अमेरिका में बढ़ रहे बीफ़ के दाम, कैसे निबटेंगे राष्ट्रपति जो बाइडन?

- Author, डेनियल थॉमस
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
न्यूयॉर्क सिटी के क्वींस इलाक़े के 'लिटिल इंडिया' में अधिकतर दक्षिण एशियाई प्रवासी रहते हैं. यहां ये हर रोज़ की तरह एक व्यस्त दिन है. लेकिन अल नूर मीट मार्केट में थोड़ी ख़ामोशी है. ये 73वीं स्ट्रीट पर एक हलाल मीट शॉप है.
ग्राहकों के न आने की वजह कोविड नहीं बल्कि मांस के दाम हैं जो हाल के महीनों में अमेरिका में काफ़ी बढ़ चुके हैं.
दुकान पर कसाई का काम करने वाले 36 वर्षीय शकील अंजुम कहते हैं कि थोक बाज़ार में बकरे के गोश्त का दाम प्रति पौंड (453.59 ग्राम) 8 डॉलर से बढ़कर 10 डॉलर हो गया है जबकि बीफ़ का दाम 5 डॉलर से बढ़कर 6 डॉलर हो गया है.
शकील अंजुम कहते हैं, "जब दाम बढ़ते हैं तो लोग कम खाते हैं, दुकान ने अपने दाम कम रखे हैं ताकि कुछ ग्राहक आएं फिर भी काम बहुत मंदा है."
दुकान पर काम करने वाले 50 वर्षीय रज़ा जावेद कहते हैं कि बड़े मांस सप्लायर इसके लिए ज़िम्मेदार हैं.
वे कहते हैं, "वो सब मिल गए हैं और दाम बढ़ा दिए हैं. हम कुछ नहीं कर सकते हैं क्योंकि हमारे पास कोई ताक़त नहीं है."
कोरोना महामारी के बाद जब से बाज़ार खुले हैं, कारों से लेकर कपड़ों तक, हर चीज़ के दाम बढ़े हैं. लेकिन मांस के दामों में बढ़ोतरी असामान्य है.
दिसंबर 2020 के बाद से बीफ़ का दाम 14 प्रतिशत बढ़ चुका है, पोर्क 12.1 प्रतिशत बढ़ा है जबकि मुर्गा के मांस की कीमत 6.6 प्रतिशत बढ़ी है.
उपभोक्ता लगातार बढ़ रहे राशन के बिल को लेकर चिंतित हैं. व्हाइट हाऊस ने कहा है कि वह महंगाई रोकने के लिए क़दम उठाने जा रही है.
व्हाइट हाउस का कहना है कि समस्या की वजह ये है कि अमेरिका में मांस आपूर्ति पर कुछ बड़ी प्रोसेसिंग कंपनियों का नियंत्रण है. ऐसे में ये कंपनियां मनमर्ज़ी के दाम वसूलती हैं.

जुलाई में सरकार की ओर से जारी एक आदेश में राष्ट्रपति ने मीट प्रोसेसिंग कारोबार में नए खिलाड़ियों को मौका देने के लिए 50 करोड़ डॉलर के फेडरल लोन की घोषणा की थी ताकि वे बड़े खिलाड़ियों को प्रतिद्वंद्विता दे सकें और दाम कुछ कम हो सके.
प्रशासन मुर्गा प्रोसेसिंग उद्योग में दाम फिक्स किए जाने की जांच भी कर रहा है. कोलोराडो स्थित एक सप्लायर पिलग्रिम्स प्राइड पर 10 करोड़ 70 लाख डॉलर का जुर्माना भी लगाया गया है.
यही नहीं सरकार मीट उद्योग में प्रतियोगिता बढ़ाने के लिए क़ानूनों को भी सख़्त करने जा रही है.
इस सबसे बावजूद प्रशासन का कहना है कि बड़े मीट प्रोसेसर फिर भी 'बच रहे हैं' और उन्होंने बाज़ार के नियमों को ग़लत समझा है.
बीफ़ को लेकर चिंताएं क्यों?
अमेरिका के लिए मांस के दामों से जुड़ी चिंताएं नई नहीं हैं. 1921 में राष्ट्रपति वुडरो विल्सन ने पैकर्स एंड स्टॉकयार्ड्स एक्ट पारित किया था. अभी भी प्रभावी इस क़ानून का मक़सद बड़े मांस प्रोसेसरों को नियंत्रित करना था जो उस समय दाम नियंत्रित कर रहे थे.
1973 में राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने बीफ़, पोर्क और बकरे के गोश्त के दामों की सीमा निर्धारित की थी क्योंकि दाम आसमान छू रहे थे.
इन प्रावधानों से कुछ हद तक दाम नियंत्रित करने में कामयाबी मिली थी लेकिन 1980 के दशक के बाद से मांस प्रोसेसिंग उद्योग बहुत मज़बूत हुआ है और नियामक तेज़ी से बदलते उद्योग को नियंत्रित करने में संघर्ष करते रहे हैं.
