जब काबुल के दौरे पर गए एक पाकिस्तानी फ़ोटोग्राफ़र का अफ़ग़ान परिवार ने 'नमस्ते' कहकर किया स्वागत

ज़ाहिद अली ख़ान, काबुल, अफ़ग़ानिस्तान

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    • Author, फ़ैज़ुल्लाह ख़ान
    • पदनाम, पत्रकार, बीबीसी उर्दू के लिए

वैसे तो मैं पाकिस्तान की एक शांति समिति के साथ काबुल गया था लेकिन मैंने उस मौक़े का इस्तेमाल वहां के लोगों के साथ मेलजोल बढ़ाने के लिए किया. उसके बाद मुझे ये अहसास हुआ कि जंग की मार झेल चुके काबुल शहर के अंदर एक और ही काबुल बसा है.

एक पेंटर के घर मेरा स्वागत 'नमस्ते' कह कर किया गया.

घर की लड़कियों को हिंदी फ़िल्मों का बेहद शौक था. उसी से वो टूटी-फूटी हिंदी और उर्दू बोलना सीख गई थीं. जब उनसे बताया गया कि मैं मुसलमान हूं और वो मुझे सलाम कर सकती हैं तो उनमें से एक कहने लगीं, "हमने सोचा कि शायद पाकिस्तान में भी सलाम को नमस्ते कहते हैं."

ज़ाहिद अली ख़ान डरे हुए लेकिन जीवन से भरपूर उस परिवार को याद करते हुए कहते हैं, "मुलाक़ात के बाद, ये महसूस हुआ कि वो एक आधुनिक परिवार था. जब मैंने उनकी तस्वीरें लीं तो वे सभी बहुत ख़ुश हुए. फिर मेरी उन सबसे दोस्ती हो गई और बच्चे तो मेरे अच्छे दोस्त बन गए. वो मेरे आस-पास ही हंस-खेल रहे थे."

एक पाकिस्तानी पत्रकार और फ़ोटोग्राफ़र के आने की ख़बर पूरे मोहल्ले में फैल गई, जिसके बाद 'हर दिन एक नया परिवार मुझसे मिलने आता.'

ज़ाहिद अली ख़ान, काबुल, अफ़ग़ानिस्तान

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इमेज कैप्शन, लगभग 15-16 साल की तराना और नग़मा मेज़बान पेंटर की दो बेटियां थीं. ज़ाहिद अली ख़ान के अनुसार 'वो दोनों ही मेरी अनुवादक थीं. वो हिंदी फ़िल्में देखती थीं, इसलिए उर्दू बोल-समझ सकती थीं.'

सोच से अलग था काबुल

ज़ाहिद अली ख़ान को उनकी मुलाक़ात के दौरान जो काबुल देखने को मिला, वो उनकी सोच से बहुत अलग था.

वह कहते हैं, "महिलाएं तब भी बाज़ारों में नज़र नहीं आती थीं, लेकिन काबुल के रिहायशी इलाकों में माहौल अलग था. सड़कों पर लड़ाके घूमते थे, लेकिन काबुल की गलियों के भीतर जीवन अलग था. हालांकि वो जीवन डरा और सहमा हुआ था. अफ़ग़ानिस्तान के बारे में मैंने सोचा था कि वहां हर जगह मुजाहिदीन होंगे, लेकिन वहां लड़कियों ने जींस और टी-शर्ट पहन रखी थी. जिस फ़ोटोग्राफ़र के घर मैं गया था, उनके एक रिश्तेदार रेडियो काबुल के वरिष्ठ संपादक थे. वे सभी पढ़े-लिखे लोग थे."

इन मुलाक़ातों से, ज़ाहिद को पता चला कि काबुल के नागरिकों के विचार बहुत अलग हैं. उन्हें इस बात में कोई दिलचस्पी नहीं थी कि पहले वहां किसकी सरकार थी या अब कौन आएगा? वे सिर्फ़ शांति और अपने जीवन की सुरक्षा चाहते थे.

