अदालत ने उन्हें मौत की सज़ा सुनाई थी लेकिन अब उन्हें ये सज़ा नहीं होगी. सूडान की ही एक अदालत ने उनकी फ़ांसी की सज़ा के फ़ैसले को पलट दिया है.
नौरा की मां ज़ैनब अहमद ने बीबीसी से कहा कि वो ख़ुश हैं कि उनकी बेटी की ज़िंदगी बच गई.
जबरन शादी कराई गई थी
अपने आठ भाई-बहनों में नौरा दूसरे नंबर पर थीं. उनका गांव अल बागेर नील नदी से ज़्यादा दूर नहीं था. नौरा की मां के मुताबिक उनकी बेटी हमेशा से शांत और बुद्धिमान थी. उन्होंने कहा, "नौरा महात्वाकंक्षी थी. वो कानून की पढ़ाई करना चाहती थी."
नौरा के पिता की एक छोटी सी दुकान थी जिससे उनकी पढ़ाई का खर्च जैसे-तैसे निकल जाता था और वो इसी में ख़ुश हो जाती थीं. साल 2015 में चीजें अचानक से बदल गईं जब नौरा के 32 साल के चचेरे भाई अब्दुल रहमान मोहम्मद हम्मद ने उनसे शादी का प्रस्ताव रखा. उस वक़्त नौरा की उम्र सिर्फ 16 साल थी.
नौरा उस वक़्त शादी के लिए तैयार नहीं थीं लेकिन उनके पिता और रिश्तेदारों ने उन पर दबाव बनाया.
पति के करीब नहीं आना चाहती थीं
सूडान के समाज में लड़कियों की शादी जल्दी हो जाती है. नौरा के पिता ने कहा कि वो नहीं चाहते कि वो नाजायज तरीके से गर्भवती हो जाएं. आखिरकार उनकी शादी करा दी गई.
शादी के तुरंत बाद नौरा अपने पति के साथ जिस्मानी रिश्ते नहीं बनाना चाहती थीं. सीएनएन की रिपोर्ट में नौरा की गवाही का ज़िक्र है जिसमें कहा गया है कि शादी के पहले हफ़्ते में उन्होंने अब्दुल को करीब आने से रोका.
नौरा रोती रहती थीं, उन्होंने खाना-पीना छोड़ दिया और जब अब्दुल नींद में होते वो घर से भागने की कोशिश करतीं.
सीएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक, नौवें दिन अब्दुल अपने कुछ रिश्तेदार पुरुषों के साथ घर में घुसे और उन्होंने मिलकर नौरा के कपड़े फाड़ दिए. अब्दुल ने अपने रिश्तेदारों के साथ मिलकर नौरा का बलात्कार किया.
उस दिन क्या हुआ था?
अगले दिन अब्दुल ने फिर बलात्कार की कोशिश की. इस बार चाकू उठा लिया क्योंकि वो ख़ुद को मारना चाहती थी. अब्दुल और नौरा के बीच झड़प हुई और अब्दुल ने उन्हें कंधे पर दांत से काटा. इसके बाद नौरा ने अब्दुल को चाकू मार दिया.
चाकू मारकर वो अपने माता-पिता के घर भाग आईं और बाद में अब्दुल की मौत हो गई.
नौरा की मां का कहना है कि बलात्कार के बाद उन्हें ख़ुद से नफ़रत हो गई थी और वो ख़ुदकुशी करना चाहती थीं लेकिन उस दिन किस्मत पलट गई और वो अब्दुल को चाकू मार बैठीं.
आख़िर जीत मिली
शरिया (इस्लामिक कानून) कानून में इसे जानबूझकर किया गया अपराध माना गया और इस मामले में नौरा को फांसी की सज़ा सुनाई गई. नौरा की सज़ा की ख़बर मीडिया में आते ही मानवाधिकार और महिलाओँ के लिए काम करने वाले समूहों ने इसकी निंदा करनी शुरू कर दी.
उन्हें बचाने के लिए सोशल मीडिया पर #JusticeforNoura नाम से पोस्ट्स लिखी जाने लगीं. इस मुहिम को एमा वॉटसन और नाओमी कैंपबेल जैसे सितारों ने भी आगे बढ़ाया और दुनिया भर में इस पर चर्चा होने लगी.
एमनेस्टी इंटरनैशनल ने जब अपने समर्थकों से सूडान के न्यायमंत्री को इस बारे में ईमेल लिखने को कहा तो उनके पास इतने ईमेल पहुंचे कि उन्हें अपना ई-मेल अड्रेस बदलना पड़ा.
आख़िरकार जीत नौरा की हुई और सूडान की अदालत ने उनकी फांसी की सज़ा वाले फ़ैसले को पलट दिया. अब नौरा को सिर्फ पांच साल की जेल होगी.
(मेघा मोहन के इनपुट्स के साथ, ग्राफ़िक्स: केटी हॉर्विच)
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