शाह फ़ैसल: अमेरिका को आँख दिखाने वाले सऊदी अरब के शाह की हत्या क्यों हुई थी

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- Author, आरिफ़ शमीम
- पदनाम, बीबीसी उर्दू, लंदन
उस साल रबी-उल-अव्वल (इस्लामिक साल का तीसरा महीना) की 12 तारीख़ को, इस्लाम के आख़िरी पैग़ंबर हज़रत मोहम्मद के जन्म के दिन, सऊदी अरब के शाह फ़ैसल लोगों से मिल रहे थे और कुवैत का एक प्रतिनिधिमंडल उनसे मिलने के लिए वेटिंग हॉल में उनका इंतज़ार कर रहा था.
शाह फ़ैसल के भतीजे फ़ैसल बिन मुसाइद कुवैत के उस प्रतिनिधिमंडल के साथ बातचीत कर रहे थे. जब प्रतिनिधिमंडल का शाह फ़ैसल से मिलने का समय आया, तो शाह फ़ैसल अपने भतीजे से मिलने के लिए आगे बढे. उसी समय भतीजे ने अचानक अपने जुब्बे से रिवॉल्वर निकाली और शाह फ़ैसल को दो गोलियाँ मार दी. हमलावर ने पहली गोली उनकी ठोड़ी और दूसरी कान पर मारी.
कहा जाता है कि एक तीसरी गोली भी चली थी, जो उन्हें नहीं लगी थी. शाह के एक बॉडीगार्ड ने फ़ैसल बिन मुसाइद पर तलवार का वार किया, जो अभी तक म्यान में ही थी. वहाँ मौजूद देश के पेट्रोलियम मंत्री ने गार्ड से चिल्ला कर कहा कि शहज़ादे को मारना मत. उस समय फ़ैसल बिन मुसाइद इत्मीनान से वहीं खड़े रहे और गार्डों ने उन्हें गिरफ़्तार कर लिया.
शाह फ़ैसल को अस्पताल ले जाया गया, लेकिन वो ज़ख़्मों को बर्दाश्त नहीं कर सके और उनकी मौत हो गई.
दो दशकों से अधिक समय से सऊदी अरब में पत्रकारिता करने वाले विश्लेषक राशिद हुसैन की एक ऐसे व्यक्ति से अच्छी तरह जान पहचान थी, जो उस समय शाह फ़ैसल के बहुत क़रीब खड़े थे. वह व्यक्ति तत्कालीन पेट्रोलियम मंत्री अहमद ज़की यमानी थे, जो ओपेक के प्रतिनिधिमंडल को, जिसमें कुवैत के मंत्री भी शामिल थे, शाह फ़ैसल से मिलवा रहे थे.
राशिद हुसैन का कहना है, "हो सकता है कि जो सुरक्षा स्क्रीनिंग होती थी, वो न हुई हो. जब गोली चलाई गई तो लोगों को लगा कि अहमद ज़की यमानी को भी गोली लगी है क्योंकि पहले उन्होंने ही फ़ैसल बिन मुसाइद को जाकर पकड़ा था."
शाह फ़ैसल बिन अब्दुल अज़ीज़ बिन अब्दुल रहमान अल सऊद के हत्यारे फ़ैसल बिन मुसाइद का उसी साल 18 जून को सऊदी अरब की राजधानी रियाद के सबसे बड़े चौक पर सार्वजनिक रूप से सिर क़लम कर दिया गया था.

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फ़ैसल बिन मुसाइद कौन थे?
फ़ैसल बिन मुसाइद शाह फ़ैसल के सौतेले भाई मुसाइद बिन अब्दुल अज़ीज़ के बेटे थे.
फ़ैसल बिन मुसाइद का जन्म 4 अप्रैल, 1944 को हुआ था और 18 जून, 1975 को शाह फ़ैसल की हत्या के लिए उन्हें मौत की सज़ा सुनाई गई थी. और कुछ ही घंटों बाद रियाद के मुख्य चौक में भरे मजमे के सामने उनका सिर क़लम कर दिया गया था.