ज़ाहिद अली ख़ान, काबुल, अफ़ग़ानिस्तान

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इमेज कैप्शन, ज़ाहिद अली ख़ान को जो काबुल देखने को मिला, वो उनकी कल्पना से बहुत अलग था.

शहर के लोगों और लड़ाकों के बीच का तनाव

ज़ाहिद के मुताबिक़, जब मुजाहिदीन काबुल में दाख़िल हुए तो लूटपाट की ख़बरें आने लगीं.

"मुजाहिदीन के साथ काबुल के नागरिकों का पहला अनुभव बहुत बुरा रहा. इसकी वजह से वो उस क्रांति से नफ़रत करते थे, जो रूस विरोधी विचारधारा से निकली थी."

उनके अनुसार, काबुल के नागरिकों और मुजाहिदीन के बीच एक अंतर अलग विचारधाराओं का भी था.

वो कहते हैं, "मुजाहिदीन लड़ाकों की या तो ग्रामीण पृष्ठभूमि थी या वो पहली बार शहर आये थे. काबुल के नागरिक उनसे नफ़रत करते थे और चाहते थे कि मुजाहिदीन तुरंत काबुल छोड़ दें. मुझे अब भी लगता है कि अफ़ग़ानिस्तान के शहरी इलाक़े अलग तरह से सोचते हैं."

ज़ाहिद के अनुसार, रूस और अमेरिका के ख़िलाफ़ लड़ने वालों में से अधिकांश ग्रामीण पृष्ठभूमि के थे. हालांकि काबुल के नागरिकों को इस्लाम से कोई समस्या नहीं थी, और वे पश्चिमी सभ्यता से भी प्रभावित थे क्योंकि उनके परिवार के बहुत से लोग जर्मनी, चेकोस्लोवाकिया और रूस में रहते थे.

वो कहते हैं, "जिस परिवार से मेरी दोस्ती हुई, उस परिवार के 15 से 20 लड़के और लड़कियां रूस में पढ़ रहे थे. उन दिनों एक युवक आया हुआ था, जिसने मुझे बताया कि रूस में उन्हें मुफ़्त शिक्षा और छात्रवृति मिलती है, और निश्चित रूप से जब इतनी सुविधाएं मिल रही हों, तो उस मुल्क से बेहतर संबंध भी बनता है."

ज़ाहिद अली ख़ान, काबुल, अफ़ग़ानिस्तान

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इमेज कैप्शन, कैमरा होने के कारण राष्ट्रपति भवन के सुरक्षा कर्मचारियों से ज़ाहिद अली ख़ान की दोस्ती हो गई थी.

मुजाहिदीन के समय का वीडियो मार्केट

ज़ाहिद अली ख़ान कहते हैं कि एक दिन जब वे राष्ट्रपति भवन में थे, तो उनके साथ रहने वाले गार्ड को आदेश दिया गया कि बाज़ार से जेनरेटर ख़रीद कर ले आए.

वो बताते हैं, "मैंने उनके साथ जाने की इच्छा ज़ाहिर की तो गार्ड मान गए. वहां मैंने एक दिलचस्प नज़ारा देखा. गार्ड ने पांच-छह बोरे नोट भरकर कार की डिग्गी में रखे, जिनकी क़ीमत क़रीब चौदह हज़ार पाकिस्तानी रुपये थी."

गार्ड के साथ बाज़ार पहुंचने के बाद ज़ाहिद अली ख़ान के लिए सबसे ज़्यादा हैरान करने वाला मंज़र एक वीडियो शॉप थी.