अमेरिका में चार बड़ी कंपनियां जेबीएस, कार्गिल मीट सॉल्यूशन, टॉयसन फ़ूड्स और नेशनल बीफ़ पैकिंग कंपनी ही अलग-अलग मांस के बाज़ार के 55 से 85 फ़ीसदी हिस्से को नियंत्रित करती हैं.
वहीं 1970-80 के दशक में इन चारों बड़ी कंपनियों की हिस्सेदारी सिर्फ़ 25-35 प्रतिशत थी.
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व्हाइट हाऊस का कहना है कि ये बड़ी हिस्सेदारी इन बड़ी कंपनियों के हाथ में बहुत ज़्यादा ताक़त देती है. वो सिर्फ़ ये ही तय नहीं करते हैं कि वो दुकानदारों और रेस्त्रां से क्या वसूलेंगे बल्कि वो ये भी तय करते हैं कि वो छोटे पशु किसानों को क्या क़ीमत देंगे.
महामारी के दौरान ये समस्या और भी बड़ी हो गई क्योंकि मीट की मांग रिकॉर्ड स्तर तक बढ़ गई थी. इसकी दो वजहें थीं, एक तो ये कि लोग इकट्ठा कर रहे थे और दूसरी ये कि लोग ज़्यादा खा रहे थे.
थोक के बाज़ार में तो मांस के दाम बढ़े लेकिन पॉल्ट्री और पशुओं के दाम कम हुए और किसान फ़ायदा नहीं कमा पाए.
इसी बीच मांस की प्रोसेसिंग करने वाली बड़ी कंपनियों ने रिकॉर्ड मुनाफ़ा अर्जित किया. सरकार ने इन कंपनियों पर महामारी के दौरान फ़ायदा उठाने के आरोप भी लगाए.
इंडियाना की नोट्रे डेम यूनिवर्सिटी में पर्यावरण इतिहास के प्रोफ़ेसर जोशुआ स्पेक्ट कहते हैं, "1980 के बाद से हमने प्रोसेसिंग उद्योग का बिना किसी निगरानी केंद्रीकरण कर रखा है और यही समस्या है. मीट पैक करने वाली कंपनियां अमेरिका में खाद्य बाज़ार के अधिक से अधिक हिस्से पर कब्ज़ा किए जा रही हैं."
वहीं मीट उद्योग इन आरोपों को सिरे से ख़ारिज करते हुए कहता है कि दाम बढ़ने की वजह जमाखोरी नहीं है. मीट उद्योग से जुड़ी कंपनियों का कहना है कि महामारी की वजह से श्रमिक नहीं मिल पाए और प्लांट बंद करने पड़े जिसकी वजह से दाम बढ़े हैं.
टॉयसन फुड्स ने एक बयान में कहा, "बाज़ार को लगे की अप्रत्याशित झटके जिनमें महामारी की वजह से हुई वैश्विक मंदी और भीषण मौसम हालात शामिल थे, की वजह से मीट प्रोसेसर अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं कर पाए."
बयान में कहा गया, "इसकी वजह से ज़िंदा जानवरों की आपूर्ति अधिक तादाद में हुई और बीफ़ की सप्लाई प्रभावित हई जबकि बीफ़ उत्पादों की मांग रिकॉर्ड स्तर पर ऊंची थी. इसी वजह से जानवरों की क़ीमतें गिरीं और मांस की क़ीमतें बढ़ीं. अब पशुपालकों को दिए जा रहे दाम बढ़ रहे हैं."

लेकिन ब्रैंट केंज़ी जैसे रेंच संचालक इससे संतुष्ट नहीं है. उन्हें लगता है कि बाज़ार में पर्याप्त प्रोसेसिंग कंपनियां नहीं हैं जिनके बीच पशुओं को ख़रीदने की प्रतिद्वंदिता हो. इसकी वजह से कई बार उन्हें अपने जानवर उसी दाम पर बेचने पड़ते हैं जो जिसका इकलौता प्रस्ताव उन्हें दिया जाता है.
कई पशुपालकों की तरह उन्हें भी लगता है कि बड़ी मांस प्रोसेसिंग कंपनियां जानबूझकर पशुपालकों के लिए ऐसे हालात बनाती हैं. हालांकि कंपनियां इन आरोपों को ख़ारिज करती हैं.
साउथ डकोटा में तीन हज़ार पशुओं को पालने वाले ब्रैट केंज़ी बाइडन प्रशासन के इस क्षेत्र को अधिक प्रतियोगी बनाने के फ़ैसले का स्वागत करते हैं.
वे कहते हैं कि सस्ते पशु और महंगे मीट का ट्रेंड उन्हें साल 2015 से नुक़सान पहुंचा रहा है.