फ़ैसल मुसाइद के जीवन के बारे में ज़्यादा कुछ नहीं लिखा गया है. फ़ैसल बिन मुसाइद शिक्षा प्राप्त करने के लिए अमेरिका गए, जहाँ उन्होंने सैन फ़्रैंसिस्को स्टेट कॉलेज में दाख़िला लिया. उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफ़ोर्निया और यूनिवर्सिटी ऑफ़ कोलोराडो में भी अध्ययन किया.
शाह फ़ैसल की हत्या के बाद शुरू में कहा गया था कि वह "मानसिक असंतुलन" से पीड़ित थे. हत्या के बाद, शाही कैबिनेट ने एक बयान में उन्हें औपचारिक रूप से "पागल" घोषित किया था. लेकिन डॉक्टरों ने जाँच के बाद सर्टिफ़िकेट दिया कि फ़ैसल बिन मुसाइद मानसिक रूप से बिल्कुल ठीक हैं.
उनके साथ नशीली दवाओं के मामले भी जोड़े जाते हैं और कहा जाता है कि एक बार जब वह सऊदी अरब वापस आए, तो उनका पासपोर्ट ज़ब्त कर लिया गया था, क्योंकि वह विदेशों में सऊदी अरब को बदनाम कर रहे थे.

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शाह फ़ैसल की हत्या क्यों की गई?
सऊदी अरब में, जाँच रिपोर्ट लोगों के सामने नहीं लाई जाती है, और जब बात शाही परिवार की हो, तो मामला और भी संवेदनशील हो जाता है. हत्या के समय कई तरह की अफ़वाहों और अटकलों ने जन्म लिया, लेकिन जाँच के बाद यह कहा गया कि हत्यारा अकेला था और इस प्रक्रिया में उनके साथ कोई और शामिल नहीं था.
विश्लेषक राशिद हुसैन का कहना है कि 25 मार्च 1975 को जो हुआ, उसे पूरे संदर्भ में देखने की ज़रूरत है.
फ़ैसल बिन मुसाइद के भाई की मौत
शुरुआती तौर पर तो, यही अनुमान लगाया गया था कि शहज़ादे ने अपने भाई की मौत का बदला लेने के लिए शाह फ़ैसल पर गोली चलाई.
जब शाह फ़ैसल ने देश में टेलीविज़न प्रसारण शुरू कराया, तो उनके सौतेले भाई और फ़ैसल बिन मुसाइद के पिता, मुसाइद बिन अब्दुल अज़ीज़, अन्य धार्मिक नेताओं के साथ, शाह के फ़ैसले के ख़िलाफ़ खुलकर बोलने लगे और विरोध प्रदर्शन भी किए.
इसी तरह के एक प्रदर्शन में जब प्रदर्शनकारी एक टीवी स्टेशन पर हमला करने लगे, तो पुलिस ने गोलियाँ चला दी, जिसमें मुसाइद बिन अब्दुल अज़ीज़ के बड़े बेटे ख़ालिद मुसाइद की मौत हो गई.
राशिद हुसैन कहते हैं, "सऊदी अरब में शासकों ने धार्मिक विद्वानों पर ज़बरदस्त कंट्रोल किया हुआ था और वो कंट्रोल आज तक है. जब उन्हें कोई आंदोलन फैलाना होता है तो वे मौलवियों से ज़बरदस्ती कहलवा देते हैं. शायद साल 65 या 66 की बात है, जब वहाँ रेडियो और टेलीविज़न शुरू करने की कोशिश हो रही थी, तो वहाँ के उलेमाओं ने कोशिश की कि उनकी मर्ज़ी के बिना कुछ भी न हो और हर चीज़ उनके कंट्रोल में रहे, क्योंकि यह ग़ैर-इस्लामी है."