ज़ाहिद अली ख़ान, काबुल, अफ़ग़ानिस्तान

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इमेज कैप्शन, काबुल में ज़ाहिद के मेज़बान पेंटर

ज़ाहिद अली ख़ान कहते हैं, "मैंने गार्ड से कार रोकने को कहा. मुजाहिदीन के होते हुए वीडियो शॉप का क्या काम? जब मैं इसे देखने गया तो मेरे सामने एक संकरी-सी गली थी, जहां बहुत सारी वीडियो शॉप थीं. ठीक वैसे ही जैसे कराची के रेनबो सेंटर में होती थी. इस बाज़ार में ख़ूब भीड़ थी और लाइन से छोटी-छोटी दुकानें थी, जहां हिंदी फ़िल्मों की भरमार थी. तब मुझे अंदाज़ा हुआ कि काबुल की शहरी आबादी भारतीय संस्कृति से कितनी प्रभावित है. शायद यही वजह थी कि नमस्ते कह कर मेरा स्वागत किया गया."

वो बताते हैं, "मैंने सुना था कि अफ़ग़ानिस्तान में रूस से आई चीज़ें सस्ते दाम में मिल जाती हैं. राष्ट्रपति भवन के सुरक्षाकर्मियों के साथ मैं एक ऐसे ही बाज़ार में गया, जहां मुझे पुराने समय के सामान वाली एक दुकान दिखी. दुकानदार ने मेरा बहुत ही गर्मजोशी से स्वागत किया."

"वहां से, मैंने कुल 200 पाकिस्तानी रुपये में एक रूस निर्मित जेनॉक्स कैमरा और 15 फिल्टर ख़रीदे. इसी तरह एक बाज़ार में एक महिला ने ज़बरदस्ती मेरे हाथ में एक बहुत ही महंगी चादर रख दी, जिसे मैंने सस्ते में ख़रीदा, हालांकि उसकी क़ीमत ज़्यादा होनी चाहिए थी."

ज़ाहिद अली ख़ान, काबुल, अफ़ग़ानिस्तान

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'वहां प्रतिनिधिमंडल के साथ गया था'

मैं अपने परिवार को बिना बताए कराची से काबुल आया था. वहां पहुंचकर राष्ट्रपति भवन की छत पर लगे विशेष वायरलेस सेट जैसे टेलीफ़ोन से मैंने अपने परिवार को इसकी सूचना दी.

फरवरी, 1993. सोवियत संघ की हार को एक साल बीत चुका था, लेकिन अफ़ग़ानिस्तान में स्थिति अभी भी तनावपूर्ण थी.

काबुल में, बुरहानुद्दीन रब्बानी के नेतृत्व में एक अंतरिम सरकार विभिन्न मुजाहिदीन समूहों के बीच गृहयुद्ध के हालात नियंत्रित करने की कोशिश कर रही थी. गुलबुद्दीन हिकमतयार के हिज़्ब-ए-इस्लामी का कहना था कि देश में चुनाव होने चाहिए, पर राष्ट्रपति रब्बानी इस्तीफ़ा देने को तैयार नहीं थे.

इस संकट को सुलझाने के लिए जमात-ए-इस्लामी के प्रमुख काज़ी हुसैन अहमद के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल पाकिस्तान से काबुल आया था. अगले 27 दिनों तक उन्होंने अफ़ग़ान नेताओं से मुलाक़ात की और दोनों पक्षों के बीच सुलह कराने की कोशिश करते रहे.

इस प्रतिनिधिमंडल में राजनीतिक और सैन्य हस्तियों के अलावा कराची से मैं (यानी 30 वर्षीय ज़ाहिद अली ख़ान) बतौर फ़ोटोग्राफ़र शामिल हुआ था. उन्हें यूनिवर्सिटी के एक वरिष्ठ मित्र के ज़रिये वार्ता को कवर करने के लिए बुलाया गया था.

यात्रा की तैयारी के दौरान उन्होंने अपने साथ एक पोलारायड कैमरा भी रख लिया था. लेकिन उन्हें नहीं पता था कि ये कैमरा उनके लिए एक ऐसी चाबी साबित होगा जो न केवल उनके लिए राष्ट्रपति भवन के बंद दरवाज़े खोलेगा बल्कि इसके चलते लड़ाकों से भी उनकी दोस्ती होगी और काबुल के आम लोगों के घरों में वो मेहमान बन सकेंगे.

