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पंजशीर के लड़ाके 'ताक़तवर तालिबान' के सामने किस दम पर डटे हैं?
तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान पर काफ़ी तेज़ी से अपनी पकड़ बनाई है. अब वे काबुल में अपनी नई सरकार को लेकर योजना बना रहे हैं. फिर भी उनकी राह का एक बड़ा रोड़ा अभी बचा हुआ है.
राजधानी काबुल के उत्तर-पूर्व की पंजशीर घाटी का यह रोड़ा राष्ट्रीय प्रतिरोध मोर्चा (एनआरएफ) के लड़ाके हैं. चारों ओर से तालिबान से घिरे होने के बावजूद, ये लोग हार मानने से इंकार कर रहे हैं. तालिबान के वरिष्ठ नेता आमिर ख़ान मोतक़ी ने पंजशीर घाटी में रहने वाले लड़ाकों से अपने हथियार डालने का आह्वान किया है, लेकिन अब तक इस अपील पर अमल के कोई संकेत नहीं दिख रहे.
विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, 15 अगस्त को काबुल पर तालिबान के क़ब्ज़े के बाद से अब तक पंजशीर घाटी की सीमाओं पर हुई झड़पों में तालिबान के दर्जनों लड़ाके मारे जा चुके हैं और अब भी लड़ाई जारी है.
पंजशीर में वास्तव में हो क्या रहा है और क्या इससे तालिबान को चिंतित होना चाहिए?
कौन हैं विरोध पर आमादा ये लड़ाके?
पूर्वी अफ़ग़ानिस्तान की यह घाटी राष्ट्रीय प्रतिरोध मोर्चा (एनआरएफ) के लड़ाकों का घर बन गई है. कई जातीय समुदायों से जुड़े ये लोग, मिलिशिया और अफ़ग़ान सुरक्षा बल के पूर्व सदस्य हैं. इनकी संख्या हज़ारों में है. इस हफ़्ते जारी हुई तस्वीरों से इनके सुसंगठित, आधुनिक हथियारों से लैस और बेहतर प्रशिक्षित होने के संकेत मिलते हैं.
अभी हाल में देश के पूर्व उप-राष्ट्रपति अमरुल्लाह सालेह भी एनआरएफ़ में शामिल हुए हैं. हालांकि इसके नेता 'पंजशीर के शेर' कहे जाने वाले अहमद शाह मसूद के बेटे अहमद मसूद हैं.
अहमद शाह ने न केवल 1980 के दशके में सोवियत संघ के आक्रमण को रोका था, बल्कि 1990 के दशक में तालिबान को भी पंजशीर से दूर रखा था. 11 सितंबर, 2001 को हुई घटना के ठीक दो दिन पहले उनकी हत्या कर दी गई थी.
उनके 32 साल के बेटे और लंदन के किंग्स कॉलेज और सैंडहर्स्ट मिलिट्री एकेडमी के स्नातक अहमद मसूद भी अब ऐसा ही करिश्मा करने और तालिबान को बाहर रखने के लिए दृढ़ हैं. ऐसा नहीं कि वे केवल अपने देश में ही मदद पाने की कोशिश कर रहे हैं, वे विदेशों से भी समर्थन पाने की जुगत लगा रहे हैं. इस साल के शुरू में उन्होंने फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों से मुलाकात की थी.
सीएनएन के साथ एक इंटरव्यू में मसूद ने तालिबान के बारे में कहा कि वे नहीं बदले हैं. उन्होंने कहा कि वे और उनके लड़ाके मानते हैं कि जाति और जेंडर की परवाह किए बिना सभी नागरिकों के लोकतंत्र, अधिकार और आज़ादी को बचाने की ज़रूरत है.
तालिबान क्या चाहता है?
तालिबान अपने इस विचार को पेश कर चुका है कि "अफ़ग़ानिस्तान का इस्लामी अमीरात सभी अफ़ग़ानों का घर है."
लेकिन पंजशीर घाटी में फल-फूल रही विरोध की ये आवाज़ एकता की इस ख़ास छवि के लिए एक झटका साबित हो रही है. सोशल मीडिया पर इस विरोध का समर्थन करने वाले हैशटैग दिखने शुरू हो गए हैं.
तालिबान और एनआरएफ़ बातचीत भी कर रहे हैं. लेकिन दोनों पक्षों के यह कहने के बावज़ूद कि वे लड़ाई से बचना चाहते हैं, अभी तक कोई समझौता नहीं हो पाया है. ऐसा लगता है कि इस बातचीत ने खुली लड़ाई का रास्ता प्रशस्त कर दिया है.
तालिबान का कहना है कि उसने सैकड़ों लड़ाके पंजशीर के मोर्चे पर भेजे हैं, पर पंजशीर इसके लिए तैयार है. समाचार एजेंसी एएफ़पी के अनुसार, घाटी की सीमा पर पहुंचने वाले तालिबान लड़ाकों का स्वागत मशीनगन, मोर्टार और रेत की बोरियों से घिरी निगरानी चौकियों द्वारा किया जाएगा.
दोनों पक्षों ने दावा किया है कि उन्होंने अपने विरोधियों को हताहत किया है. लेकिन हताहतों की संख्या का सटीक अनुमान लगाना काफी मुश्किल है. कुछ इलाकों पर कब्ज़ा करने के तालिबान के दावे को भी एनआरएफ ने ख़ारिज़ कर दिया है.
रिपोर्ट के अनुसार, तालिबान पंजशीर घाटी की सप्लाई लाइनों को काटने की कोशिश में हैं, ताकि एनआरएफ़ के लड़ाके अपना प्रतिरोध छोड़ने को मज़बूर हो जाएं.
कैसा है पंजशीर?
पंजशीर, अफ़ग़ानिस्तान के सबसे छोटे प्रांतों में से एक है. यहां 1.5 से 2 लाख लोग रहते हैं. इस घाटी के बीचों बीच पंजशीर नदी बहती है और यह चारों ओर से 9,800 फ़ीट ऊंचे पवतों की चोटियों से घिरा है. शांति के दिनों में इलाके में आने वाले लोग, इसके रमणीक दृश्यों और पहाड़ों द्वारा मिलने वाली सुरक्षा को देख मंत्रमुग्ध हो जाते थे.
यहां रहने वाले कई समूहों में सबसे बड़ा समूह ताजिक मूल के लोगों का है. बाहरी लोगों से बहादुरी से लड़ने में घाटी के लोगों ने ख़ूब प्रतिष्ठा हासिल की है.
ऐतिहासिक रूप से अपने रत्नों और खानों के लिए मशहूर इस घाटी में पिछले दो दशकों के दौरान ख़ासा निवेश हुआ है और इससे कई निमार्ण हुए हैं.
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