"शाह फ़ैसल अपने समय के हिसाब से थोड़े प्रगतिशील थे. उन्होंने महिलाओं को शिक्षित करने का भी काम शुरू किया और इसी तरह उन्होंने रेडियो और टेलीविज़न भी शुरू कराया. जिसकी वजह से रियाद में एक प्रदर्शन हुआ और फ़ैसल बिन मुसाइद के पिता (मुसाइद बिन अब्दुल अज़ीज़) इसका नेतृत्व कर रहे थे, जो शाही परिवार से थे."
"इसमें दिलचस्प बात यह है कि अगर वह सफल हो जाते तो शाह फ़ैसल की सरकार का तख़्ता उलट सकते थे. इसी तरह के एक प्रदर्शन में, प्रदर्शनकारियों ने रियाद में टीवी सेंटर में घुसने की कोशिश की और इसमें फ़ैसल बिन मुसाइद के बड़े भाई की पुलिस की गोली लगने से मौत हो गई."
हालाँकि, उसके बाद भी शाह फ़ैसल ने ऐसा कोई फ़ैसला नहीं लिया कि टीवी प्रसारण पूरी तरह से बंद कर दिया जाए.

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शाह फ़ैसल का शासन और पारिवारिक मतभेद
राशिद हुसैन का कहना है कि शाही परिवार में हमेशा प्रतिद्वंद्विता और मतभेद होते हैं और शाह फ़ैसल के ख़िलाफ़ प्रतिद्वंद्विता का एक मुख्य कारण यह था कि शाह फ़ैसल ख़ुद शाह सऊद को हटाकर बादशाह बने थे.
राशिद हुसैन बताते हैं, "शाह फ़ैसल से पहले, शाह सऊद, जो शाह अब्दुल अज़ीज़ के सबसे बड़े बेटे और क्राउन प्रिंस भी थे, बादशाह बने थे. लेकिन फ़ैसल ने एक तरह से आंदोलन चलाया कि शाह सऊद से देश नहीं चल रहा है और उन्हें तख़्त छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया.''
''शाही परिवार के अंदर मतभेद तो मौजूद ही थे. मुसाइद साहब ने इन मतभेदों को इस्तेमाल करके शाह फ़ैसल के ख़िलाफ़ एक आंदोलन खड़ा करने की कोशिश की, जिससे शाह फ़ैसल बहुत सख़्ती से निपटे. मुसाइद ने वहाँ की धार्मिक ताक़तों, मौलवियों को अपने साथ मिलाया हुआ था, उनका मानना था कि अगर वे उनके साथ रहेंगे, तो वो ये लड़ाई जीत सकते हैं. उस समय तो वह कुछ नहीं कर सके, लेकिन उनके दिल में एक टीस बनी रही.''

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शाह फ़ैसल का शासन कैसे स्थापित हुआ?
फ़ैसल बिन अब्दुल अज़ीज़ के बारे में उपलब्ध जानकारी के अनुसार, उनका जन्म 14 अप्रैल 1906 को रियाद में हुआ था. वह शाह अब्दुल अज़ीज़ के तीसरे बेटे थे. उनकी माँ, तरफ़ाह बिन्ते अब्दुल्लाह, का संबंध अब्दुल वहाब के धार्मिक परिवार से था और उनकी शादी शाह अब्दुल अज़ीज़ के रियाद को जीतने के बाद हुई थी.
फ़ैसल महज़ छह महीने के थे, जब उनकी माँ की मौत हो गई. उनका पालन-पोषण उनके नाना-नानी ने किया था और उनकी प्राथमिक शिक्षा भी उनकी ही ज़िम्मेदारी थी.