ज़ाहिद अली ख़ान, काबुल, अफ़ग़ानिस्तान

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पेशावर से काबुल की विमान यात्रा

प्रतिनिधिमंडल को फरवरी की शुरुआत में पेशावर हवाई अड्डे से काबुल के लिए रवाना होना था. इसमें काज़ी हुसैन अहमद के अलावा जनरल हामिद गुल और ईरान और सऊदी अरब के राजनयिक भी शामिल थे.

यात्रा भी एक मज़ाकिया घटना के साथ शुरू हुई. अफ़ग़ानिस्तान के विमान के पायलट और सह-पायलट उड़ान से पहले विमान की जांच के दौरान उसके पहियों पर ठोकर मारकर उसकी हवा चेक करते दिखाई दिए.

फिर उन दोनों ने लोहे की एक छोटी सी सीढ़ी दरवाज़े से लगा दी, ताकि यात्री विमान में चढ़ सकें. इसे देखकर प्रतिनिधिमंडल के कई सदस्यों ने सवाल किया, "ये विमान अपने गंतव्य तक पहुंच भी पाएगा या नहीं."

इस यात्रा ने कइयों को कराची की किसी मिनीबस की यादें ताज़ा करा दीं. मालवाहक विमान की तरह उस विमान में भी कुर्सियों की जगह बेंच लगी थी. उस यात्रा को किसी भी तरह आरामदायक नहीं कहा जा सकता.

काबुल हवाईअड्डा

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इमेज कैप्शन, काबुल हवाईअड्डे का नज़ारा, जहां ये समझ नहीं आ रहा था कि विमान उतरेगा कहां.

शांति समिति को राष्ट्रपति भवन में ठहराया गया

काबुल एयरपोर्ट पर सुरक्षित उतरने के बाद सभी ने राहत की सांस ली. प्रतिनिधिमंडल के आने की पूर्व सूचना के कारण, काबुल और उसके आसपास युद्ध कर रहे मुजाहिद समूहों ने दो घंटे के युद्धविराम की घोषणा की थी.

शांति समिति की इस टीम को राष्ट्रपति भवन में ठहराया गया था लेकिन पांच-छह दिनों में ही मैं राजभवन के माहौल से उकता गया था.

"मुझे वहां रहने में कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं थी. मैंने सोचा कि मैं गलियों-बाज़ारों में घूमकर आम लोगों से मिलूंगा, उनकी तस्वीरें लूंगा, माहौल के बारे में जानूंगा. इसके बाद मेरे अनुरोध पर, मुझे वज़ीर अकबर ख़ान इलाक़े के एक गेस्ट हाउस में शिफ़्ट कर दिया गया."

ज़ाहिद अली ख़ान, काबुल, अफ़ग़ानिस्तान

'अक्स फ़ौरी' का कमाल

राष्ट्रपति भवन के सुरक्षा कर्मचारियों से पोलारायड कैमरे के चलते दोस्ती हो गई थी. दोस्ती कुछ इस हद तक हुई कि प्रतिनिधिमंडल के सदस्य हैरानी से मुझसे पूछते, "तुमने क्या जादू किया कि ये लोग तुम्हारे साथ रहते हैं?"

काबुल के राष्ट्रपति भवन के सुरक्षाकर्मी जाहिद अली ख़ान की हर तरह से देखभाल करते. वो उन्हें कहवा पिलाते और ड्राइ फ्रूट्स खिलाते.

वह कहते हैं, "यदि मैं फ़िल्म रोल वाले कैमरे से उनकी तस्वीरें लेता, तो वो मना कर देते और कहते, "अक्स फ़ौरी".

इस दोस्ती की वजह से एक फ़ायदा तो ये हुआ कि ज़ाहिद को बिना किसी रुकावट के राजभवन में घूमने और तस्वीरें लेने की इजाज़त मिल गई.