वे कहते हैं, "हमारे लिए हालात बहुत मुश्किल हैं, हाल के सालों में चुनिंदा मौके पर हमें कुछ फ़ायदा हुआ है लेकिन नुक़सान बहुत ज़्यादा हुआ है. हम बस मेहनत कर रहे हैं, मिल कुछ नहीं रहा है."
49 वर्षीय ब्रैट कई बार रेंच को बेचने के बारे में सोचते हैं लेकिन इसे लेकर लगाव उन्हें रोकता है. ये रेंच उनके परिवार के पास चार पीढ़ियों से है और वो इसे अपने बच्चों को सौंपना चाहते हैं.
वे कहते हैं, "मुझे उम्मीद बनाए रखना है कि हम कोई न कोई रास्ता निकाल लेंगे."
अमेरिका में स्वतंत्र पशुपालकों का समूह आर-कॉल्फ़ यूएसए अब चारों बड़ी मांस प्रोसेसिंग कंपनियों के ख़िलाफ़ मुक़दमा जारी करने जा रहा है. समूह ने इन कंपनियों पर पशुओं के दाम कम रखने की साज़िश करके मुनाफ़ा बढ़ाने का आरोप लगाया है.
टायसन का कहना है कि ये दावा आधारहीन है जबकि कार्गिल का कहना है कि इसमें तथ्य नहीं है.
आर-कॉल्फ़ यूएसए का कहना है कि कम दाम की समस्या की वजह से अमेरिका में कैटल फॉर्म बंद हो रहे हैं. संस्था के मुताबिक़ हर साल क़रीब 17,000 पशुपालन फार्म देशभर में बंद हो रहे हैं क्योंकि वो मुनाफ़ा नहीं कमा पाते.
आर-कॉल्फ़ के मुख्य कार्यकारी अधिकारी बिल बुलफर्ड कहते हैं, "इसने हमारे ग्रामीण समुदायों को खोखला कर दिया है और उनके लिए कोविड से उबर पाना मुश्किल हो गया है."

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क्या बाइडन की योजना काम कर पाएगी?
बाइडन प्रशासन अपनी योजना को आगे बढ़ा रहा है. प्रशासन ने कहा है कि वह छोटे उत्पादकों, प्रोसेसिंग कंपनियों, वितरकों, किसान बाज़ारों और सीफुड प्रोसेसरों को 1.4 अरब डॉलर की अतिरिक्त मदद जारी करेगा ताकि अमेरिका की फ़ूड सप्लाई चेन अधिक मज़बूत हो.
यही नहीं प्रशासन कांग्रेस के साथ मिलकर पशुओं के दामों में अधिक पारदर्शिता लाने के लिए भी काम कर रहा है.
इन प्रयासों के बावजूद कई विश्लेषकों को इस योजना की कामयाबी पर शक है. वे चेतावनी देते हैं कि छोटे मीट प्रोसेसिंग प्लांट बड़ी कंपनियों के साथ कभी मुक़ाबला नहीं कर सकते. 50 करोड़ डॉलर का जो फंड जारी किया जा रहा है उससे छोटी कंपनियां लंबी दूरी तय नहीं कर पाएंगी.
कांसास स्टेट यूनिवर्सिटी में कृषि अर्थशास्त्री ग्लेन टोंसर कहते हैं कि मीट को दामों को सिर्फ़ जमाखोरी ही नहीं बल्कि कई अन्य कारक भी प्रभावित करते हैं.
उन्हें उम्मीद है कि अभी बढ़े हुए दाम समय के साथ अपने आप ही कम हो जाएंगे.
वहीं जोश स्पेक्ट कहते हैं कि सरकार एक पुरानी समस्या का नया समाधान खोजने की कोशिश कर रही है और ये स्वागत योग्य क़दम है.
वे कहते हैं, "रेंच संचालक तो सैकड़ों सालों से शिकायत करते रहे हैं, अब बड़े दामों ने ग्राहकों को प्रभावित किया है तो ये राजनीतिक मुद्दा बन गया है."
"प्रशासन एक बेहद शक्तिशाली उद्योग में बदलाव लाने की कोशिश कर रहा है, ये अमेरिका की अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, इसमें सुधार में निश्चित तौर पर वक़्त तो लगेगा ही."
ब्रैट कैंज़ी को भी लगता है कि प्रशासन ने सही दिशा में क़दम उठाए हैं. वे उम्मीद करते हैं कि प्रशासन इस पर आगे भी ध्यान देगा.
कैंज़ी कहते हैं, "अगर हम मीट पैक करने वाली कंपनियों के एकत्रीकरण को चुनौती नहीं देंगे तो फिर कोई और उन्हें प्रतिद्वंद्विता नहीं दे पाएगा. या तो हमें एक न्यूनतम स्तर की प्रतियोगिता देनी होगी या फिर हमें एंटी-ट्रस्ट क़ानून के तहत अपने अधिकार लागू करने होंगे."
"यदि इसका मतलब इन क़ानूनों को तोड़ना है तो फिर यही सही."
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