1919 में ब्रिटिश सरकार ने शाह अब्दुल अज़ीज़ को लंदन आमंत्रित किया, लेकिन व्यक्तिगत व्यस्तताओं के कारण वह नहीं जा सके, लेकिन यह तय किया गया कि उनकी जगह उनके बड़े बेटे, 'प्रिंस तुर्की' जाएँगे, लेकिन प्रिंस तुर्की की स्पेनिश फ़्लू से मृत्यु हो गई थी. इसलिए अब कुर्रा (पर्ची डाल कर तय करना) में प्रिंस फ़ैसल का नाम निकला और वह इंग्लैंड का दौरा करने वाले सऊदी परिवार के पहले सदस्य बन गए. उनका यह दौरा पाँच महीने तक चला, इस दौरान उन्होंने फ्रांस भी देखा.
उनके पिता अक्सर उन्हें अहम ज़िम्मेदारियाँ सौंप देते थे और उनका मानना था कि फ़ैसल इन ज़िम्मेदारियों को पूरी तरह से निभाने में सक्षम हैं. उन्हें साल 1922 में बंदी बनाए गए प्रांत को कंट्रोल करने के लिए सशस्त्र बलों के साथ भेजा गया, जो एक सफल रणनीति थी. 1926 में, उन्हें हिजाज़ का वायसराय बनाया गया और इसके अलावा वो गृह मंत्री भी रहे.
साल 1953 में शाह अब्दुल अज़ीज़ की मृत्यु के बाद, उनके सबसे बड़े बेटे सऊद को बादशाह बना दिया गया, जबकि फ़ैसल क्राउन प्रिंस बने.
राज्य के मामलों पर शाह सऊद की पकड़ उतनी नहीं थी, जितनी उनके पिता की थी और न ही उन्हें घरेलू व विदेश नीति में कोई महत्वपूर्ण अनुभव था. शाही परिवार को जल्द ही इस बात का एहसास हो गया और इसलिए शाह सऊद पर क्राउन प्रिंस फ़ैसल को प्रधानमंत्री बनाने और उन्हें और अधिक अधिकार देने का दबाव डाला गया.
उस समय तक क़रीबी पड़ोसी देश मिस्र में जमाल नासिर बादशाह का तख़्ता पलट कर सत्ता में आ चुके थे और डर था कि यहाँ भी ऐसा ही न हो जाए.
हालाँकि, शाह सऊद और शाह फ़ैसल के बीच सत्ता संघर्ष जारी रहा और दिसंबर 1960 में प्रिंस फ़ैसल ने प्रधानमंत्री के पद से इस्तीफ़ा दे दिया, लेकिन वे क्राउन प्रिंस तो थे ही. कुछ ही समय बाद, उन्हें दोबारा परिवार का समर्थन मिला और वे दूसरी बार प्रधानमंत्री बने.
आख़िरकार, उन्होंने शाह से माँग की कि सत्ता उन्हें सौंप दें. उलेमा ने उनके पक्ष में एक नहीं बल्कि दो फ़तवे जारी किए, कि शाह सऊद देश की भलाई के लिए सत्ता से अलग हो जाएँ. शाही परिवार ने फ़तवे का समर्थन किया और दो नवंबर 1964 को फ़ैसल को सऊदी अरब का शासक बना दिया गया.
उन्हें शाह बनाने में सुदैरी ब्रदर्स का हाथ था. हालाँकि, शाह फ़ैसल ख़ुद सुदैरी परिवार से नहीं थे.

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सुदैरी ब्रदर्स कौन थे?
कहा जाता है कि शाह अब्दुल अज़ीज़ की सबसे प्यारी पत्नी सुदैरी क़बीले की हस्सा बिन्ते अहमद अल-सुदैरी थीं और उनसे उनके सबसे ज़्यादा पुत्र पैदा हुए थे और सभी उच्च पदों पर थे.
प्रभावशाली सुदैरी बंधुओं के इस समूह को 'सुदैरी सियून' भी कहा जाता था.