राजभवन की दीवारों पर ख़ूबसूरत और क़ीमती पेंटिंग लगी हुई थीं, जिनमें से ज़्यादातर पूर्वी यूरोपीय देशों जैसे पोलैंड, चेकोस्लोवाकिया और मध्य एशिया के कलाकारों की थी. परिसर में एक म्यूज़ियम भी था, लेकिन उसे पूरी तरह से सील किया हुआ था.

वज़ीर अकबर ख़ान में रहने से ज़ाहिद को काबुल के आम नागरिकों से मिलने का मौक़ा मिला.

वह कहते हैं, "युद्ध के हालात थे, इसलिए हमें बाहर जाने और अजनबियों से मिलने की अनुमति नहीं थी, लेकिन मैंने अपने शौक़ के लिए जोखिम उठाया."

ज़ाहिद अली ख़ान, काबुल, अफ़ग़ानिस्तान
इमेज कैप्शन, यूगोस्लाविया के तानाशाह मार्शल टैटू द्वारा हस्ताक्षरित प्रमाण पत्र, जो ज़ाहिद के पास अभी भी मौजूद है.

जब कनपटी पर कलाश्निकोव नहीं, रॉकेट ताना गया

ज़ाहिद अली ख़ान बताते हैं कि लगातार तस्वीरें लेने से पोलारायड कैमरे के कार्टरेज ख़त्म हो गए और फ़िल्म के रोल भी कम पड़ गए थे. काबुल पहुंचने के हफ़्ता या दस दिन बाद, मैंने एक साथी ड्राइवर के साथ अख़बारों को तस्वीरें भेजने और नई फ़िल्म लाने के लिए पाकिस्तान जाने का फ़ैसला किया.

वह कहते हैं, "हम शाम 6 बजे काबुल से निकले और रात 12 बजे तुर्ख़म पहुंचे."

सफर के दौरान उनके साथ एक होश उड़ा देने वाली घटना घटी.

वो कहते हैं, "जलालाबाद से आगे एक सुनसान सी जगह पर हमें लड़ाकों ने रोक लिया. एक डरावने से दिखने वाले युवक ने सेब खाते हुए, मेरी कनपटी पर पिस्तौल नहीं, कलाश्निकोव भी नहीं, बल्कि रॉकेट की नोक रख दी. तब मुझे लगा कि शायद यह मेरी ज़िंदगी का आख़िरी पल है. "

उस बंदूकधारी ने दारी भाषा में पूछा, "कौन हो? तो मैंने बमुश्किल उस वाक्य को दोहराया जो मैंने याद किया था: ख़बरनिगार दर पाकिस्तान अस्त (पाकिस्तानी रिपोर्टर हूँ)."

ये सुनकर उस लड़ाके ने अपना लॉन्चर नीचे किया, अपनी जेब से एक और सेब निकालकर मुझे दिया और बधाई के शब्दों के साथ विदा किया.

ज़ाहिद अली ख़ान, काबुल, अफ़ग़ानिस्तान

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'पाकिस्तान' शब्द ही पासपोर्ट था

वो बताते हैं, "पाकिस्तान शब्द उस समय हमारा पासपोर्ट था. हम जहां भी जाते और जैसे ही लोगों को पता चलता कि हम पाकिस्तान से हैं, तो उनका रवैया बदल जाता. वो ख़ुश होते थे."

ज़ाहिद अली ख़ान बताते हैं कि क़ाज़ी हुसैन अहमद के नेतृत्व में प्रतिनिधिमंडल ने वार्ता को सफल बनाने की बहुत कोशिश की, लेकिन ऐसा हो न सका. सऊदी अरब, अमेरिका, पाकिस्तान, ईरान और भारत सभी अपने-अपने तरीक़े से इसमें शामिल थे.

वो कहते हैं, "शायद ये मामला क़ाज़ी हुसैन अहमद, हमीद गुल और कुछ राजनयिकों के बस का था ही नहीं."

वीडियो कैप्शन, काबुल की सड़कों पर घर का सामान क्यों बेच रहे लोग?

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