हालांकि, शाह फ़ैसल ख़ुद सुदैरी माँ के बेटे नहीं थे, लेकिन सत्ता में आने के लिए उन्हें सातों सुदैरी भाइयों का समर्थन प्राप्त था और शाह सऊद को सत्ता से हटाने में उनकी अहम भूमिका थी. शाह फ़ैसल ने सत्ता में आते ही इन भाइयों को बड़े-बड़े अहम पद दिए.
फ़ैसल बिन मुसाइद के पिता, मुसाइद बिन अब्दुल अज़ीज़ का संबंध उसी शक्तिशाली और प्रभावशाली सुदैरी क़बीले से था, जिसने शाह फ़ैसल के सत्ता में आने में उनकी बहुत मदद की थी. हालांकि, मुसाइद बिन अब्दुल अज़ीज़ शाह फ़ैसल की आधुनिकीकरण की नीति से असहमत थे.
शाह फ़ैसल की मृत्यु के बाद, उनके सौतेले भाई शाह ख़ालिद सऊदी अरब के शासक बने, और 1982 में उनकी मृत्यु के बाद, सऊदी अरब की सत्ता दो बार सुदैरी परिवार के पास जा चुकी है. पहले शाह ख़ालिद के बाद शाह फ़हद बादशाह बने, जिनकी सत्ता 2005 तक रही.
इसके बाद शाह अब्दुल्लाह, बादशाह रहे जो सुदैरी नहीं थे, और 2015 में उनकी मृत्यु के बाद, एक बार फिर सुदैरी वंश के शाह सलमान बादशाह हैं, लेकिन बूढ़े होने के कारण, अब भी एक और सुदैरी यानी उनके बेटे, क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ही सरकार के सारे मामले संभालते हैं.
शाह फ़ैसल एक 'प्रगतिशील' शासक
शाह फ़ैसल ने बादशाह बनते ही पहले तो परिवार के लोगों को साथ मिलाकर भविष्य में बादशाह के चुनाव के लिए एक परिषद का गठन किया, ताकि यह समस्या स्थायी रूप से हल हो जाए कि अगला बादशाह किसे बनाना है. इसके बाद इसमें शाही परिवार के प्रमुख लोगों को अहम पदों पर नियुक्त किया, जिनमें उनके सभी सगे और सौतेले भाई भी शामिल थे.
उन्होंने कई पॉपुलर फ़ैसले किए, जिनसे वो जनता में बहुत लोकप्रिय हो गए. उनमें से एक यह था कि सऊदी शहज़ादे अपने बच्चों को विदेश भेजने के बजाय देश के स्कूलों में ही पढ़ाएँ. इसी तरह उन्होंने लड़कियों की शिक्षा पर भी ज़ोर दिया, देश के पहले न्याय मंत्रालय की स्थापना की और पहली पंचवर्षीय विकास योजना की आधारशिला रखी.
1962 में भी उन्होंने एक आदेश जारी करके देश में ग़ुलामी या ग़ुलाम रखने के रिवाज को ख़त्म कर दिया. याद रहे कि तब तक यह किसी न किसी रूप में चल रहा था.
शाह फ़ैसल ने आर्थिक विकास और धार्मिक सोच को एक साथ चलाने की कोशिश की. एक तरफ़ तो वे कोई ऐसा फ़ैसला नहीं करते थे, जिसमें धार्मिक उलेमाओं का समर्थन शामिल न हो. लेकिन दूसरी ओर, वे ऐसे किसी भी विरोध को दबा देते, जिसके बारे में थोड़ा-सा भी ये शक होता कि इससे विकास या उनकी सत्ता को समस्या पैदा हो सकती है.
उन्होंने कट्टरपंथी उलेमाओं को नियंत्रित किया और जब उनके सलाहकारों ने उन्हें सलाह दी कि देश में महिला शिक्षा जैसे क्रांतिकारी निर्णय लेने से उनके ख़िलाफ़ धार्मिक समुदाय की नफ़रत बढ़ सकती है, तो उन्होंने इसे मानने से इनकार कर दिया.
लेकिन, इसके उलट जब उनसे कहा गया कि देश का कोई संविधान बनाएँ, तो उन्होंने कहा कि क़ुरान (मुसलमानों का धार्मिक ग्रंथ) ही हमारा संविधान है. वह कम्युनिस्टों के बहुत ख़िलाफ़ थे और उनकी विदेश नीति का एक बड़ा हिस्सा इस्लाम ही था. उनका मानना था कि इस्लाम और कम्युनिज़्म एक-दूसरे के विरोधाभासी हैं और ये कभी भी एक साथ नहीं हो सकते. शायद इसीलिए वह रूस से दूर और अमेरिका के क़रीब थे.
लेखक क्रेग इंगर ने अपनी किताब 'हाउस ऑफ़ बुश, हाउस ऑफ़ सऊद' में लिखा है कि प्रिंस बंदर बिन सुल्तान अल सऊद ने एक बार न्यूयॉर्क टाइम्स को बताया था, कि शाह ईरान ने अपना तख़्तापलट होने से पहले, एक बार शाह फ़ैसल को एक पत्र भेजा था. जिसमे उन्होंने कहा था, "मेरे भाई, मेहरबानी करके देश का आधुनिकीकरण करो. अपने देश को खोलो. स्कूलों, में सह-शिक्षा लाओ, महिलाएँ और पुरुष (साथ-साथ). महिलाओं को मिनी स्कर्ट पहनने दो. डिस्को बनाओ. आधुनिक बनो, नहीं तो मैं इस बात की गारंटी नहीं दे सकता हूँ कि तुम लंबे समय तक अपने सिंहासन पर विराजमान रहोगे."
इसका जवाब शाह फ़ैसल ने कुछ इस तरह दिया, "जहाँपनाह, मैं आपकी सलाह की क़द्र करता हूँ. क्या मैं आपको याद दिला सकता हूँ कि आप फ्रांस के राजा नहीं हैं? आप एलिसी में नहीं हैं, आप ईरान में हैं. आपकी नब्बे प्रतिशत आबादी मुस्लिम है. कृपया यह कभी न भूलें."
शहज़ादा बंदर ने कहा कि इतिहास ने शाह फ़ैसल को सच साबित किया. "कहीं और से आयातित ख़याली सामाजिक और राजनीतिक संस्थाएँ ख़तरनाक हो सकती हैं... शाह ईरान से ही पूछ लो... हमारे लिए इस्लाम सिर्फ़ एक धर्म नहीं है, बल्कि जीवन जीने का एक तरीक़ा है. हम सऊदी लोग आधुनिक जीवन शैली लाना चाहते हैं, लेकिन ज़रूरी नहीं कि वह पश्चिमी जीवन शैली हो."

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शाह फ़ैसल और तेल की क़ीमतें
शाह फ़ैसल की हत्या के बाद की अफ़वाहों और अटकलों में से एक अफ़वाह अमेरिका के बारे में थी, जहाँ से वापस आने के बाद फ़ैसल बिन मुसाइद ने शाह फ़ैसल की हत्या कर दी थी. अरब के कुछ अख़बारों ने भी इशारा किया था कि हो सकता है, यह 1973 के कथित तेल प्रतिबंध का बदला हो, जिससे पश्चिम को बहुत नुक़सान हुआ था और सऊदी तेल की क़ीमतें बहुत ज़्यादा बढ़ गई थीं.
1967 के छह-दिवसीय युद्ध में इसराइल ने मिस्र, जॉर्डन और सीरिया के अधिकांश हिस्से पर क़ब्ज़ा कर लिया था और पश्चिम जॉर्डन (वेस्ट बैंक) पूरी तरह से जॉर्डन के क़ब्ज़े से निकल कर इसराइल के क़ब्ज़े में चला गया.
इस युद्ध में वैसे तो अरबों को बहुत नुक़सान हुआ था, और पश्चिमी ताक़तों की मदद से इसराइल मध्य पूर्व में एक प्रमुख शक्ति के रूप में उभरा था. लेकिन फ़लस्तीनियों ने इसे अगले कई सालों तक गुरिल्ला युद्ध के तौर पर जारी रखा, जो किसी न किसी रूप में आज तक चल रहा है.
हालाँकि, 1973 के अरब-इसराइल युद्ध में शाह फ़ैसल की भूमिका खुल कर सामने आई थी. जब अमेरिका और पश्चिम ने इसराइल का साथ दिया और खुले तौर पर उन्हें अरबों से लड़ने के लिए हथियार और सहायता मुहैया की, तो शाह फ़ैसल ने विरोध के तौर पर दुनिया को तेल बेचने पर प्रतिबंध लगा दिया. उनके इस फ़ैसले से दुनिया में तेल की खपत में एकदम से गिरावट आई और तेल की क़ीमतों में तेज़ी से वृद्धि हुई.
राशिद हुसैन का कहना है कि साल 1973 के तेल प्रतिबंध ने, जो शाह फ़ैसल ने शुरू किया था, एक दम सब कुछ बदल दिया. उनके अनुसार साल 1973 में तेल को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने से पश्चिम में बड़ा कोहराम मचा. वहाँ ये बातें होने लगीं कि फ़ैसल किस तरह का आदमी है और क्या कर सकता है.
क्या यह कहा जा सकता है कि शाह फ़ैसल देश को धार्मिक रूढ़िवादिता से बाहर निकालकर तेल के धन से एक आधुनिक राज्य में बदलना चाहते थे, जो विकसित और मॉडर्न बुनियादों पर बना हो? इस समय क्राउन प्रिंस मोहम्मद सलमान भी कुछ ऐसे ही क़दम उठा रहे हैं, तो क्या अगर बीच में से आधी सदी से ज़्यादा समय निकाल दिया जाए, तो शायद दोनों की सोच एक ही तरह की है?
राशिद हुसैन इससे सहमत नहीं होते. उनका कहना है कि हालाँकि शाह फ़ैसल आधुनिकीकरण लाना चाहते थे, लड़कियों की शिक्षा के समर्थक थे और उन्होंने देश में टीवी और रेडियो की शुरुआत की थी, लेकिन फिर भी उनकी सोच बहुत अलग थी. वे 1973 के अरब-इसराइल संकट के दौरान शाह फ़ैसल और अमेरिका के विदेश मंत्री किसिंजर के बीच हुई बातचीत के एक वाक़्ये का ज़िक्र करते हैं.
वे कहते हैं शाह फ़ैसल ने किसिंजर से कहा था, "हमें इतना परेशान मत करो. अगर आप हमें ज़्यादा परेशान करोगे तो हम अपने तेल के कुँओं में आग लगा देंगे और वापस ख़ेमों में चले जाएँगे."
राशिद हुसैन का मानना है कि केवल शाह फ़ैसल में यह कहने की हिम्मत थी कि हम ख़ेमों में वापस चले जाएँगे. अब शायद कोई ऐसा कहने की सोच भी नहीं सकता."
उनका कहना है कि दोनों अलग-अलग व्यक्तित्व हैं और उनकी तुलना नहीं की जा सकती. फ़ैसल में पश्चिम के सामने डट कर खड़े होने की हिम्मत थी, जो मोहम्मद बिन सलमान में नहीं है.
यह सच है कि उन्होंने मुल्लाओं को काफ़ी नियंत्रित किया हुआ है और वह सऊदी समाज को खोलने की बात कर रहे हैं, लेकिन उनका नज़रिया शाह फ़ैसल से बिल्कुल अलग है. वे सब कुछ दबाव में कर रहे हैं, जबकि शाह फ़ैसल दबाव बनाने के लिए ऐसा कर रहे थे.
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